आज सुबह से ही आसमान में बादल छाए हुए थे। पुराने ज़माने के उस गाँव की गलियों में धूप की एक किरण भी नहीं आ रही थी। गोपाल अपनी झोपड़ी के सामने बैठा हुए था, और उसकी आँखें दूर पहाड़ों की ओर टिकी हुई थीं। वह सोच रहा था कि कैसे उसके पिता और दादा यहोवा की महिमा के गीत गाया करते थे। आज उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी।
गाँव के बीचोंबीच एक मंदिर था, जहाँ लोग चाँदी के बने हुए देवताओं की पूजा करते थे। गोपाल ने देखा कि आज मंदिर में खास पूजा हो रही है। पुजारी सोने के कंगन पहने हुए थे, और भक्तों की भीड़ लगी हुई थी। गोपाल का मन विचलित हो उठा। वह जानता था कि उन मूर्तियों के पास न तो बोलने की शक्ति है, न सुनने की। वे सिर्फ़ मनुष्यों के हाथों की बनाई हुई चीज़ें हैं।
अचानक उसे याद आया वह गीत जो उसके दादा गाया करते थे – “यहोवा की स्तुति करो, उसके नाम की स्तुति करो। हे यहोवा के सेवकों, स्तुति करो।” गोपाल की आँखों में आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि असली शक्ति तो उस परमेश्वर में है जिसने आकाश, पृथ्वी और समुद्रों को बनाया।
बारिश की बूंदें टपकने लगीं। गोपाल ने देखा कि बादल गरज रहे थे, बिजली चमक रही थी। उसे समझ आया कि यह सब यहोवा की महिमा का प्रदर्शन है। वह उठा और अपनी झोपड़ी के अंदर चला गया। वहाँ उसने एक पुरानी तहखाने में रखी हुई बाइबल निकाली। उसने भजन संहिता को पलटना शुरू किया।
उसने पढ़ा – “मैं जानता हूँ कि यहोवा महान है… जो कुछ उसने चाहा, वही किया आकाश में, पृथ्वी पर, समुद्रों में और सभी गहराइयों में।” गोपाल के होठों से प्रार्थना निकलने लगी। उसने याद किया कि कैसे यहोवा ने मिस्र में बड़े-बड़े चमत्कार दिखाए थे, फ़िरौन और उसके सभी सेवकों को मारा था।
शाम होते-होते बारिश रुक गई। गोपाल बाहर निकला तो देखा कि आसमान साफ़ हो चुका था। तारे चमक रहे थे। उसे लगा जैसे सारा संसार यहोवा की स्तुति कर रहा हो। पहाड़ों की चोटियाँ, नदियों का कलकलाना, पत्तों की सरसराहट – सब कुछ परमेश्वर की महिमा गा रहा था।
अगले दिन जब गोपाल फिर से उसी जगह बैठा था, तो गाँव का लड़का रमेश उसके पास आया। “क्या तुम मंदिर चलोगे?” रमेश ने पूछा। गोपाल ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तो उस मंदिर में जाता हूँ जिसका निर्माण हाथों से नहीं हुआ। मेरा परमेश्वर तो आकाश और पृथ्वी में बसता है।”
रमेश हैरान रह गया। गोपाल ने उसे बताया कि कैसे यहोवा ने दुनिया बनाई, कैसे उसने अपने लोगों को छुड़ाया। उसने कहा, “जो मूर्तियाँ तुम पूजते हो, उनके मुँह हैं पर बोल नहीं सकते, आँखें हैं पर देख नहीं सकते। पर मेरा परमेश्वर सब कुछ सुनता है, सब कुछ देखता है।”
धीरे-धीरे गोपाल के शब्द रमेश के दिल में उतरने लगे। उस दिन शाम को जब मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं, रमेश गोपाल के साथ बैठकर यहोवा के गीत गा रहा था। आसपास के लोग हैरान थे कि इन दोनों के चेहरे पर एक अलग ही तेज दिख रहा था।
गोपाल ने महसूस किया कि सच्ची आराधना किसी भवन में नहीं, बल्कि हृदय में होती है। उस रात जब वह सोने के लिए लेटा, तो उसके मन में शांति थी। वह जानता था कि यहोवा सदैव उसके साथ है, उसकी सुनता है, और उसे संभालता है।




