पवित्र बाइबल

पिता विद्रोह और दाऊद का पलायन

दाऊद राजा के जीवन का एक अत्यंत दुःखद और चुनौतीपूर्ण अध्याय उस समय आरंभ हुआ जब उसका अपना पुत्र अबशालोम उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगा। अबशालोम ने धीरे-धीरे लोगों के मन में अपने पिता के प्रति असंतोष का बीज बोना शुरू किया। वह प्रातःकाल उठकर नगर के फाटक के पास जाकर खड़ा हो जाता और जो भी व्यक्ति न्याय के लिए राजा के पास आता, उससे वह मधुर वचनों में कहता, “तुम्हारा पक्ष तो ठीक और सच्चा है, परन्तु राजा की ओर से तुम्हारा सुननेवाला कोई नहीं है।”

अबशालोम यह भी कहता, “काश! मैं इस देश में न्यायी ठहराया जाता! तब जो कोई मुकद्दमा या विवाद लेकर आता, मैं उसके अनुसार न्याय करता।” जब कोई व्यक्ति उसे प्रणाम करने के लिए झुकता, तो वह अपना हाथ बढ़ाकर उसे गले लगा लेता और चूमता। इस प्रकार उसने इस्राएलियों के मन को चुरा लिया।

चार वर्ष बीतने पर अबशालोम ने राजा दाऊद से कहा, “मैं यरूशलेम जाकर यहोवा की मन्नत पूरी करना चाहता हूँ।” राजा ने उसे आज्ञा दी, “कुशलता से जा।” परन्तु अबशालोम का उद्देश्य भिन्न था। उसने हेब्रोन में जाकर अपने लोगों को इकट्ठा किया और स्वयं को राजा घोषित कर दिया।

जब यह समाचार दाऊद के पास पहुँचा, तो उसके हृदय में गहरा आघात लगा। उसने तुरंत अपने सभी सेवकों से कहा, “हमें तुरंत यरूशलेम से भागना चाहिए, नहीं तो अबशालोम हम सबको नष्ट कर देगा।” राजा अपने घर के सभी लोगों को लेकर शहर से निकल गया, केवल दस उपपत्नियों को महल की रखवाली के लिए छोड़ दिया।

दाऊद का हृदय टूटा हुआ था। वह रोते हुए जा रहा था, उसके पैरों में जूते भी नहीं थे और उसका सिर ढका हुआ था। जैसे-जैसे वे जंगल के रास्ते से आगे बढ़ रहे थे, लोग उनके पीछे चिल्ला रहे थे। एक व्यक्ति शिमी नामक शाऊल के कुल का था, वह दाऊद को कोसते हुए पत्थर फेंक रहा था और कह रहा था, “हे खूनी! हे दुष्ट! तेरा सर्वनाश हो!”

दाऊद के साथ चल रहे अबीशै ने कहा, “यह मुर्दा कुत्ता मेरे स्वामी राजा को क्यों कोसता रहता है? मुझे आज्ञा दो, मैं उसका सिर धड़ से अलग कर दूँ।” परन्तु दाऊद ने उसे रोकते हुए कहा, “यहोवा ने ही उसे मेरे विरुद्ध कोसने के लिए कहा है। हो सकता है यहोवा मेरे क्लेश को देखकर मुझ पर अच्छाई लौटाए।”

इसी बीच, अबशालोम अपनी सेना के साथ यरूशलेम में प्रवेश कर चुका था। उसने दाऊद के मित्र हुशै को बुलाया और कहा, “क्या तू मेरे साथ रहेगा?” हुशै ने चतुराई से कहा, “जैसे राजा का पुत्र है, वैसे ही मैं तेरा होकर रहूँगा।” परन्तु हुशै का वास्तविक उद्देश्य अबशालोम की योजनाओं को विफल करना और दाऊद के लिए जासूसी करना था।

जब दाऊद यरदन नदी के पार जंगल में पहुँचा, तो उसने प्रार्थना की, “हे यहोवा, मैं तेरी शरण में आया हूँ। तू ही मेरी शक्ति और मेरी ढाल है।” उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, परन्तु उसका विश्वास अडिग था। उसने अपने मित्रों से कहा, “यहोवा न्यायी है, वह मेरे और अबशालोम के बीच में न्याय करेगा।”

इस प्रकार दाऊद का जंगल में पलायन उसकी आस्था की एक गहरी परीक्षा बन गया। वह जानता था कि यहोवा उसके साथ है और अंत में सत्य की विजय होगी। उसकी यह आशा और विश्वास ही उसके लिए इस कठिन समय में सबसे बड़ा सहारा बना रहा।

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