येरूशलेम के मंदिर के प्रांगण में सन्नाटा छाया हुआ था। सुबह की धूप दीवारों पर पड़ रही थी, और हवा में धूप-धूप सी गंध थी। यिर्मयाह के कंधों पर लकड़ी का जुआ था, जो बैलों के जुए जैसा दिखता था। वह धीरे-धीरे चल रहा था, उसकी आँखों में एक गहरा दर्द था।
लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी। कुछ उस पर हँस रहे थे, कुछ सिर हिला रहे थे। तभी हनन्याह आया – एक प्रतिष्ठित व्यक्ति, उसके वस्त्र चमकदार थे, उसकी चाल में अभिमान था। उसने यिर्मयाह को देखा और ठहर गया।
“सुनो, यहोवा की ओर से वचन!” हनन्याह ने ऊँची आवाज़ में कहा। भीड़ और सघन हो गई। “दो वर्ष के भीतर बाबुल का जुआ तोड़ दिया जाएगा। यहोवा कहता है कि नबूकदनेस्सर द्वारा ले जाए गए सब पात्र और यहोयाकीन यहाँ लौट आएंगे।”
यिर्मयाह ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसकी आँखें हनन्याह पर टिकी थीं, मानो वह उसकी आत्मा को पढ़ रहा हो।
हनन्याह आगे बढ़ा और एकाएक यिर्मयाह के कंधों से जुआ खींचकर तोड़ डाला। लकड़ी के टुकड़े ज़मीन पर बिखर गए। भीड़ में से कुछ लोगों ने ख़ुशी की आवाज़ निकाली।
यिर्मयाह धीरे-धीरे वहाँ से चला गया, मानो कुछ हुआ ही न हो।
कुछ दिन बीते। यिर्मयाह फिर हनन्याह के पास पहुँचा। उसकी आवाज़ में कोई क्रोध नहीं था, बस एक गहरी उदासी थी।
“सुन, हनन्याह,” यिर्मयाह बोला, “तूने लकड़ी का जुआ तोड़ दिया, पर अब यहोवा कहता है कि लोहे का जुआ बनाएगा। सभी जातियों पर लोहे का जुआ होगा।”
हनन्याह हँसा, “तू डरपोक भविष्यद्वक्ता है, यिर्मयाह।”
यिर्मयाह ने उत्तर दिया, “हनन्याह, यहोवा ने तुझे नहीं भेजा। तूने इस लोगों को झूठ पर भरोसा करने दिया। इसलिए तुझे इसी साल मरना है, क्योंकि तूने यहोवा के विरुद्ध बलवा की शिक्षा दी है।”
हवा स्तब्ध हो गई। पत्ते भी नहीं हिल रहे थे। हनन्याह का चेहरा पीला पड़ गया।
उसी वर्ष, सातवें महीने में, हनन्याह मर गया।
लोग चुपचाप देखते रहे। यिर्मयाह का चेहरा उस दिन की याद दिलाता था जब उसने जुआ तोड़ते हुए देखा था। सच्चाई कितनी कड़वी होती है, और झूठ कितना मीठा – पर अंत में सच्चाई ही टिकती है। मंदिर की दीवारों पर सूरज की रोशनी टिमटिमा रही थी, मानो स्वयं परमेश्वर की आँखें इस दृश्य को देख रही हों।




