पवित्र बाइबल

मिट्टी के बर्तनों में खजाना

एक समय की बात है, जब प्रेरित पौलुस कुरिन्थुस की मण्डली को एक पत्र लिख रहे थे। उनके हाथ में कलम थी, परन्तु उनके हृदय में परमेश्वर का आत्मा बोल रहा था। वह एक ऐसा सन्देश लिखना चाहते थे जो मसीही सेवकों के संघर्षों और विजयों को प्रकट करे।

पौलुस ने लिखा, “हमारी सेवकाई इस अनमोल खजाने को मिट्टी के बर्तनों में रखने के समान है।” उन्होंने विस्तार से समझाया कि जिस प्रकार साधारण मिट्टी के घड़े में कोई बहुमूल्य रत्न रखा जाता है, उसी प्रकार परमेश्वर ने अपना महिमामय सुसमाचार हमारी नश्वर देहों में रख दिया है। यह इसलिए ताकि सारी महिमा परमेश्वर की हो, मनुष्यों की नहीं।

वह आगे लिखते गए, “हम चारों ओर से क्लेशों से घिरे हैं, परन्तु निराश नहीं हैं। हमारे रास्ते में अनेकों बाधाएँ आती हैं, परन्तु हम हार नहीं मानते। हमें सताया जाता है, परन्तु परमेश्वर हमें कभी अकेला नहीं छोड़ते।”

पौलुस ने अपने स्वयं के अनुभवों को याद किया – वे दिन जब उन्हें कोड़े खाने पड़े, जेल में बंद रहना पड़ा, यात्राओं के दौरान खतरों का सामना करना पड़ा। परन्तु हर कठिनाई में, वह परमेश्वर की सामर्थ्य को और अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव करते थे।

“हम हमेशा यीशु की मृत्यु को अपने शरीर में ढोते हैं,” पौलुस ने लिखा, “ताकि यीशु का जीवन भी हमारे शरीर में प्रकट हो।” यह एक गहन सत्य था – जैसे एक बीज मरकर नया जीवन उत्पन्न करता है, वैसे ही मसीही सेवकों के क्लेश उनके द्वारा दूसरों तक पहुँचने वाले जीवन का माध्य बनते हैं।

पत्र में आगे लिखा गया, “हमारी दृष्टि देखने योग्य वस्तुओं पर नहीं, परन्तु अनदेखी वस्तुओं पर लगी है। क्योंकि देखने योग्य वस्तुएँ तो अस्थायी हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदैव बनी रहने वाली हैं।” ये शब्द पढ़ने वालों को स्वर्गीय वास्तविकता की याद दिलाते थे।

पौलुस ने अपनी लेखनी को और गति दी, “हम जानते हैं कि जिसने प्रभु यीशु को मरे हुओं में से जिलाया, वह हमें भी यीशु के साथ जिलाकर खड़ा करेगा।” यह आशा की वह नींव थी जिस पर हर मसीही सेवक अपना जीवन खड़ा कर सकता था।

अंत में, पौलुस ने लिखा, “इसलिए हम हिम्मत नहीं हारते। भले ही हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश हो रहा है, परन्तु हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदन नया होता जाता है।”

यह पत्र कुरिन्थुस के विश्वासियों के पास पहुँचा तो उनके हृदयों में नई सामर्थ्य भर गई। उन्होंने समझा कि उनके क्लेश व्यर्थ नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की महिमा को प्रकट करने के साधन हैं। और इस प्रकार, पौलुस के ये शब्द केवल कागज पर नहीं, बल्कि अनगिनत मसीही सेवकों के जीवनों में जीवंत होते रहे।

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