बूढ़े इलियाह की झोंपड़ी में चूल्हा ठंडा पड़ा था। सुबह की पहली किरण ने उसके चेहरे पर सोने की लकीरें खींच दीं, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी। बाहर बरगद के पेड़ के नीचे उसका पोता दानिय्येल धूप में बैठा था, और उसके हाथ में रोटी का एक टुकड़ा था। वह रोटी सूखी और बासी थी, पर दानिय्येल के चेहरे पर संतोष था। इलियाह ने मन ही मन सोचा – “सूखी रोटी और चैन की नींद, दावत और झगड़े से कहीं बेहतर है।”
उस दिन दोपहर को गाँव के सरपंच का बेटा आया, जिसके हाथ में महँगे कपड़ों का बंडल था। “बाबा, पिता जी ने भेजा है। आपके लिए नए वस्त्र।” इलियाह ने मुस्कुराकर कहा – “बेटा, जाओ अपने पिता से कहना, इस बूढ़े को अब नए वस्त्रों की नहीं, तेरे प्यार की ज़रूरत है।” लड़का चला गया, और इलियाह ने अपने पोते को समझाया – “पता है बेटा, परमेश्वर हर इंसान के मन की कसौटी है। वह देखता है कि हमारे दिल में क्या है – सोना या खोट।”
शाम को जब इलियाह कुएँ से पानी भर रहा था, तो उसने देखा कि दो पड़ोसी आपस में झगड़ रहे हैं। एक का बैल दूसरे के खेत में घुस गया था। इलियाह धीरे-धीरे दोनों के पास गया। “भाइयों,” उसने कहा, “क्या एक बैल के लिए तुम्हारी दोस्ती टूट जाएगी? जो दोष को ढक लेता है, वह प्रेम ढूँढ़ लेता है।” उसकी बात सुनकर दोनों शर्मिंदा हो गए। एक ने दूसरे से कहा – “भाई, मेरा बैल तुम्हारे खेत का नुकसान करे, इससे बुरी बात क्या होगी?” और इस तरह झगड़ा शांत हो गया।
अगले दिन जब इलियाह मंदिर जा रहा था, रास्ते में उसने एक अमीर व्यापारी को गरीबों को डाँटते देखा। व्यापारी चिल्ला रहा था – “तुम लोगों के कारण मेरी दुकान का नाम खराब हो रहा है!” इलियाह ने धीरे से कहा – “भाई, जो गरीब पर हँसता है, वह उसके बनाने वाले का अपमान करता है।” यह सुनकर व्यापारी का चेहरा बदल गया। उसने गरीबों से माफ़ी माँगी, और उस दिन से उसकी दुकान पर सबके लिए एक अलग ही माहौल बन गया।
एक शाम इलियाह बीमार पड़ गया। दानिय्येल परेशान हो उठा। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। गाँव का वही व्यापारी खड़ा था, जिसके हाथ में दवाई की पोटली थी। “बाबा,” उसने कहा, “आपकी बात ने मेरा जीवन बदल दिया। असली मित्र तो विपत्ति के समय ही नज़र आता है।” इलियाह की आँखों में आँसू आ गए। उसने दानिय्येल से कहा – “देखा बेटा, जो बुराई का बदला बुराई से देता है, उसकी बुराई कभी दूर नहीं होती। पर जो प्यार से बुराई को जीत लेता है, उसके घर में शांति हमेशा बसती है।”
कुछ दिनों बाद जब इलियाह ठीक हुआ, तो उसने देखा कि गाँव का माहौल बदल गया था। लोग एक-दूसरे की मदद करते, झगड़ों को शांति से सुलझाते। एक दिन दानिय्येल ने पूछा – “दादा, परमेश्वर हमें इतनी समझ क्यों देता है?” इलियाह ने उसे गोद में बैठाते हुए कहा – “बेटा, बुद्धिमान का तो कान ज्ञान की खोज में रहता है। परमेश्वर ने हमें दिल दिया है ताकि हम सही और गलत में फर्क समझ सकें। जो सच बोलता है, उसके शब्द हमेशा जीवित रहते हैं।”
सूरज डूब रहा था, और आँगन में चिड़ियों का झुंड चहचहा रहा था। इलियाह ने दानिय्येल को कहानी सुनाते हुए कहा – “याद रखना बेटा, खुश दिल की दवा है, पर टूटी आत्मा हड्डियों को सुखा देती है। हमेशा अपने दिल को खुश रखना, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।”
रात होते-होते पूरा गाँव शांत हो गया। इलियाह की झोंपड़ी में दीया जल रहा था, और उसकी लौ हवा में हिलती, पर बुझती नहीं थी। जैसे उसकी शिक्षाएँ – जो हर मुश्किल में लोगों का मार्गदर्शन करती रहेंगी।




