पहाड़ों पर परमेश्वर का न्याय

वह दिन ऐसा था जैसे आकाश ने सीसे का रंग पहन लिया हो। धूप भी कुछ अजीब थी—न तो तेज़, न मंद, बल्कि एक स्थिर, भारी प्रकाश जो हर चीज़ पर चिपक रहा था। मैं नगर की उस टूटी हुई…

निर्वासन में आशा का बीज

वह दिन भी याद आता है, जब बाबुल की नहर के किनारे बैठा मैं, एक बूढ़ा यहूदी, अपने हाथों में मिट्टी के ठंडे टुकड़े को मसल रहा था। हवा में खजूर के पत्तों की सरसराहट थी, और दूर से किसी…

वापसी और नया आकाश

खंडहरों के बीच बैठा एलियाकीम अपनी लाठी को रेत में घुमा रहा था। शाम की लाली दीवारों के अधजले पत्थरों पर पड़ रही थी, और हवा में धूल के साथ-साथ एक उदासी भी थी, जो बाबुल से लौटे इस छोटे…

विश्वास का विस्तार

(यह कहानी यशायाह 33 के भाव और विषयों पर आधारित एक कल्पनाशील विस्तार है, जो ऐतिहासिक संदर्भ में एक मूल कथा प्रस्तुत करती है।) हवा में जलने की गंध थी। दूर, अश्शूरियों के शिविर की आग से उठता धुआँ, काले…

पापी नगर की दिव्य चेतावनी

यरूशलेम की सड़कें उस गर्मी में तपती थीं, जैसे कोई अदृश्य आग नगर की नींव तक को भस्म करने पर तुली हो। हवा में धुआँ था, न कि युद्ध का, बल्कि मन्दिर से उठते हब्बे-हब्बे बलि-पशुओं के चमड़े के जलने…

दादा की सीख और प्रभु का दीपक

सुबह की धूप खिड़की से फिसलकर मिट्टी के फर्श पर एक सुनहरा चौखटा बना रही थी। रामलाल दादा अपनी चारपाई के किनारे बैठे, अपनी लकड़ी की छड़ी को हथेलियों के बीच धीरे-धीरे घुमा रहे थे। उनके पास बैठा उनका पोता,…

स्तुति का असली रहस्य

सूरज ढलने लगा था, और आकाश में केसरिया और बैंगनी रंग फैल रहे थे। नदी किनारे बैठा वह बूढ़ा, एलिय्याह, अपनी लकड़ी की सहारे वाली छड़ी को रेत में धीरे-धीरे घुमा रहा था। उसकी आँखों में एक दूर की चमक…

नदी किनारे की टूटी आत्मा

वह नदी के किनारे बैठा था, और पानी की धारा में उसका प्रतिबिंब टूट-टूट कर बह रहा था। हवा ठंडी थी, पर उसके मन की गर्मी से वह ठंड कहीं नहीं लग रही थी। दूर, उस पार के पहाड़ों पर…

एक टूटे मटके में विश्वास

वह दिन ढलने को था, और आकाश में लालिमा फैली हुई थी, जैसे कोई घाव धीरे-धीरे सूख रहा हो। हवा में धूल के कण तैर रहे थे, और गाँव के किनारे बने उस छोटे से झोपड़े में अंधेरा पहले ही…

दुष्ट का क्षणभंगुर आनंद

उस कस्बे में धूल ही धूल थी। रास्तों पर उड़ती हुई मिट्टी, दूर तक फैले सूखे आकाश के नीचे, ऐसा लगता था जैसे प्रभु ने रंगों का घड़ा ही उलट दिया हो। बस पीला और भूरा, और कहीं-कहीं किसी झरबेरी…