एक समय की बात है, जब दाऊद, इस्राएल के महान राजा और परमेश्वर के प्रिय भक्त, एक गहरे संकट में थे। उनके चारों ओर शत्रुओं ने घेरा डाल रखा था, और वे अपने जीवन के लिए डर रहे थे। उनके विरोधी चालाकी से उनके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे थे, और उनकी जान लेने के लिए तरह-तरह की योजनाएँ बना रहे थे। दाऊद ने महसूस किया कि वे अकेले हैं और उन्हें परमेश्वर की सुरक्षा की आवश्यकता है। इसी समय, उन्होंने भजन संहिता 64 को लिखा, जो उनकी प्रार्थना और परमेश्वर में उनके विश्वास का प्रतीक बन गया।
दाऊद ने अपनी प्रार्थना में परमेश्वर से कहा, “हे परमेश्वर, मेरी प्रार्थना सुन! मेरे जीवन के भय से मुझे बचा। मेरे शत्रु मुझे घेर कर खड़े हैं, और वे मेरे खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं। वे अपनी जीभ को तलवार की तरह चलाते हैं और अपने शब्दों को बाणों की तरह छोड़ते हैं। वे अंधेरे में छिपकर निर्दोषों पर हमला करते हैं और अचानक से उन पर टूट पड़ते हैं, बिना किसी डर के।”
दाऊद ने अपने शत्रुओं के बारे में विस्तार से बताया कि कैसे वे गुप्त रूप से उनके खिलाफ योजनाएँ बना रहे थे। वे एक-दूसरे से कहते थे, “कौन हमें देख सकता है? कौन हमारे कामों को जान सकता है?” वे बुराई के जाल बुन रहे थे और सोच रहे थे कि उनकी योजनाएँ कभी विफल नहीं होंगी। वे अपने दिलों में कहते थे, “हमने एक सिद्ध योजना बनाई है।” उनके मन गहरे और चालाकी से भरे हुए थे।
लेकिन दाऊद ने परमेश्वर पर भरोसा रखा। उन्होंने कहा, “परमेश्वर अचानक उन पर अपने बाण चलाएगा और उन्हें घायल कर देगा। वे अपने ही शब्दों के कारण गिरेंगे। जो कुछ भी उन्होंने कहा है, वह उनके खिलाफ ही काम करेगा। सब लोग उन्हें देखेंगे और डरेंगे, और वे परमेश्वर के कामों का प्रचार करेंगे।”
दाऊद ने परमेश्वर की स्तुति की और कहा, “धर्मी लोग परमेश्वर में आनन्दित होंगे और उसकी शरण लेंगे। वे जो सीधे मन के हैं, वे उसकी महिमा का गुणगान करेंगे।” दाऊद का विश्वास अटूट था। वे जानते थे कि परमेश्वर उनके साथ है और उन्हें उनके शत्रुओं से बचाएगा।
कुछ समय बाद, परमेश्वर ने दाऊद की प्रार्थना सुनी। उनके शत्रु अपनी ही चालों में फँस गए। जो योजनाएँ उन्होंने दाऊद के खिलाफ बनाई थीं, वे उनके खिलाफ ही काम करने लगीं। उनके अपने शब्द उनके लिए जाल बन गए, और वे अपने ही षड्यंत्रों में उलझ कर रह गए। लोगों ने देखा कि कैसे परमेश्वर ने दाऊद को बचाया और उनके शत्रुओं को उनके अपने कर्मों का फल मिला। सबने परमेश्वर की सामर्थ्य और न्याय को देखा और उसकी महिमा की।
दाऊद ने फिर से परमेश्वर की स्तुति की और कहा, “हे परमेश्वर, तू ही मेरा सहारा है। तूने मुझे मेरे शत्रुओं से बचाया और मेरे जीवन की रक्षा की। मैं तेरी महिमा का गुणगान करूँगा और तेरे नाम की स्तुति करूँगा।”
इस प्रकार, दाऊद की कहानी हमें सिखाती है कि चाहे हम कितने भी बड़े संकट में क्यों न हों, परमेश्वर हमारी प्रार्थना सुनता है और हमें बचाता है। हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी स्तुति करनी चाहिए, क्योंकि वही हमारा सच्चा सहारा और रक्षक है।