एक समय की बात है, जब एक छोटे से गाँव में एक बुद्धिमान बूढ़ा व्यक्ति रहता था। उसका नाम एलियाह था। वह गाँव के लोगों के बीच बहुत सम्मानित था क्योंकि वह न केवल ज्ञानी था, बल्कि उसके पास परमेश्वर का डर भी था। एलियाह अक्सर गाँव के चौपाल पर बैठकर लोगों को जीवन के सही मार्ग पर चलने की सलाह देता था। उसका मानना था कि “जो कोई अलग हो जाता है, वह अपनी इच्छा चाहता है; वह सब अच्छी सम्मति से बैर रखता है” (नीतिवचन 18:1)।
एक दिन, गाँव के कुछ युवक एलियाह के पास आए। वे आपस में झगड़ रहे थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इस समस्या का समाधान करें। एलियाह ने उन्हें शांत होने के लिए कहा और धीरे से बोला, “हे बच्चों, तुम्हें समझना चाहिए कि ‘मूर्ख को बातें करने में आनन्द नहीं होता, परन्तु अपना मन खोलने में होता है’ (नीतिवचन 18:2)। तुम सब अपनी-अपनी बात कहने में इतने व्यस्त हो कि एक-दूसरे की बात सुनने का धैर्य ही नहीं रखते। यही तो समस्या का मूल है।”
युवकों ने एलियाह की बात सुनी और उन्हें एहसास हुआ कि वे सचमुच एक-दूसरे की बात नहीं सुन रहे थे। एलियाह ने आगे कहा, “परमेश्वर का वचन हमें सिखाता है कि ‘दुष्ट का नाम सड़ांध मारता है, और अपमान के साथ मिट्टी में मिल जाता है’ (नीतिवचन 18:3)। यदि तुम अपने मन में द्वेष और क्रोध रखोगे, तो तुम्हारा नाम भी बदनाम होगा। इसलिए, एक-दूसरे की बात सुनो और समझो।”
एलियाह ने उन्हें एक कहानी सुनाई। एक बार दो भाई थे जो एक छोटी सी जमीन के टुकड़े के लिए झगड़ रहे थे। दोनों का दावा था कि जमीन उनकी है। उन्होंने गाँव के मुखिया के पास जाकर न्याय मांगा। मुखिया ने उन्हें समझाया कि “बुद्धिमान का मन ज्ञान को खोजता है, परन्तु मूर्ख का मन अज्ञान को” (नीतिवचन 18:15)। उसने दोनों भाइयों से कहा कि वे अपने मन को शांत करें और एक-दूसरे की बात सुनें। अंत में, दोनों भाइयों ने समझौता किया और जमीन को आपस में बांट लिया। उन्हें एहसास हुआ कि लालच और झगड़े से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि शांति और समझ से ही सही निर्णय लिया जा सकता है।
एलियाह ने युवकों से कहा, “तुम्हें यह समझना चाहिए कि ‘न्यायी का मुकद्दमा पहले चलता है, परन्तु उसका विरोधी आकर उसकी छानबीन करता है’ (नीतिवचन 18:17)। यदि तुम सच्चे और न्यायी हो, तो तुम्हारा पक्ष सदैव मजबूत रहेगा। लेकिन यदि तुम झूठ और धोखे का सहारा लोगे, तो तुम्हारा पक्ष कमजोर हो जाएगा।”
युवकों ने एलियाह की बातों को गंभीरता से लिया और उन्होंने आपस में मिलकर अपनी समस्या का समाधान किया। उन्हें एहसास हुआ कि “भाई-भाई के लिये ऊंचा गढ़ होता है, और दीवारों वाला नगर भी ऐसा ही होता है” (नीतिवचन 18:19)। यदि वे एक-दूसरे का साथ देंगे, तो कोई भी समस्या उन्हें हरा नहीं सकती।
एलियाह ने अंत में कहा, “हे बच्चों, याद रखो कि ‘मनुष्य के मुंह के वचन गहरे जल के समान हैं; बुद्धि का सोता बहता हुआ नाला है’ (नीतिवचन 18:4)। तुम्हारे शब्दों में शक्ति है। उनका उपयोग सही तरीके से करो। एक-दूसरे को समझो, प्रेम करो, और परमेश्वर के मार्ग पर चलो।”
युवकों ने एलियाह का आभार व्यक्त किया और उस दिन से वे एक-दूसरे की बात सुनने और समझने का प्रयास करने लगे। गाँव में फिर से शांति और सद्भावना का वातावरण बन गया। एलियाह की बुद्धिमत्ता और परमेश्वर के वचन की शक्ति ने सभी को सही मार्ग दिखाया।
और इस तरह, गाँव के लोगों ने सीखा कि जीवन में सही निर्णय लेने के लिए परमेश्वर का डर और बुद्धि का होना अत्यंत आवश्यक है। एलियाह की शिक्षाएं उनके दिलों में हमेशा के लिए बस गईं, और वे परमेश्वर के मार्ग पर चलते रहे।