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प्रकाश की ओर: थिस्सलुनीकियों की प्रतीक्षा और तैयारी

1 थिस्सलुनीकियों 5 की कहानी को एक विस्तृत और जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हुए, हम प्रेरित पौलुस के उस पत्र को आधार बनाएंगे जो उसने थिस्सलुनीकी की मण्डली को लिखा था। यह पत्र उन्हें प्रोत्साहित करने, सचेत करने और उन्हें प्रभु यीशु मसीह के आगमन के लिए तैयार रहने की शिक्षा देने के लिए लिखा गया था। यह कहानी उस समय की पृष्ठभूमि में घटित होती है, जब थिस्सलुनीकी के विश्वासी प्रभु के आगमन को लेकर उत्सुक और कभी-कभी भ्रमित भी थे।

### प्रकाश और अंधकार का समय

थिस्सलुनीकी नगर में सूरज की किरणें धीरे-धीरे पश्चिम की ओर ढल रही थीं। आकाश में नारंगी और सुनहरे रंगों का मिश्रण हो रहा था, और हवा में एक शांति छाई हुई थी। लेकिन नगर के एक छोटे से घर में, जहाँ मसीही विश्वासी इकट्ठे हुए थे, वहाँ एक गहरी चर्चा चल रही थी। प्रभु यीशु मसीह के आगमन के बारे में उनके मन में कई प्रश्न थे। कुछ लोग चिंतित थे कि क्या वे प्रभु के आने के समय तैयार होंगे, जबकि कुछ को यह समझने में कठिनाई हो रही थी कि यह दिन कब और कैसे आएगा।

उसी समय, प्रेरित पौलुस, जो उन्हें मसीह का सुसमाचार सुनाने आया था, ने उन्हें एक पत्र लिखा। यह पत्र उनके प्रश्नों का उत्तर देने और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए था। पौलुस ने लिखा:

“हे भाइयों और बहनों, तुम्हें उन समयों और कालों के बारे में लिखने की आवश्यकता नहीं है। तुम स्वयं अच्छी तरह जानते हो कि प्रभु का दिन चोर की तरह आएगा। जब लोग कहेंगे, ‘शांति और सुरक्षा है,’ तब अचानक विनाश उन पर आ पड़ेगा, जैसे प्रसव पीड़ा गर्भवती स्त्री पर आती है, और वे बच नहीं सकेंगे।”

पौलुस के शब्दों ने उन्हें सचेत किया। उन्होंने समझाया कि प्रभु का दिन अचानक और अप्रत्याशित रूप से आएगा, और इसलिए उन्हें हमेशा तैयार रहना चाहिए। उसने कहा, “लेकिन हे भाइयों, तुम अंधकार में नहीं हो कि वह दिन तुम पर चोर की तरह आ जाए। तुम सब प्रकाश के सन्तान और दिन के सन्तान हो। हमें न तो अंधकार के हैं और न ही रात के।”

यह सुनकर, थिस्सलुनीकी के विश्वासियों के चेहरे पर एक नई चमक आ गई। उन्हें याद आया कि वे मसीह में नए जन्म ले चुके हैं और अब वे प्रकाश के सन्तान हैं। उन्हें अंधकार में नहीं रहना है, बल्कि प्रभु की उज्ज्वलता में चलना है।

पौलुस ने आगे लिखा, “इसलिए हमें नींद में नहीं सोना चाहिए, जैसे और लोग सोते हैं, बल्कि जागते और सचेत रहना चाहिए। क्योंकि जो सोते हैं, वे रात को सोते हैं, और जो मतवाले होते हैं, वे रात को मतवाले होते हैं। परन्तु हम, जो दिन के हैं, होशियार रहें और विश्वास और प्रेम की ढाल पहनें, और उद्धार की आशा को सिर का टोप बनाएं।”

ये शब्द उनके दिलों को छू गए। उन्होंने महसूस किया कि प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा करने का अर्थ केवल इंतज़ार करना नहीं है, बल्कि सक्रिय रूप से उसके लिए तैयार रहना है। उन्हें विश्वास, प्रेम और आशा के साथ जीवन जीना है।

पौलुस ने उन्हें यह भी याद दिलाया कि परमेश्वर ने उन्हें क्रोध के लिए नहीं, बल्कि उद्धार के लिए ठहराया है। उसने लिखा, “क्योंकि परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिए नहीं, बल्कि इसलिए ठहराया है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें, जो हमारे लिए मरा ताकि हम, चाहे जागते हों या सोते हों, उसके साथ जीवन बिताएं।”

इस प्रकार, पौलुस ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे एक-दूसरे को सांत्वना दें और आपस में प्रेम बढ़ाएं। उसने कहा, “इसलिए एक-दूसरे को सांत्वना दो, और एक-दूसरे का निर्माण करो, जैसा कि तुम करते भी हो।”

अंत में, पौलुस ने उन्हें कुछ व्यावहारिक निर्देश दिए। उसने कहा, “हम तुमसे बिनती करते हैं, हे भाइयों, अपने अगुवों का आदर करो, जो प्रभु में तुम पर प्रभुता करते हैं और तुम्हें चेतावनी देते हैं। उन्हें अत्यधिक प्रेम के साथ सम्मान दो, क्योंकि वे तुम्हारे लिए परिश्रम करते हैं। एक-दूसरे के साथ शांति से रहो। हे भाइयों, हम तुमसे बिनती करते हैं कि जो लोग आलसी हैं, उन्हें चेतावनी दो; जो हतोत्साहित हैं, उन्हें सांत्वना दो; जो कमज़ोर हैं, उनकी सहायता करो; और सबके प्रति सहनशील बनो।”

पौलुस ने उन्हें यह भी सिखाया कि वे हर समय आनन्दित रहें, निरंतर प्रार्थना करें, और हर परिस्थिति में धन्यवाद दें। उसने लिखा, “हर समय आनन्दित रहो। निरंतर प्रार्थना करो। हर बात में धन्यवाद दो, क्योंकि मसीह यीशु में तुम्हारे लिए परमेश्वर की यही इच्छा है।”

पौलुस ने उन्हें आत्मा के बुझाने के खिलाफ चेतावनी दी और उन्हें सत्य की परख करने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने कहा, “आत्मा को बुझाओ मत। भविष्यवाणियों को तुच्छ न समझो। सब बातों को परखो, और जो अच्छा है, उसे पकड़े रहो। हर प्रकार की बुराई से दूर रहो।”

अंत में, पौलुस ने उन्हें आशीर्वाद दिया और परमेश्वर की कृपा की कामना की। उसने लिखा, “शांति का परमेश्वर आपको पूरी तरह पवित्र करे। आपका आत्मा, प्राण और शरीर हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर निर्दोष रहें। जो बुलाता है, वह विश्वासयोग्य है; वही इसे पूरा करेगा।”

इस पत्र को पढ़कर, थिस्सलुनीकी के विश्वासियों के हृदय में एक नई उमंग भर गई। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे प्रभु के आगमन के लिए तैयार रहेंगे, एक-दूसरे का सहारा बनेंगे, और प्रभु की सेवा में लगे रहेंगे। उन्होंने महसूस किया कि प्रभु का दिन न केवल भयावह होगा, बल्कि उनके लिए उद्धार और आनन्द का दिन भी होगा।

और इस प्रकार, थिस्सलुनीकी की मण्डली ने पौलुस के शब्दों को अपने जीवन में उतारा, और वे प्रभु की महिमा के लिए जीवन जीने लगे।

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