वह दिन ऐसा था जैसे सारी सृष्टि साँस रोके खड़ी हो। हवा में धूल के कण तैर रहे थे, और सूरज की तपिश ने माथे पर पसीना ला दिया था। नाहूम अपनी झोंपड़ी के बाहर बैठा था, और उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी। वह यहूदा के पहाड़ों से आने वाली हवा को महसूस कर रहा था, मानो उसमें कोई संदेश छिपा हो।
अचानक उसके मन में एक हलचल सी हुई। वह भीतर की ओर मुड़ा, और उसे लगा जैसे कोई उसके सामने खड़ा है। आवाज़ नहीं थी, पर शब्द स्पष्ट थे—”यहोवा जलन रखने वाला और बदला लेने वाला परमेश्वर है।”
नाहूम ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसने महसूस किया कि जमीन काँप रही है, पहाड़ फट रहे हैं, और समुद्र सूख गया है। परमेश्वर का क्रोध बादलों की तरह घिर आया था, और उसकी शक्ति आँधी की तरह बह रही थी। वह डर गया, पर डर के साथ एक अजीब सी शांति भी थी। उसे एलोन के पेड़ की याद आई, जहाँ यहोवा ने एलिय्याह से बात की थी। आज फिर वही आवाज़ गूँज रही थी।
“वह कोप करके बदला लेता है,” नाहूम ने फुसफुसाया, “पर वह धीरजवन्त भी है।” उसने देखा—नीनवे की विशाल दीवारें, उसके मंदिर, उसके राजा… सब धुँए में लिपटे हुए। वह शहर जो अभी तक अजेय लगता था, अब राख का ढेर बन चुका था। नाहूम की साँसें तेज़ हो गईं। उसे अच्छी तरह याद था कि कैसे अश्शूर के लोगों ने उसके लोगों को सताया था, कैसे उनकी हँसी यरूशलेम की गलियों में गूँजती थी।
पर आज… आज कुछ अलग था। नाहूम ने अपनी लकड़ी की मेज़ पर हाथ फेरा। उसने एक पुराना चर्मपत्र निकाला और लिखना शुरू किया—”यहोवा भला है, संकट के दिन वह गढ़ होता है।” उसकी कलम रुक गई। क्या यह सच था? जब अश्शूर की सेनाएँ चारों ओर से घेर लेती थीं, तब भी? उसने बाहर देखा—एक पक्षी अपने बच्चों को दाना खिला रहा था। हरा-भरा पेड़ हवा में झूम रहा था। और नाहूम को समझ आया—परमेश्वर का क्रोध केवल विनाश के लिए नहीं है। वह उनके लिए आश्रय है जो उस पर भरोसा रखते हैं।
उसने फिर लिखा, “वह अपने बैरियों का सत्यानाश करेगा।” शब्द कठोर थे, पर ज़रूरी। नीनवे के लोगों ने परमेश्वर की सीमा लाँघी थी। उन्होंने दर्द बोया था, अब कटनी काटने का समय था। नाहूम की आँखों में आँसू आ गए। वह न तो ख़ुशी के आँसू थे, न दुःख के। वह एक गहरी समझ के आँसू थे—परमेश्वर का न्याय और करुणा दोनों एक साथ चलते हैं।
दिन ढलने लगा। नाहूम ने चर्मपत्र को समेटा और बाहर निकल आया। उसने देखा—पहाड़ों पर सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी। दूर कहीं एक भेड़ का बच्चा बाग़ में कूद रहा था। उसे यशायाह की बात याद आई—”भेड़िये और मेम्ने एक साथ चरेंगे।” शायद एक दिन ऐसा आएगा। पर आज… आज नीनवे के लिए एक चेतावनी थी।
वह लौटकर अपनी झोंपड़ी में आया। उसने दीया जलाया और फिर से लिखने बैठ गया। शब्द अब भी उसके मन में गूँज रहे थे—”देख, तेरे विरुद्ध कोई बुराई की युक्ति न again बाँध सकेगा।” नाहूम ने मुस्कुराया। यह वादा सिर्फ नीनवे के लिए नहीं था। यह उसके लिए, उसके लोगों के लिए भी था। परमेश्वर की दया हमेशा बनी रहेगी, चाहे तूफान कितने भी भयानक क्यों न हों।
रात हो गई थी। नाहूम ने दीया बुझाया और सो गया। बाहर, तारे टिमटिमा रहे थे, और हवा में शांति थी। परमेश्वर का संदेश अब उसके हृदय में बस चुका था—वह प्रलय और शांति दोनों है, और उसकी योजनाएँ कभी विफल नहीं होतीं।




