यहूदिया के एक छोटे से गाँव में, एलियाब नाम का एक बूढ़ा मसीही विश्वासी रहता था। वह प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर अपनी मिट्टी की झोंपड़ी के सामने बैठकर परमेश्वर से प्रार्थना करता। एक दिन, जब सूरज की किरणें पहाड़ियों को सोने जैसा चमका रही थीं, एलियाब ने देखा कि तीन अजनबी उसकी झोंपड़ी की ओर आ रहे हैं। उनके चेहरे धूल से सने हुए थे और कपड़े मैले थे।
एलियाब ने तुरंत उठकर उनका स्वागत किया। उसने कहा, “भाइयों, कृपया विश्राम करें। मेरी झोंपड़ी तो छोटी है, परन्तु परमेश्वर की कृपा से हमारे पास भोजन और पानी है।” उसने अपने हाथों से उनके पैर धोए, ताजे वस्त्र दिए और अपनी एकमात्र बकरी का दूध उनके सामने परोसा।
उन अजनबियों में से एक ने पूछा, “वृद्ध, तुम हम जैसे अनजान लोगों के लिए अपनी सारी संपत्ति क्यों लुटा रहे हो?”
एलियाब ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “क्योंकि पवित्र शास्त्र कहता है – ‘अतिथि सत्काव भूल कर भी न छोड़ना, क्योंकि इससे कुछ लोगों ने अनजाने में स्वर्गदूतों का सत्कार किया है।’ और मसीह ने स्वयं कहा – ‘जो कुछ तुम ने मेरे इन छोटे भाइयों में से किसी एक के लिए किया, वह मेरे लिए किया।'”
उस रात, जब अजनबी विश्राम कर रहे थे, एलियाब ने देखा कि उनके चेहरे से एक अलौकिक प्रकाश निकल रहा है। वे कोई साधारण यात्री नहीं, बल्कि परमेश्वर के भेजे हुए दूत थे। प्रातः होते-होते वे अदृश्य हो गए, परन्तु झोंपड़ी में स्वर्गीय सुगंध छोड़ गए।
कुछ दिन बाद, गाँव के लोगों ने एलियाब को फटकारा, “तू उन जादूगरों के पीछे पड़ गया है! वे तेरा सब कुछ लूटकर चले गए।”
एलियाब ने धैर्य से उत्तर दिया, “भाइयों, हमारा धन तो अस्थायी है। परमेश्वर ने कहा है – ‘जो कुछ तुम्हारे पास है, उससे सब भाइयों के साथ सहभागिता करो।’ हमारी नगरी के बाहर जो कुष्ठ रोगी बैठा है, क्या हमने उसकी सुध ली? कारागार में जो बंधे हैं, क्या हमने उन्हें याद किया?”
गाँव वाले शर्मिंदा होकर लौट गए। एलियाब ने अपनी शेष बकनी का दूध लेकर कुष्ठ रोगी के पास पहुँचा और उसके घाव धोए। फिर कारागार जाकर बंदियों के लिए भोजन ले गया।
एक संध्या, जब एलियाब प्रार्थना कर रहा था, उसे एक स्वप्न दिखाई दिया। स्वर्गदूत उसे दिखाई दिए और बोले, “धन्य है तू, क्योंकि तूने मसीह के सिद्धांतों को जीवन में उतारा। याद रख – ‘विवाह सब में आदर के योग्य समझा जाए और बिछौना निष्कलंक रहे।’ अपने जीवनसाथी के प्रति विश्वासघात मत करो। ‘जीवन यापन के लिए जो कुछ मिले, उसी में सन्तोष करो, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है – मैं तुझे कभी छोड़ूंगा नहीं और कभी तुझे तजूंगा नहीं।'”
अगले दिन, गाँव के युवकों ने एलियाब से पूछा, “बाबा, हमें सच्चा मार्ग दिखाओ।”
एलियाब ने उन्हें समझाया, “हे बच्चों, ‘विभिन्न प्रकार की और पराई शिक्षाओं में न फँसो।’ केवल मसीह की शिक्षाओं पर दृढ़ रहो। ‘हमारे पास एक वेदी है, जिससे भोजन करने का उन्हें अधिकार नहीं, जो धर्ममण्डप की सेवा करते हैं।’ यीशु मसीह ही हमारा एकमात्र बलिदान है।”
वर्षों बाद, जब एलियाब बूढ़ा हो गया, तो उसने अपने अंतिम उपदेश में कहा, “हे प्रियों, ‘अपने अगुवों की स्मरण करो, जिन्होंने परमेश्वर का वचन तुम को सुनाया।’ उनके जीवन के अंत पर ध्यान दो और उनके विश्वास का अनुकरण करो। यीशु मसीह कल, आज और युगानुयुग एक समान है। उसमें ही स्थिर रहो।”
एलियाब के देहांत के बाद, उसकी झोंपड़ी एक प्रार्थना स्थल बन गई। लोग उस स्थान पर आकर याद करते कि कैसे एक साधारण व्यक्ति ने इब्रानियों के तेरहवें अध्याय की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारकर अनंत जीवन का मार्ग दिखाया। और आज भी जब कोई यात्री उस गाँव से गुजरता है, तो लोग एलियाब की कहानी सुनाते हुए कहते हैं – “वह मसीह का सच्चा शिष्य था, जिसने दिखाया कि परमेश्वर का वचन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है।”




