पवित्र बाइबल

पाँच रोटियों का चमत्कार

उस दिन की शुरुआत धुंधली सुबह से हुई। झील का पानी स्लेटी रंग लिए हुए था, और हवा में नमक की एक बारीक महक तैर रही थी। यीशु ने अपने चेलों से कहा, “चलो, हम दूसरी ओर चलते हैं।” नाव पत्थरों से टकराती हुई आगे बढ़ी, और कुछ ही देर में वे भीड़ से दूर एक सुनसान जगह पर पहुँच गए।

लेकिन लोगों ने उन्हें पहचान लिया। वे पैदल ही, गाँव-गाँव से होते हुए, उस तट पर इकट्ठा होने लगे। जब यीशु नाव से उतरे, तो सैकड़ों लोगों की भीड़ उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। एक बूढ़ी औरत ने अपना हाथ बढ़ाया, “हे गुरु, मेरे बेटे को बुखार तीन दिन से है,” और एक युवक ने चिल्लाकर कहा, “मेरी आँखों की रोशनी लौटा दो।”

यीशु ने उन सबको देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी करुणा थी, जैसे कोई माँ अपने बीमार बच्चों को देख रही हो। वह घंटों उनके बीच रहे, उन्हें चंगा करते हुए, उनसे बातें करते हुए। दोपहर ढलने लगी तो चेले पास आकर बोले, “यह जगह सुनसान है, और अब देर हो चुकी है। इन्हें विदा कर दो, ताकि ये आसपास के गाँवों में जाकर खाना खरीद सकें।”

यीशु ने उत्तर दिया, “तुम ही इन्हें खाना दो।”

फिलिप्पुस ने आश्चर्य से कहा, “हम दो सौ दीनार की रोटी खरीदकर भी इन्हें पर्याप्त नहीं दे सकते।”

तब यीशु ने पूछा, “तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं?”

उन्हें पता चला कि एक लड़के के पास पाँच रोटियाँ और दो छोटी मछलियाँ हैं। यीशु ने सबको हरी घास पर समूहों में बैठने को कहा। वे सौ-सौ और पचास-पचास के समूहों में बैठ गए, जैसे कोई बगीचे में लगाए गए फूल हों।

फिर यीशु ने उन पाँच रोटियों और दो मछलियों को लिया, आकाश की ओर देखकर धन्यवाद दिया, और रोटियाँ तोड़कर चेलों को दीं। चेले लोगों में बाँटने लगे। एक अद्भुत बात हुई – रोटियाँ कम नहीं हुईं, बल्कि बँटती चली गईं। एक बच्चे ने अपनी टोकरी में से रोटी निकाली, तो देखा कि वह फिर से भर गई है। लोग हैरान होकर एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे।

जब सब भरपेट खा चुके, तो चेलों ने बचे हुए टुकड़े इकट्ठे किए। बारह टोकरियाँ भर गईं। वहाँ मौजूद लोगों की आँखों में एक नया विश्वास जगा था। कोई कह रहा था, “सचमुच, यह भविष्यद्वक्ता है,” तो कोई फुसफुसा रहा था, “शायद यही मसीह है।”

लेकिन यीशु ने उन्हें तुरंत विदा किया, और चेलों से कहा कि वे दूसरी ओर चलें। नाव में बैठते समय पतरस ने पूछा, “गुरु, आप उन्हें और बातें क्यों नहीं सुनाते?” यीशु ने कोई जवाब नहीं दिया, बस झील के उस पार की ओर देखते रहे।

अगले दिन, फरीसी उनके पास आए। वे सजे-धजे हुए, लंबे चोगे पहने हुए थे। उनकी आँखों में संदेह था। “हमें आकाश से कोई चिन्ह दिखाओ,” उन्होंने चुनौती भरे स्वर में कहा।

यीशु ने गहरी सांस ली। “शाम को तुम कहते हो कि मौसम अच्छा रहेगा क्योंकि आकाश लाल है, और सुबह कहते हो कि आज आँधी आएगी क्योंकि आकाश लाल और उदास है। तुम आकाश के चिन्हों को तो पहचानते हो, लेकिन समय के चिन्हों को क्यों नहीं पहचान पाते?”

