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भजन संहिता 135: परमेश्वर की महिमा और कृपा की कहानी

भजन संहिता 135 की कहानी को एक विस्तृत और जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हुए, हम इसकी गहराई और महत्व को समझने का प्रयास करेंगे। यह भजन परमेश्वर की महिमा, उसकी सृष्टि, और उसके चुने हुए लोगों के प्रति उसकी विशेष कृपा को दर्शाता है। यह कहानी एक गाँव के बुजुर्ग व्यक्ति की ज़ुबानी सुनाई जाएगी, जो अपने पोते-पोतियों को परमेश्वर की महानता के बारे में बताता है।

एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में एक बुजुर्ग व्यक्ति रहता था, जिसका नाम योनातान था। वह अपने गाँव के लोगों के बीच बहुत सम्मानित था, क्योंकि वह परमेश्वर के वचन को गहराई से जानता था और उसे सरल शब्दों में समझाने में माहिर था। एक शाम, जब सूरज डूब रहा था और आकाश में लालिमा छा रही थी, योनातान अपने पोते-पोतियों के साथ एक पेड़ के नीचे बैठा था। बच्चों ने उससे कहा, “दादाजी, हमें परमेश्वर के बारे में कुछ बताओ। वह कैसा है? उसकी महिमा क्या है?”

योनातान ने मुस्कुराते हुए कहा, “बच्चों, आज मैं तुम्हें भजन संहिता 135 की कहानी सुनाऊंगा। यह भजन हमें परमेश्वर की महानता और उसके कार्यों के बारे में बताता है।”

वह गहरी सांस लेकर बोला, “परमेश्वर की स्तुति करो, क्योंकि वह अच्छा है। उसका नाम सुहावना है, और उसकी स्तुति करना हमारा कर्तव्य है। वह याकूब को अपने लिए चुन लेता है और इस्राएल को अपनी विशेष संपत्ति बनाता है। परमेश्वर ने हमें चुना है, बच्चों, और यह हमारे लिए बहुत बड़ा सम्मान है।”

बच्चों की आँखें चमक उठीं। उनमें से एक ने पूछा, “दादाजी, परमेश्वर इतना महान कैसे है?”

योनातान ने कहा, “सुनो, बच्चों। परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी, समुद्र और सारी चीज़ों को बनाया है। वह बादलों से वर्षा लाता है, पहाड़ों से हवाएं उठाता है, और समुद्र की लहरों को नियंत्रित करता है। उसकी शक्ति असीम है। वही है जो सूरज को चमकने और चाँद को रोशनी देने का आदेश देता है। उसकी महिमा हर जगह देखी जा सकती है।”

एक और बच्चे ने पूछा, “दादाजी, क्या परमेश्वर ने हमारे लिए कुछ विशेष किया है?”

योनातान ने गर्व से कहा, “हाँ, बच्चों। परमेश्वर ने हमारे पूर्वजों के लिए बहुत बड़े काम किए। उसने मिस्र में बड़े-बड़े चमत्कार दिखाए। उसने फिरौन और उसके सभी दासों को हराया। उसने हमारे पूर्वजों को मिस्र की दासता से छुड़ाया और उन्हें वादा किए हुए देश में ले आया। परमेश्वर ने उनके लिए रास्ते बनाए, उन्हें भोजन दिया, और उनकी रक्षा की। वह हमेशा हमारे साथ रहता है।”

बच्चों ने आश्चर्य से पूछा, “दादाजी, क्या परमेश्वर आज भी हमारे साथ है?”

योनातान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, बच्चों। परमेश्वर आज भी हमारे साथ है। वह हमारे दिलों में बसता है। जब हम उसकी आराधना करते हैं, उसकी स्तुति करते हैं, तो वह हमारे जीवन में अपनी उपस्थिति दिखाता है। वह हमारे दुखों में सांत्वना देता है, हमारे संघर्षों में हमारी मदद करता है, और हमें आशीष देता है।”

फिर योनातान ने भजन संहिता 135 के शब्दों को दोहराया, “हे इस्राएल के घराने, यहोवा को धन्य कहो। हे हारून के घराने, यहोवा को धन्य कहो। हे लेवी के घराने, यहोवा को धन्य कहो। हे यहोवा के डरवैयों, यहोवा को धन्य कहो।”

बच्चों ने एक साथ कहा, “हम भी परमेश्वर की स्तुति करेंगे, दादाजी।”

योनातान ने खुशी से कहा, “यही सही रास्ता है, बच्चों। परमेश्वर की स्तुति करना हमारे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। वह हमारा सृष्टिकर्ता, हमारा रक्षक, और हमारा मित्र है। उसकी महिमा हमेशा बनी रहे।”

उस शाम, गाँव के उस पेड़ के नीचे, बच्चों ने परमेश्वर की महिमा के बारे में सीखा और उसकी स्तुति करने का संकल्प लिया। योनातान ने उन्हें यह भी सिखाया कि परमेश्वर की आराधना करने का अर्थ केवल गीत गाना नहीं है, बल्कि उसके वचन को मानना और उसके मार्ग पर चलना भी है।

इस तरह, भजन संहिता 135 की शिक्षाएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहीं, और परमेश्वर की महिमा हमेशा बनी रही।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि परमेश्वर की स्तुति करना और उसके कार्यों को याद रखना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसकी महिमा और कृपा हमेशा हमारे साथ है, और हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।

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