यहूदिया के सुनसान इलाके की धूप तेज थी, ऐसी कि पथरीली जमीन से लपलपाती लहरें उठ रही थीं। येशु अकेले चल रहे थे, उनके होठ सूखे हुए थे और पैरों में धूल के कण चिपक गए थे। चालीस दिन और चालीस रातों का उपवास उनके शरीर को दुर्बल कर चुका था, पर आँखों में एक अजीब सी चमक थी – जैसे कोई दीपक अंधेरे में जल रहा हो।
एक दिन अचानक शैतान उनके सामने आ खड़ा हुआ। वह कोई भयानक राक्षस नहीं लग रहा था, बल्कि एक साधारण यात्री की तरह दिखाई देता था, मगर उसकी आँखों में एक ऐसी चालाकी थी जो दिल को डरा देती थी।
“अगर तू सचमुच परमेश्वर का बेटा है,” शैतान ने मीठी आवाज में कहा, “तो ये पत्थरों को आज्ञा दे कि रोटी बन जाएं।”
येशु ने उस ओर देखा। सूखे पत्थर चमक रहे थे, जैसे सोने के टुकड़े हों। उन्होंने धीरे से जवाब दिया: “लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, बल्कि हर उस बात से जीवित रहेगा जो परमेश्वर के मुख से निकलती है।”
शैतान चुप हो गया, मगर हारा नहीं। वह येशु को येरूशलेम ले गया और मंदिर के सबसे ऊँचे हिस्से पर खड़ा कर दिया। नीचे देखने पर लोग चींटियों की तरह नजर आ रहे थे।
“अगर तू सचमुच परमेश्वर का बेटा है,” शैतान ने फुसफुसाते हुए कहा, “तो नीचे कूद जा। आखिर लिखा है कि परमेश्वर तेरे लिए अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों पर उठा लेंगे।”
येशु ने नीचे झाँका। हवा में उड़ते पक्षियों का झुंड दिखाई दिया। उन्होंने शैतान की ओर मुड़कर कहा: “यह भी लिखा है कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को परखने न पाए।”
अब शैतान का चेहरा बदल गया। वह येशु को एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया जहाँ से दुनिया के सभी राज्य और उनकी शानो-शौकत दिखाई दे रही थी। सूरज की किरणें सोने की तरह चमक रही थीं, दूर-दूर तक फैले महलों के गुंबद ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने आकाश को सजा दिया हो।
“ये सब कुछ मैं तुझे दे दूंगा,” शैतान ने गर्मजोशी से कहा, “बस तू एक बार मेरे आगे झुक जा।”
येशु ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में दुख था, गुस्सा नहीं। “शैतान, दूर हो जा,” उन्होंने दृढ़ता से कहा, “क्योंकि लिखा है कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को ही दंडवत करे और केवल उसी की उपासना करे।”
इतना कहते ही शैतान गायब हो गया। अचानक आकाश से स्वर्गदूत उतरे और उन्होंने येशु की सेवा की। सूरज अस्त हो रहा था, और पहाड़ों के पीछे से निकलती सुनहरी किरणों ने येशु के चेहरे को रोशन कर दिया। वहाँ एक पेड़ के नीचे ताजा रोटी और शहद से भरा बर्तन रखा था। येशु ने धीरे-धीरे भोजन किया, और फिर वह नीचे उतरकर लोगों के बीच जाने को तैयार हो गए।
उस रात जब चाँद निकला तो येशु अभी भी पहाड़ पर बैठे हुए थे। उनकी आँखें बंद थीं, होठ हिल रहे थे जैसे कोई प्रार्थना कर रहे हों। हवा में स्वर्गदूतों के गीतों की सी ध्वनि गूँज रही थी, और दूर कहीं एक रोशनी टिमटिमा रही थी – जैसे कोई नया सूरज उगने वाला हो।




