पवित्र बाइबल

विश्वास या भागो

येरुशलेम की उन गलियों में जहाँ एक समय भजनों की मधुर स्वरलहरियाँ गूँजा करती थीं, अब केवल चिंता के स्वर सुनाई देते थे। हिजकिय्याह के शासनकाल के उन दिनों में यहूदा के लोग एक अजीब सी उलझन में फँसे हुए थे। राजमहल के आँगन में बैठे मंत्री गुप्त योजनाएँ बनाया करते, मिस्र से सहायता की आशा लगाए। उन्हें लगता कि फिरौन की सेना ही उन्हें अश्शूर के आक्रमण से बचा सकती है।

यशायाह नबी उन दिनों नगर के बाहर एक छोटी सी कुटिया में रहते थे। उनके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था, परन्तु आँखों में एक गहरा दुःख समाया हुआ था। एक सुबह जब सूरज की किरणें जैतून के पेड़ों के बीच से छनकर आ रही थीं, वह यहोवा का वचन लेकर नगर में प्रवेश किए। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी गूँज थी, “हे विद्रोही लोगो, जो योजना बनाते हो पर मुझसे नहीं, जो गठबंधन करते हो पर मेरी आत्मा से नहीं!”

परन्तु लोगों के कानों पर जूँ तक न रेंगी। यहोवा के प्रति उनकी आस्था डगमगा चुकी थी। वे मिस्र की शरण में जाना चाहते थे, उस देश की जिसकी शक्ति टूट चुकी थी, जो अपने ही संकटों में उलझा हुआ था। यशायाह की चेतावनी उन्हें एक पागल की बातें लगीं, “तुम्हारी शक्ति बैठे रहने और विश्वास करने में है,” पर वे दौड़ना चाहते थे, घोड़ों पर सवार होकर भागना चहते थे।

एक दिन राजा के दरबार में यशायाह ने एक अद्भुत दृष्टांत सुनाया। उन्होंने कहा, “सिय्योन की पहाड़ी पर खड़ा एक पहरेदार देख रहा है कि कैसे तुम एक ऐसे रास्ते पर दौड़े चले जा रहे हो जो टूटे हुए दीवार की तरह है। एक पल में वह दीवार गिर जाएगी और उसके नीचे दबकर तुम सब चकनाचूर हो जाओगे।”

परन्तु फिरौन के दूतों ने यहूदा के नेताओं को भ्रमित कर दिया था। उन्होंने सोने-चाँदी के उपहार दिखाए, सेना के हाथियों के झुंड का वर्णन किया। और इस प्रकार यहूदा ने अपना विश्वास उस मिस्र पर टिका दिया जो स्वयं ही डगमगा रहा था।

तब यहोवा ने यशायाह के माध्यम से एक और वचन दिया। “इसलिए पवित्र एक इस्राएल का प्रतीक्षा करेगा। वापस लौटने पर तुम्हारा उद्धार होगा, शांति और विश्राम में तुम्हारी शक्ति होगी।” परन्तु लोग नहीं माने। उन्होंने कहा, “नहीं, हम घोड़ों पर दौड़ेंगे,” इसलिए तुम्हें दौड़ना ही पड़ेगा। “हम तेज सवारी करेंगे,” इसलिए तुम्हारे पीछे दौड़ने वाले और भी तेज होंगे।

फिर एक दिन अश्शूर की सेना ने यहूदा की सीमाओं पर धावा बोल दिया। वे महीनों से मिस्र से सहायता की प्रतीक्षा कर रहे थे, पर सहायता कहीं नहीं आई। जब संकट की घड़ी आई, तब यहोवा ने अपनी दया दिखाई। उसने यशायाह के माध्यम से कहा, “यहोवा न्याय करने के लिए खड़ा होगा, वह आकर तुम्हें बचाएगा।”

और फिर वह अद्भुत घटना घटी। अश्शूर की विशाल सेना जब येरुशलेम के द्वार तक पहुँच चुकी थी, तब यहोवा के दूत ने रातोंरात उनके शिविर में प्रवेश किया। सुबह होते-होते एक लाख पचासी हज़ार सैनिक मृत पड़े थे। अश्शूर का गर्वीला राजा सेनाहरीब लज्जित होकर वापस लौट गया।

उसके बाद की शाम को यशायाह नगर की दीवार पर खड़े थे। उनकी आँखों में अब भी वही दुःख था, परन्तु उनके होंठों पर एक मंद सी मुस्कान भी थी। उन्होंने कहा, “अपनी वापसी पर तुम्हारे कानों में यह आवाज़ आएगी – यह है वह मार्ग, इस पर चलो।”

धीरे-धीरे लोग समझने लगे। उन्होंने देखा कि जिस मिस्र पर उन्होंने भरोसा किया था, वह तो एक टूटी हुई नाव थी। जिस यहोवा को उन्होंने छोड़ दिया था, वही उनका सच्चा शरणस्थल था। और जब अंततः उन्होंने अपने मूर्तियों को दूर फेंका, अपने हृदयों को यहोवा की ओर मोड़ा, तब वह समय आया जब “तुम्हारे चाँदी के ढेलों में से तुम कचरा निकाल फेंकोगे, और तुम्हारे सोने के ढेलों में से अशुद्ध वस्तु।”

वर्षा के बाद की उस शाम को जब सूरज अस्त हो रहा था, यशायाह ने अपनी आँखें आकाश की ओर उठाईं। उन्होंने देखा कि कैसे बादलों के बीच से सूरज की किरणें फूट रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे यहोवा की कृपा अपने लोगों पर फिर से बरस रही थी। और उनके मन में यहोवा का वचन गूँज उठा, “तेरे चाँद की चाँदनी सूरज की चाँदनी के समान होगी, और तेरे सूरज की चाँदनी सात गुनी होगी।”

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