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यशायाह का संदेश: पाप से पश्चाताप और परमेश्वर की ओर लौटो

यशायाह की पुस्तक का पहला अध्याय एक ऐसा अध्याय है जो यहूदा और यरूशलेम के लोगों के पापों और उनकी अवज्ञा को उजागर करता है। यह एक ऐसा समय था जब लोगों ने परमेश्वर के साथ अपना रिश्ता खो दिया था, और उनके कर्म उनकी आत्मिक दूरी को दर्शाते थे। यशायाह नबी के माध्यम से परमेश्वर ने उन्हें एक शक्तिशाली संदेश दिया, जो आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है।

यह कहानी यरूशलेम के उस समय की है जब शहर अपने गौरव के शिखर पर था, लेकिन उसकी आत्मिक हालत बहुत ही दयनीय थी। यरूशलेम, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों का केंद्र था, अब पाप और अवज्ञा से भर गया था। लोग बाहरी तौर पर धार्मिक दिखते थे, लेकिन उनके दिल परमेश्वर से दूर थे। वे बलिदान चढ़ाते थे, प्रार्थना करते थे, और पर्व मनाते थे, लेकिन उनके कर्म अन्याय और अत्याचार से भरे हुए थे।

एक दिन, यशायाह नबी को परमेश्वर का वचन मिला। वह यरूशलेम के बीच में खड़ा हुआ और उसने लोगों को संबोधित किया। उसकी आवाज़ गंभीर और दृढ़ थी, जैसे किसी पहाड़ की गर्जना। उसने कहा, “सुनो, हे आकाश! और हे पृथ्वी, ध्यान दो! क्योंकि यहोवा यह कहता है: ‘मैंने अपने बच्चों को पाला-पोसा और बड़ा किया, परन्तु उन्होंने मेरे विरुद्ध विद्रोह किया। बैल अपने मालिक को जानता है, और गधा अपने स्वामी की चरनी को पहचानता है, परन्तु इस्राएल नहीं जानता, मेरी प्रजा समझती नहीं।'”

यशायाह की बातें लोगों के दिलों में गूंज उठीं। उसने उनके पापों को उजागर किया और उन्हें बताया कि उनके बलिदान और प्रार्थनाएँ परमेश्वर के लिए व्यर्थ हैं। उसने कहा, “तुम्हारे बलिदानों से मुझे घृणा है। तुम्हारे मेलबलिदानों से मेरा मन भर गया है। तुम जो मेरे सामने आते हो, वह मुझे स्वीकार्य नहीं है। तुम्हारे हाथ खून से भरे हुए हैं। अपने आप को शुद्ध करो, बुराई करना छोड़ दो, भलाई करना सीखो, न्याय करो, अनाथ की सहायता करो, विधवा का न्याय लड़ो।”

यशायाह की बातें कठोर थीं, लेकिन उनमें आशा का संदेश भी छिपा हुआ था। उसने लोगों से कहा कि यदि वे अपने पापों से पश्चाताप करें और परमेश्वर की ओर लौटें, तो वह उन्हें क्षमा करेगा और उन्हें नया जीवन देगा। उसने कहा, “चाहे तुम्हारे पाप लाल रंग के हों, तौभी वे हिम के समान श्वेत हो जाएंगे; चाहे वे रक्त के समान लाल हों, तौभी वे ऊन के समान श्वेत हो जाएंगे।”

यशायाह के शब्दों ने कुछ लोगों के दिलों को छू लिया। वे अपने पापों पर शर्मिंदा हुए और परमेश्वर के सामने झुक गए। उन्होंने अपने जीवन को बदलने का निर्णय लिया और न्याय और धार्मिकता के मार्ग पर चलने का वचन दिया। लेकिन कुछ लोगों ने यशायाह की बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया और अपने पापों में डटे रहे।

यशायाह ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि वे नहीं सुधरेंगे, तो परमेश्वर का न्याय उन पर आएगा। उसने कहा, “तुम्हारे देश में विदेशी लोग आएंगे, और तुम्हारे शहरों को नष्ट कर दिया जाएगा। तुम्हारे दाख की बारियाँ और खेत बर्बाद हो जाएंगे। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।”

यशायाह के शब्दों में दर्द और करुणा थी। वह चाहता था कि लोग समझें कि परमेश्वर उनसे प्यार करता है और उन्हें बचाना चाहता है। लेकिन उन्हें अपने पापों से मुंह मोड़ना होगा और परमेश्वर की ओर लौटना होगा।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि परमेश्वर हमारे बाहरी धार्मिक कर्मों से नहीं, बल्कि हमारे दिल की हालत से प्रभावित होता है। यदि हमारे दिल पाप से भरे हुए हैं, तो हमारी प्रार्थनाएँ और बलिदान व्यर्थ हैं। परमेश्वर चाहता है कि हम न्याय करें, दया दिखाएँ, और उसके साथ चलें। यदि हम ऐसा करेंगे, तो वह हमें क्षमा करेगा और हमें नया जीवन देगा।

यशायाह का संदेश आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है। हमें अपने जीवन को जाँचना चाहिए और देखना चाहिए कि कहीं हम भी बाहरी धार्मिकता के पीछे छिपे हुए पापों में तो नहीं जी रहे हैं। परमेश्वर हमें बुला रहा है कि हम उसकी ओर लौटें और उसकी कृपा और दया का अनुभव करें।

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