फिर वे फिर से नाव पर चले गए। रास्ते में चेले भूल गए कि रोटी साथ लेनी है। यीशु ने उनसे कहा, “फरीसियों और हेरोदेस के खमीर से सावधान रहो।”

चेले आपस में कहने लगे, “शायद इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हम रोटी नहीं लाए।”

यीशु ने उनकी बात सुन ली। “तुम अब तक क्यों नहीं समझे? क्या तुम्हारा दिल कठोर हो गया है? क्या तुम्हें उन पाँच रोटियों का चमत्कार याद नहीं, जब पाँच हजार लोगों को खिलाया और बारह टोकरियाँ बच गईं? या उस सात रोटियों का, जब चार हजार लोगों को खिलाया और सात टोकरियाँ बचीं? मैं रोटियों की बात नहीं कर रहा, बल्कि फरीसियों और हेरोदेस के झूठे सिद्धांतों की बात कर रहा हूँ।”

तभी वे बैतसैदा पहुँचे। वहाँ लोग एक अंधे आदमी को लाए। वह आदमी इतना अंधा था कि उसे दिन और रात का भी फर्क नहीं दिखता था। लोगों ने यीशु से विनती की कि वह उसे छुएं।

यीशु ने उस अंधे का हाथ पकड़कर उसे गाँव से बाहर ले गए। फिर उन्होंने अपनी लार उसकी आँखों पर लगाई, और हाथ रखकर पूछा, “कुछ दिखाई दे रहा है?”

अंधा आँखें मसलता हुआ बोला, “मुझे लोग दिखाई दे रहे हैं, पर वे पेड़ों की तरह चलते हुए नज़र आ रहे हैं।”

यीशु ने फिर से उसकी आँखों पर हाथ रखे। इस बार वह साफ-साफ देखने लगा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। “मैं देख सकता हूँ,” वह चिल्लाया, “सब कुछ साफ दिखाई दे रहा है!”

रास्ते में यीशु ने चेलों से पूछा, “लोग मुझे किसका पुत्र कहते हैं?”

उन्होंने उत्तर दिया, “कुछ लोग यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते हैं, कुछ एलिय्याह, और कुछ भविष्यद्वक्ताओं में से कोई।”

“पर तुम मुझे क्या कहते हो?”

पतरस ने तुरंत उत्तर दिया, “आप मसीह हैं।”

यीशु ने उन्हें सख्ती से कहा कि किसी से यह बात न कहें। फिर वह उन्हें बताने लगे कि मनुष्य के पुत्र को बहुत दुख उठाना होगा, और अधिकारी उसे मार डालेंगे, पर तीन दिन बाद वह फिर जी उठेगा।

पतरस ने उन्हें अलग ले जाकर समझाना चाहा, “गुरु, ऐसा नहीं होना चाहिए।”

यीशु ने पलटकर देखा, और उनकी आवाज़ में एक तीखापन था, “शैतान, मेरे सामने से दूर हो! तुम परमेश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो।”

फिर उन्होंने भीड़ और चेलों को अपने पास बुलाया। “अगर कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो उसे अपने आप से इनकार करना होगा, और अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे चलना होगा। क्योंकि जो अपना प्राण बचाना चाहता है, वह उसे खोएगा; और जो मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।”

शाम हो रही थी। झील के पानी पर सूरज की आखिरी किरणें नाच रही थीं। चेले चुपचाप यीशु के पीछे चल रहे थे, हर एक अपने मन में उन शब्दों का अर्थ ढूँढ़ रहा था। क्रूस उठाने का क्या मतलब है? अपने आप से इनकार करना कैसे होता है? ये सवाल उनके दिलों में गूँज रहे थे, जैसे कोई दूर का गीत जिसके बोल अभी तक स्पष्ट नहीं हुए थे।

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