न्यायियों 11 की कहानी यहूदा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है, जो यिप्तह नामक एक व्यक्ति के जीवन और उसकी सेवकाई को दर्शाती है। यिप्तह एक वीर योद्धा और न्यायी था, जिसका जीवन परमेश्वर की महिमा और उसकी योजना को प्रकट करता है। यह कहानी उसके संघर्ष, विश्वास और परमेश्वर के साथ उसके वाचा को दर्शाती है।
यिप्तह गिलाद का पुत्र था, लेकिन उसकी माँ एक वेश्या थी। इस कारण उसके सौतेले भाइयों ने उसे घर से निकाल दिया और कहा, “तू हमारे पिता के घर में मीरास नहीं पाएगा, क्योंकि तू दूसरी स्त्री का पुत्र है।” यिप्तह को अपने परिवार से दूर जाना पड़ा और वह तोब नामक स्थान पर रहने लगा। वहाँ उसके आसपास कुछ लोग इकट्ठे हो गए, जो उसके साथ रहने लगे और उसके नेतृत्व में चलने लगे। यिप्तह एक वीर योद्धा बन गया, और उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।
कुछ समय बाद, अम्मोनियों ने इस्राएल के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। इस्राएल के लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें, क्योंकि उनके पास कोई ऐसा नेता नहीं था जो उन्हें युद्ध में ले जा सके। तब गिलाद के पुरनियों ने यिप्तह के पास जाकर कहा, “हमारे साथ चल और हमारा नेता बन, ताकि हम अम्मोनियों के विरुद्ध लड़ सकें।”
यिप्तह ने उनसे कहा, “क्या तुम लोग नहीं हो जिन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था? अब जब तुम्हें संकट में देखते हो, तो मुझे याद आया?” गिलाद के पुरनियों ने उससे विनती की और कहा, “हम तुझे अपना प्रधान बनाने आए हैं, ताकि तू हमारे साथ रहे और अम्मोनियों के विरुद्ध लड़े।” यिप्तह ने उनकी बात मान ली और उनके साथ चल दिया।
यिप्तह ने परमेश्वर के सामने एक वाचा बाँधी। उसने कहा, “यदि तू मुझे अम्मोनियों के हाथ में कर देगा, तो जो कुछ भी मेरे घर के द्वार से निकलकर मुझे मिलेगा, वह मैं तुझे होमबलि के रूप में चढ़ाऊँगा।” यिप्तह ने अम्मोनियों के विरुद्ध युद्ध किया और परमेश्वर ने उसे विजय दिलाई। वह बड़ी शक्ति के साथ लड़ा और अम्मोनियों को हरा दिया।
जब यिप्तह अपने घर लौटा, तो उसकी इकलौती बेटी नृत्य करते हुए उससे मिलने आई। यिप्तह ने जब उसे देखा, तो उसका हृदय टूट गया। उसने अपने वस्त्र फाड़े और कहा, “हे मेरी बेटी, तू ने मुझे बहुत दुःख दिया है, क्योंकि मैंने परमेश्वर के सामने एक वाचा बाँधी है और अब मुझे उसे पूरा करना होगा।” उसकी बेटी ने उत्तर दिया, “हे मेरे पिता, यदि तूने परमेश्वर के सामने वाचा बाँधी है, तो मुझे वही करना चाहिए जो तूने कहा है। केवल मुझे दो महीने का समय दे, ताकि मैं अपनी सहेलियों के साथ पहाड़ों पर जाकर अपनी कुँवारीपन पर विलाप कर सकूँ।”
यिप्तह ने उसे दो महीने का समय दिया, और वह अपनी सहेलियों के साथ पहाड़ों पर गई। दो महीने बाद, वह वापस आई, और यिप्तह ने अपनी वाचा के अनुसार उसे परमेश्वर को होमबलि के रूप में चढ़ा दिया। इस्राएल में यह एक प्रथा बन गई कि इस्राएल की कन्याएँ हर साल चार दिन तक यिप्तह की बेटी के लिए विलाप करती थीं।
यिप्तह की कहानी हमें परमेश्वर के प्रति वफादारी और उसकी योजना के प्रति समर्पण की शिक्षा देती है। यह हमें यह भी सिखाती है कि परमेश्वर के साथ बाँधी गई वाचा को पूरा करना कितना महत्वपूर्ण है, चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो। यिप्तह का जीवन इस्राएल के लिए एक आशीष बन गया, और उसकी कहानी आज भी हमें परमेश्वर की महिमा और उसकी योजना की याद दिलाती है।