यह कहानी उस महान विश्वास की है जो इब्राहीम ने परमेश्वर में दिखाया था। उन दिनों में जब संसार अंधकार में डूबा हुआ था, इब्राहीम एक साधारण मनुष्य थे, जो अपने पितरों के देवताओं की पूजा करते थे। परन्तु एक दिन, स्वर्ग की महिमा ने उनके हृदय को छू लिया और परमेश्वर की वाणी उनके कानों में गूँज उठी।
परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, “अपने देश और अपने कुटुम्ब को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा। मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा।”
इब्राहीम ने बिना किसी प्रश्न के, बिना किसी संदेह के, परमेश्वर की इस आज्ञा का पालन किया। वे अपनी पत्नी सारा और भतीजे लूत के साथ अज्ञात भूमि की ओर चल पड़े। रेत के टीलों पर उनके पैरों के निशान, धूप में चमकते हुए, विश्वास की इस यात्रा के गवाह बने।
वर्षों बीत गए। इब्राहीम और सारा बूढ़े हो चले थे, परन्तु परमेश्वर का वचन अटल रहा। एक शाम, जब सूरज डूब रहा था और आकाश में तारे जगमगा रहे थे, परमेश्वर ने इब्राहीम को बाहर ले जाकर कहा, “आकाश की ओर देखो और तारे गिनो। यदि तू गिन सके तो।” इब्राहीम ने ऊपर देखा – अनगिनत तारे आकाश में टिमटिमा रहे थे, जैसे स्वर्ग के दीपक। परमेश्वर ने कहा, “तेरी सन्तान ऐसी ही अनगिनत होगी।”
इब्राहीम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह विश्वास ही उनके लिए धर्म गिना गया। वे सौ वर्ष के थे और सारा नब्बे वर्ष की, जब परमेश्वर का चमत्कार हुआ। इसहाक का जन्म हुआ – हँसी का पुत्र, वादे की सन्तान।
परमेश्वर ने इब्राहीम की परीक्षा लेने का निश्चय किया। एक सुबह, जब पहाड़ों पर सूरज की किरणें नाच रही थीं, परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, “अपने पुत्र इसहाक को लेकर मोरिया देश में चला जा, और उसे होमबलि के रूप में चढ़ा दे।”
इब्राहीम का हृदय टूट गया, परन्तु उनका विश्वास डगमगाया नहीं। भोर में उठकर उन्होंने लकड़ी काटी, अपने पुत्र इसहाक को साथ लिया, और तीन दिन की यात्रा के बाद उस पहाड़ पर पहुँचे जिसे परमेश्वर ने दिखाया था। इसहाक ने पूछा, “पिताजी, होमबलि के लिए लकड़ी और आग तो है, पर मेमना कहाँ है?”
इब्राहीम ने उत्तर दिया, “हे पुत्र, परमेश्वर होमबलि के लिए अपना मेमना आप ही देगा।”
जैसे ही इब्राहीम ने छुरी उठाई, स्वर्गदूत की वाणी गूँजी, “इब्राहीम! इब्राहीम! अपने हाथ लड़के पर न बढ़ा, क्योंकि अब मैं जान गया कि तू परमेश्वर का भक्त है।”
इब्राहीम ने मुँह उठाकर देखा – एक मेढ़ा झाड़ी में फँसा हुआ था। उन्होंने उसे बलि चढ़ाया, और उस स्थान का नाम “यहोवा यिरे” रखा – परमेश्वर देखता है।
इब्राहीम का यह विश्वास, यह आशा जो आशा के विरुद्ध आशा थी, उनके लिए धर्म गिना गया। वे केवल व्यवस्था के कारण नहीं, बल्कि विश्वास के कारण धर्मी ठहरे। और यही आशीष हम सबके लिए है – कि जो व्यवस्था के कर्मों पर नहीं, बल्कि उस विश्वास पर धर्मी ठहरते हैं, जो इब्राहीम ने दिखाया था।
जैसे इब्राहीम ने परमेश्वर पर विश्वास किया जो मुर्दों में जिलाता और न होने वाली वस्तुओं को होने का कहता है, वैसे ही हम भी उस परमेश्वर पर विश्वास करें जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया, जो हमारे अपराधों के कारण पकड़वाया गया और हमारे धर्मी ठहरने के लिए जिलाया गया।




