यह कहानी उस समय की है जब उत्तरी राज्य इस्राएल में राजा जकर्याह की हत्या के बाद शल्लुम महज एक महीने तक राजा रह पाया था। फिर मनाहेम ने सत्ता हथिया ली। समरिया की पहाड़ियों पर जैतून के पेड़ झूम रहे थे, मानो प्रभु का शोक मना रहे हों।
मनाहेम के महल में दावतों का दौर चल रहा था। राजकीय भट्ठी दिन-रात जलती रहती, जिसमें नए-नए षड्यंत्रों की रोटियाँ सिंकतीं। महल के अंदरूनी हिस्से में एक बूढ़ा कुम्हार चाक पर मिट्टी साध रहा था। उसकी उँगलियों में वही कोमलता थी जो कभी प्रभु की इस्राएल के प्रति थी। अचानक चाक से उतरती हुई मिट्टी की कलश बेडौल हो गई। कुम्हार ने उसे फिर से गूँथा, “ठीक वैसे ही जैसे प्रभु इस्राएल को संभालना चाहता है।”
बाजार में हलवाई की दुकान में आग तेज हो रही थी। आटा गूँथने वाला बेचारा यह नहीं जानता था कि आग कब शांत होनी है। ठीक वैसे ही जैसे राज्य के अधिकारी – मनाहेम के दरबारी – नहीं जानते थे कि उनकी कुटिलताओं की आग कब प्रभु के क्रोध को भड़का देगी।
एक शाम जब महल में मदिरापान का दौर चल रहा था, तभी बाहर आकाश में बादल घिर आए। लेकिन वह वर्षा के बादल नहीं थे – अस्सूर की सेना के घोड़ों की टापों की आहट थी। मनाहेम ने तुरंत अपने खजाने से चाँदी के एक हज़ार टैलेंट निकालकर अस्सूर के राजा तिग्लत पिलेसेर के पास भेज दिए, मानो प्रभु की व्यवस्था को रिश्वत देने का प्रयास हो।
गली-गली में चर्चा थी कि राजा ने प्रभु की वेदी को छोड़कर अन्यजातियों के देवताओं से मदद माँगी है। याजकों ने चेतावनी दी: “वे देश के शासकों के साथ षड्यंत्र रचते हैं, परन्तु मैं उन सभी को सेंक लूँगा।”
एक दिन समरिया की गलियों से एक विचित्त गीत की आवाज आई। एक बूढ़ी महिला अपने करघे पर बैठी गा रही थी: “वे सब अधर्म के द्वारा मेरे पास लौट आए हैं। उन्होंने मुझे ठगा है।” लोग समझ गए – यह प्रभु की आवाज थी जो इस्राएल के विश्वासघात पर विलाप कर रही थी।
जब अस्सूर की सेना ने देश पर चढ़ाई की, तो मनाहेम के दरबारियों ने मिस्र से मदद की गुहार लगाई। ठीक उसी तरह जैसे कोई मूर्ख कबूतर इधर-उधर फड़फड़ाता है। प्रभु कह रहा था: “जब मैं उन्हें सुधारना चाहता हूँ, तो वे मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचते हैं।”
अंततः वह दिन आया जब समरिया के द्वार टूटे। महल की भट्ठी ठंडी पड़ गई। याजक एप्रैम के मैदान में खड़े होकर रोते थे: “वे अपनी सारी युक्तियों में मुझे भूल गए हैं। अब दुनिया के बीच वे निरादृत हो जाएँगे।”
बारिश होने लगी। मिट्टी की सोंधी महक हवा में घुल गई। कुम्हार की कार्यशाला में टूटे हुए मिट्टी के बर्तन पड़े थे। शहर की दीवारों पर एक अदृश्य हाथ ने लिखा था: “मेरे लोग सत्य से विमुख हो गए हैं।”




