पवित्र बाइबल

दाऊद की भक्ति और मंदिर की व्यवस्था

1 इतिहास 23 की कहानी को विस्तार से और जीवंत वर्णन के साथ प्रस्तुत करते हुए, हम इस प्रकार लिख सकते हैं:

दाऊद का जीवन अपने अंतिम दिनों में पहुँच चुका था। वह बूढ़ा हो गया था, और उसने महसूस किया कि अब उसका समय इस पृथ्वी पर समाप्त होने वाला है। परमेश्वर के प्रति उसकी सेवा और भक्ति ने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि उसके बाद क्या होगा। उसने सोचा कि परमेश्वर के मंदिर की व्यवस्था और सेवा को सुचारु रूप से चलाने के लिए क्या कदम उठाए जाएँ। दाऊद ने महसूस किया कि उसका पुत्र सुलैमान, जो उसके बाद राजा बनेगा, उसके लिए यह जिम्मेदारी संभालेगा। लेकिन दाऊद चाहता था कि वह सब कुछ व्यवस्थित करके जाए ताकि सुलैमान के लिए काम आसान हो जाए।

एक दिन, दाऊद ने इस्राएल के सभी प्रमुखों, याजकों, और लेवियों को इकट्ठा किया। वह एक विशाल सभा में खड़ा हुआ और उनसे बोला, “हे मेरे भाइयों, परमेश्वर ने मुझे इस्राएल का राजा बनाया और मुझे उसके मंदिर के निर्माण की इच्छा दी। परन्तु परमेश्वर ने मुझे बताया कि मैं उस मंदिर का निर्माण नहीं करूँगा, क्योंकि मैं युद्धों में लिप्त रहा हूँ। यह कार्य मेरे पुत्र सुलैमान को सौंपा गया है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि हम सब मिलकर उसके लिए मार्ग प्रशस्त करें।”

दाऊद ने आगे कहा, “लेवी वंश के लोगों को परमेश्वर ने विशेष रूप से चुना है कि वे उसकी सेवा करें। उन्हें मंदिर के कार्यों, यज्ञों, और परमेश्वर की आराधना के लिए नियुक्त किया गया है। अब समय आ गया है कि हम लेवियों की संख्या और उनके कार्यों को व्यवस्थित करें।”

दाऊद ने लेवियों की गिनती करवाई, और पाया कि तीस साल और उससे ऊपर के लेवियों की संख्या 38,000 थी। उनमें से 24,000 को मंदिर के कामों पर नियुक्त किया गया, 6,000 को अधिकारी और न्यायाधीश बनाया गया, 4,000 को द्वारपाल के रूप में नियुक्त किया गया, और शेष 4,000 को संगीतकार बनाया गया, जो परमेश्वर की स्तुति और आराधना के लिए वाद्य यंत्र बजाते थे।

दाऊद ने लेवियों को उनके परिवारों और कुलों के अनुसार विभाजित किया। उन्हें तीन मुख्य समूहों में बाँटा गया: गेर्शोन के वंशज, कहात के वंशज, और मरारी के वंशज। प्रत्येक समूह को अलग-अलग जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं। गेर्शोन के वंशजों को मंदिर के आवरण और पर्दों की देखभाल करनी थी। कहात के वंशजों को पवित्र वस्तुओं और मंदिर के पवित्र स्थान की देखभाल करनी थी। मरारी के वंशजों को मंदिर के ढाँचे और उसके सामान की देखभाल करनी थी।

दाऊद ने यह भी व्यवस्था की कि लेवियों की सेवा 20 साल की उम्र से शुरू होगी। उसने कहा, “परमेश्वर ने लेवियों को आराम दिया है। अब उन्हें युद्ध नहीं लड़ना है, न ही उन्हें भारी बोझ उठाना है। उनका काम परमेश्वर की सेवा करना और उसके मंदिर की देखभाल करना है।”

दाऊद ने संगीतकारों के लिए विशेष व्यवस्था की। उसने आसाप, हेमान, और यदूथून के पुत्रों को संगीत के नेतृत्वकर्ता बनाया। उन्होंने सिंगी, वीणा, और झाँझ जैसे वाद्य यंत्रों का उपयोग करके परमेश्वर की स्तुति की। दाऊद ने कहा, “परमेश्वर की स्तुति और आराधना हमारे जीवन का केंद्र होनी चाहिए। संगीत के माध्यम से हम उसकी महिमा का बखान करते हैं।”

इस प्रकार, दाऊद ने लेवियों की सेवा को पूरी तरह से व्यवस्थित कर दिया। उसने हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखा ताकि परमेश्वर का मंदिर सुचारु रूप से चल सके। दाऊद ने सुलैमान से कहा, “हे मेरे पुत्र, परमेश्वर तेरे साथ है। वह तुझे बुद्धि और समझ देगा कि तू उसके मंदिर का निर्माण कर सके। मैंने सब कुछ तैयार कर दिया है, अब तेरी बारी है।”

दाऊद की यह व्यवस्था परमेश्वर के प्रति उसकी गहरी भक्ति और समर्पण को दर्शाती है। उसने न केवल अपने जीवनकाल में परमेश्वर की सेवा की, बल्कि अपने बाद की पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत नींव रखी। इस्राएल के लोगों ने दाऊद की इस व्यवस्था को स्वीकार किया और परमेश्वर की आराधना में लगे रहे।

इस प्रकार, 1 इतिहास 23 की कहानी हमें यह सिखाती है कि परमेश्वर की सेवा करने के लिए व्यवस्था और समर्पण की आवश्यकता होती है। दाऊद ने यह दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति अपने जीवन को परमेश्वर के लिए समर्पित कर सकता है और उसकी महिमा के लिए काम कर सकता है।

यह कहानी 1 इतिहास 23 के आधार पर लिखी गई है और इसमें दाऊद के जीवन के अंतिम दिनों और उसकी परमेश्वर के प्रति भक्ति को दर्शाया गया है।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *