एक सुनसान पहाड़ी के किनारे बैठा चेतन आँखें बंद किए हुए था। हवा में उड़ती धूल की महक, दूर बहती नदी की कलकल, और पत्तियों की सरसराहट—सब कुछ सामान्य लग रहा था, मगर उसके भीतर कुछ टूट रहा था। अचानक आँख खुली तो प्रकाश की एक लहर ने उसे घेर लिया, ऐसा प्रकाश जो आँखों को चुभता नहीं बल्कि आत्मा को छूता था।
वह प्रकाश धीरे-धीरे एक रूप लेने लगा। एक विशालकाय सिंहासन दिखा, और उस पर बैठे एक तेजोमय पुरुष के चारों ओर जीवंत प्राणी मंडरा रहे थे। उनके चेहरे—एक मनुष्य का, एक सिंह का, एक बैल का, एक चील का—ऐसे लग रहे थे मानो सारी सृष्टि का सार एक साथ प्रकट हो रहा हो। पंखों की फड़फड़ाहट से हवा काँप उठी।
“चेतन, खड़ा हो,” एक स्वर गूँजा जो कानों से नहीं बल्कि हड्डियों के भीतर से आ रहा था।
चेतन का शरीर काँप उठा। वह जमीन पर मुँह के बल गिर पड़ा। “प्रभु… मैं तो अयोग्य हूँ।”
एक हाथ ने उसे छुआ, ऐसा हाथ जो आग जैसा ताप लिए हुए था मगर जलाता नहीं था। “तू मनुष्य है, इसलिए इन लोगों के पास जा। उन्हें मेरे वचन सुनाएगा, चाहे वे सुनें या न सुनें।”
तभी चेतन के सामने एक पन्ना प्रकट हुआ, दोनों ओर लिखा हुआ। उसमें विलाप, शोक और पीड़ा के शब्द थे। परमेश्वर की आवाज़ फिर गूँजी: “इसे खा ले। अपने पेट भर। फिर जा कर इस्राएल के घराने से बात कर।”
चेतन ने हिचकिचाते हुए उस पन्ने को हाथ में लिया। वह मीठा शहद जैसा लगा। जैसे ही उसने उसे मुँह में डाला, शब्द उसके भीतर उतरते चले गए—कुछ कड़वे, कुछ मीठे, सब मिलाकर एक ऐसा बोझ जिसे उठाना असंभव लग रहा था।
प्रकाश धीरे-धीरे लुप्त हुआ, और चेतन खुद को नदी किनारे पाया। सात दिन तक वह वहाँ बैठा रहा, मूक, स्तब्ध, जैसे उसकी आत्मा में कोई तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा था।
आठवें दिन सुबह, वह उठा और नगर की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने देखा—बाजार में झूठे तराजू, मंदिरों में मूर्तियाँ, और लोगों के चेहरों पर एक ऐसी उदासीनता जो मौत से भी ज्यादा डरावनी थी।
पहला व्यक्ति जिससे उसने बात की, एक बूढ़ा कुम्हार था जो चाक पर मिट्टी के बर्तन बना रहा था। चेतन ने परमेश्वर का वचन सुनाया तो वह हँस पड़ा। “बेटा, यह शहर सैकड़ों साल से ऐसा ही चला आ रहा है। तेरे शब्दों से क्या बदल जाएगा?”
दूसरे दिन वह नगर के द्वार पर गया जहाँ अमीर व्यापारी बैठे थे। उसकी बात सुनकर उन्होंने उसे पागल कहकर भगा दिया। तीसरे दिन उसने युवाओं को संबोधित किया, मगर वे मदिरा और नशे में डूबे हुए थे।
हफ्तों बीत गए। चेतन की आवाज़ भारी होती गई। वह समझ गया कि यह उसकी लड़ाई नहीं थी—यह तो परमेश्वर का वचन था जो उसके माध्यम से बह रहा था। एक दिन जब वह एक गली में खड़ा प्रचार कर रहा था, एक औरत रोती हुई उसके पास आई। “तुम्हारे शब्द… वे मेरे दिल में उतर रहे हैं,” उसने फुसफुसाते हुए कहा।
यह पहला फल था—एक हृदय जो मुड़ रहा था।
समय बीतता गया। चेतन अब नगर के पहरेदार की तरह बन गया था। सुबह शाम वह ऊँचे स्थान पर खड़ा होकर लोगों को चेतावनी देता। कुछ उस पर हँसते, कुछ गालियाँ देते, मगर कुछ ऐसे भी थे जो रुक कर सुनते, और उनकी आँखों में एक नई चिंगारी दिखती।
एक संध्या जब वह पहाड़ी पर बैठा था, उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी—मगर इस बार कोमल और शांत। “तेरा काम बोना है, फसल काटना मेरा। तू वफादार रह, बाकी मैं संभाल लूँगा।”
चेतन ने आँखें बंद कीं। उसके होंठों पर एक मुस्कुराहट थी। वह जान गया था कि भले ही संसार उसकी बात न सुने, परमेश्वर की आवाज़ कभी निष्फल नहीं जाती। और यही उसकी शक्ति थी—न कि सफलता में, बल्कि वफादारी में।




