ये कहानी है एक गाँव की, जो नदी के किनारे बसा था। सुबह की धूप जब पहली किरणें लेकर आती, तो पुराने पीपल के पेड़ की छाँव में बैठकर लोग चर्चा करते। उनमें से एक थे पंडित जी, जिनकी उम्र झुर्रियों में दर्ज थी, और दूसरे थे युवा राहुल, जो शहर से पढ़कर लौटा था।
एक दिन की बात है। गाँव में तनाव था। पुराने रीति-रिवाजों पर चलने वाले और नए विचारों वालों के बीच खाई गहरी हो रही थी। पंडित जी कहते, “हमारी परंपराएँ हमारी पहचान हैं,” जबकि राहुल का मानना था कि समय के साथ बदलाव ज़रूरी है।
एक शाम, जब नदी का पानी सुनहरी लहरों में नहा रहा था, राहुल पंडित जी के पास बैठा। उसने पूछा, “पंडित जी, क्या हमेशा एक जैसे रहना ही ठीक है?” पंडित जी ने गहरी सांस ली और बोले, “बेटा, परमेश्वर ने हमें एक दूसरे का बोझ उठाने के लिए कहा है। मजबूत को कमजोर की слабоता सहनी चाहिए, खुद को खुश करने के लिए नहीं।”
राहुल ने पूछा, “लेकिन कैसे?” पंडित जी ने आँखें बंद करके कहा, “मसीह ने खुद को दूसरों के लिए दिया। वो हमारी निर्बलताओं को समझते हैं। उन्होंने यहूदी और अन्यजाति, सबको एक किया। हमें भी उनकी तरह एक दिल और एक आवाज़ से परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए।”
अगले कुछ दिनों में, राहुल ने देखा कि गाँव के बुजुर्ग अक्सर अकेले रह जाते। उनके बच्चे शहर चले गए थे। राहुल ने एक कोशिश की। उसने युवाओं को इकट्ठा किया और कहा, “चलो, हम बुजुर्गों के काम में हाथ बँटाएँ।” पहले तो कुछ लोग हँसे, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बन गई।
एक दिन, पंडित जी बीमार पड़े। राहुल और उसके दोस्तों ने उनके खेत की सारी फसल काट डाली। जब पंडित जी ठीक हुए, तो आँखों में आँसू थे। उन्होंने राहुल को गले लगाया और कहा, “तुमने सिखाया कि मसीह की सेवा दिखावे के लिए नहीं, दिल से होती है।”
फिर एक रविवार की सुबह, पूरा गाँव एक साथ इकट्ठा हुआ। पंडित जी ने प्रार्थना की, “हे प्रभु, हमें एक दिल बनाने की कृपा दो, ताकि हम मसीह की गवाही दे सकें।” सबने एक साथ “आमेन” कहा। उस दिन के बाद, गाँव में बदलाव आया। लोग एक-दूसरे की भावनाओं को समझने लगे। पुराने और नए का झगड़ा खत्म हो गया।
राहुल ने एक दिन पंडित जी से कहा, “अब समझ आया, कि दूसरों को खुश करने से हमारी अपनी खुशी बढ़ती है।” पंडित जी मुस्कुराए, “हाँ, जैसे मसीह ने कहा, मैं तुम्हारे बीच में सेवक बनकर आया हूँ।”
और इस तरह, उस गाँव में एकता और प्रेम का वो दीया जला, जो आज भी जगमगा रहा है। कभी-कभी राहुल नदी किनारे बैठकर सोचता, परमेश्वर की योजना कितनी अद्भुत है—वो हमें मुश्किलों के ज़रिए भी आशा देता है, ताकि हम धैर्य और शास्त्र की सांत्वना से एक-दूसरे को सहारा दे सकें।




