एक समय की बात है, यरूशलेम के एक बुद्धिमान राजा ने, जो स्वयं को सभी सांसारिक सुखों में डुबो चुका था, एक गहन चिंतन किया। वह महल के उस ऊँचे कमरे में बैठा था जहाँ से संपूर्ण नगर दिखाई देता था। सूर्य की किरणें सोने के बर्तनों पर पड़ रही थीं और हवा में सुगंधित धूप की महक घुल रही थी।
उसने अपने जीवन के हर पल को याद किया – विलासिता के महल, असंख्य दास-दासियाँ, उद्यान और झरने, संगीत और नृत्य के कार्यक्रम। किंतु आज उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। उसने महसूस किया कि जन्मदिन के उत्सव से अधिक मूल्यवान है मृत्यु का दिन, क्योंकि मृत्यु मनुष्य को उसके जीवन की सार्थकता का बोध कराती है।
वह धीरे-धीरे महल से बाहर निकला और शहर की सड़कों पर टहलने लगा। एक ओर विवाह के घर से संगीत की ध्वनि आ रही थी, तो दूसरी ओर शोक मनाते हुए एक परिवार को देखकर उसने कहा – “हँसी की ध्वनि से अधिक बुद्धिमानी भरी है शोक की ध्वनि, क्योंकि दुःख मनुष्य के हृदय को शुद्ध करता है।”
वह आगे बढ़ा तो एक कुम्हार की दुकान पर रुका। कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था। कभी वह बर्तन को सुंदर आकार देता, कभी तोड़कर फिर से नया रूप देता। राजा ने सोचा – “जिस प्रकार कुम्हार की कला पूर्णता के लिए संघर्ष करती है, वैसे ही परमेश्वर की ओर से आने वाली कठिनाइयाँ हमें संपूर्ण बनाती हैं।”
दोपहर के समय वह बाजार पहुँचा। वहाँ एक धनी व्यापारी अपनी सफलता का डिंगल हाँक रहा था, जबकि एक गरीब विद्वान चुपचाप अपनी पुस्तकें बेच रहा था। राजा ने अनुभव किया कि “अतीत के दिन वर्तमान से बेहतर थे, क्योंकि तब लोग संतोष और सादगी को महत्व देते थे।”
संध्या होते-होते वह एक बागीचे में पहुँचा। वहाँ खजूर के पेड़ों के नीचे बैठकर उसने प्रकृति का अवलोकन किया। एक चींटी लगातार अनाज के दाने ले जा रही थी, जबकि एक तितली बेफिक्र घूम रही थी। उसने सीखा कि “धीरज रखना घमंड से बेहतर है, और आत्मा पर नियंत्रण रखना शहरों को जीतने से श्रेष्ठ है।”
रात होने पर जब वह महल लौटा, तो उसने अपने अनुभवों को एक पुस्तक में लिखा – “सब कुछ देख लेने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, किंतु मनुष्य ने अपने लिए अनगिनत जटिलताएँ खोज निकाली हैं। जो धर्मी अपनी धार्मिकता में नाश हो जाता है, और जो दुष्ट अपनी दुष्टता से लंबी आयु पाता है – यह सब परमेश्वर की अगम्य योजना का भाग है।”
अंत में उसने लिखा – “सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि हम परमेश्वर की दृष्टि में अच्छे बनें, उसके भय में जीवन व्यतीत करें, और उस दिन के लिए तैयार रहें जब हमें अपने सभी कर्मों का हिसाब देना होगा। क्योंकि मनुष्य का अंतिम लक्ष्य परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना है, और यही समस्त मानव जीवन का सार है।”
इस प्रकार राजा ने जीवन के रहस्यों को समझा और अपनी बुद्धिमानी को परमेश्वर की इच्छा के अधीन कर दिया, क्योंकि वह जान गया था कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को परमेश्वर के निकट ले जाए।




