वह सुबह सामान्य ही शुरू हुई थी। सूरज की किरणें सिनाई की पहाड़ियों पर पड़ रही थीं और मरुभूमि की रेत धीरे-धीरे गर्म होने लगी थी। लेकिन हवा में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई तूफान आने वाला हो। कोरह, जो लेवी वंश से था, अपने दो सौ पचास साथियों के साथ मूसा के खेमे के सामने जमा हो गया। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, वह चमक जो अहंकार और असंतोष से पैदा होती है।
“हम सब पवित्र हैं,” कोरह ने आवाज उठाई, उसकी आवाज में विद्रोह का स्वर साफ झलक रहा था, “फिर तुम ही प्रभु के विशेष प्रतिनिधि क्यों बने हुए हो?” उसके पीछे खड़े दातान और अबीराम भी गुस्से से भरे हुए थे। वे रूबेन के वंशज थे और उन्हें लगता था कि मूसा ने उनके साथ अन्याय किया है।
मूसा ने उनकी ओर देखा। उनके चेहरे पर दुख था, नाराजगी नहीं। वे जानते थे कि यह सिर्फ मनुष्यों के बीच का विवाद नहीं था, बल्कि परमेश्वर के अधिकार को चुनौती दी जा रही थी। मूसा ने जमीन पर माथा टेका और फिर कोरह से कहा, “कल सुबह प्रभु यह दिखाएगा कि उसने किसे चुना है। तुम और हारून अपनी-अपनी धूपदानी लेकर आना।”
अगली सुबह का माहौल और भी भारी था। सारा इज़राइल समुदाय कोरह के खेमे के आसपास जमा हो गया, सबकी निगाहें मूसा और हारून पर टिकी थीं। तभी प्रभु की महिमा सभी के सामने प्रकट हुई। मूसा ने लोगों से कहा, “इन पापियों से दूर हट जाओ, वरना तुम भी उनके पाप में फँस जाओगे।”
लोग डर के मारे पीछे हटने लगे। कोरह, दातान और अबीराम अपने-अपने परिवारों के साथ अपने डेरों के द्वार पर खड़े रहे, उनके चेहरे पर अभी भी अड़ियलपन था। तभी जमीन हिलने लगी, एक गहरी दरार पैदा हुई और वह सब जो कोरह से जुड़ा था, जीवित अधोलोक में समा गया। जमीन फिर से बंद हो गई, मानो कुछ हुआ ही न हो। लोग चीखते-चिल्लाते भागने लगे, हर किसी के मन में डर समा गया था।
लेकिन विद्रोह की आग अभी बुझी नहीं थी। अगले ही दिन पूरी मण्डली मूसा और हारून के खिलाफ बड़बड़ाने लगी, “तुम्हीं ने प्रभु के लोगों को मार डाला!” उनकी आवाज़ में आरोप और गुस्सा था। तभी मेघमण्डल में बादल छा गए और प्रभु की महिमा प्रकट हुई। एक विषाणु फैलने लगा, लोग गिरने लगे। मूसा ने तुरंत हारून से कहा, “धूपदानी लो और मण्डली के बीच में जाकर उनके लिए प्रायश्चित करो।”
हारून ने वैसा ही किया। वह जीवित और मृत के बीच में खड़ा हो गया, धूपदानी उठाए हुए। विषाणु रुक गया, लेकिन उस दिन चौदह हजार से अधिक लोग मारे गए। सन्नाटा छा गया। लोग समझ चुके थे कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध जाने का क्या परिणाम होता है।
फिर प्रभु ने मूसा से कहा कि हर गोत्र का एक-एक सरदार अपनी-अपनी लाठी लाकर हारून की लाठी के साथ मिल्कनशत्र में रख दे। अगली सुबह जब मूसा ने तम्बू में प्रवेश किया तो देखा कि हारून की लाठी हरी-भरी हो गई थी, उस पर कलियाँ खिल आई थीं और बादाम के फल लग गए थे। बाकी सब लाठियाँ वैसी की वैसी पड़ी थीं। प्रभु ने स्पष्ट कर दिया था कि उसने हारून को ही याजक के रूप में चुना है।
लोग हैरान रह गए। उन्होंने देखा कि परमेश्वर का चुनाव मनमाना नहीं होता। वह जड़ में भी जीवन का संचार कर सकता है। हारून की लाठी साक्ष्य बन गई, एक याद दिलाती रही कि परमेश्वर के नियमों के सामने झुकना ही बुद्धिमानी है।
धीरे-धीरे शिविर में शांति लौट आई, लेकिन उस दिन की यादें लोगों के दिलों में गहरे उतर गईं। रेत पर पड़े पैरों के निशान मिट गए, लेकिन परमेश्वर के न्याय और दया के पाठ कभी नहीं भुलाए जा सके। हर सुबह जब सूरज निकलता, लोग मिल्कनशत्र की ओर देखते, उस लाठी को याद करते जो मरने के बाद भी जी उठी थी।




