शाम का सूरज ढलते ही जैसे पूरा महल सोने की लिबास में लिपट गया। दूर बाग़ में खिले चमेली के फूलों की खुशबू हवा में तैर रही थी, पर शुलमीथ का दिल बैठा जा रहा था। वह खिड़की के पास खड़ी पलंग के पाये से उँगलियाँ फेर रही थी, जहाँ उसके प्रियतम की खुशबू अब भी कैद थी।
“कहाँ गए वो?” उसने मन ही मन पूछा। बग़ीचे की राह तकती आँखें नम हो उठीं। याद आया वो सुबह जब उन्होंने कहा था – “तू तो मेरे लिए गुलाब की कली है, शaron की सबसे नाज़ुक कोंपल।” पर आज वो सूरज डूब गया और उनका कोई अता-पता नहीं।
तभी दूर से आवाज़ आई – “देखो! शुलमीथ वहाँ है, बाग़ के बीचोंबीच, अपनी सहेलियों के संग।”
वह मुड़कर देखती, उसकी सास की आवाज़ थी। और फिर दूसरी आवाज़ – “बेटी तो हमारे लिए तिरछा है, पर उसके प्रिय के लिए सीधी चाँदनी जैसी।”
शुलमीथ की साँसें रुक गईं। वह दौड़कर छत पर पहुँची। दूर, जैतून के पेड़ों के झुरमुट में उसे वो दिखाई दिए – उसके प्रिय, जिनकी आँखें अब भी उसे ढूँढ रही थीं।
“मैं यहाँ हूँ!” उसने पुकारा, पर आवाज़ गले में अटक गई।
वे नज़दीक आए तो उसने देखा उनकी आँखों में वही चमक, वही प्यार। “तुम कब से…” वह बोल न सकी।
“तुम्हें ढूँढता हुआ सारे बाग़ में घूमा,” उन्होंने कहा, “तुम्हारी आवाज़ सुनने को कान तरस गए। तुम तो वैसी ही हो जैसे गिलाद की पहाड़ियों पर खिलने वाली लाल गुलाब की पहली कली।”
शुलमीथ नीचे देखकर मुस्कुरा दी। “पर तुम तो चले गए थे…”
“कहाँ जा सकता हूँ मैं तुमसे दूर?” उन्होंने उसकी ठोड़ी उठाते हुए कहा, “तुम्हारी आँखें तो वैसी हैं जैसे हेशबान के तालाबों में तैरती हंसिनियाँ। तुम्हारे बाल ऐसे लगते हैं जैसे गिलाद की पहाड़ियों से उतरती भेड़ों की लहरें।”
वह हँस पड़ी। “अब तो तुम मुझे शर्मिंदा करोगे।”
“सच कहता हूँ,” उन्होंने गंभीर होते हुए कहा, “दुनिया की औरतों में तुम अद्वितीय हो, मेरी माँ की एकलौती बेटी जैसी। बाकी सब तो तुम्हें देखकर दुआएँ देती हैं।”
शाम की हवा में चमेली की खुशबू और घनी हो गई। दूर कहीं कोई बुलबुल गा रही थी। शुलमीथ ने उनके हाथ अपने हाथों में लिए। “तुम जानते हो,” उसने धीरे से कहा, “जब तुम नहीं होते, तो ये बाग़ भी सूना सूना लगता है। नर्गिस के फूल मुरझाए से रहते हैं।”
“मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ,” उन्होंने उसकी अँगुलियों में अँगुलियाँ फँसाते हुए कहा, “चाहे तुम बाग़ में घूमो या महल में रहो। तुम्हारी हँसती आँखें मेरे साथ रहती हैं। तुम्हारी मुस्कान मेरे दिल में बसी है।”
थोड़ी देर वे चुपचाप खड़े रहे, आसमान में उभरते तारों को देखते हुए। फिर शुलमीथ बोली, “कल सुबह चलोगे ना मेरे साथ अंगूर के बाग़ में? पहले अंगूर पकने लगे हैं।”
“ज़रूर,” उन्होंने कहा, “तुम्हारे साथ तो हर मौसम बहार लगता है।”
और फिर वे दोनों महल की ओर चल पड़े, हाथों में हाथ डाले, जैसे दो पक्षी एक डाल पर बैठे हों – अलग पर एक साथ। रात की ठंडी हवा में उनकी बातें गूँज रही थीं, प्यार की वो कहानी जो समय के पन्नों में दर्ज होती चली जा रही थी।




