उस रात राजा अहश्वेरोश को नींद नहीं आई। यह कोई असाधारण बात नहीं थी—एक साम्राज्य, जो हिन्दुस्तान से कूश तक फैला हो, उसके चिंताएँ भी उतनी ही विशाल होती हैं। पर उस रात चिंता नहीं, एक अशांति थी, जैसे हवा में कोई आहट भरी हुई हो। उसने मखमली तकिये को ठीक किया, पर विश्राम नहीं मिला। तब उसने आज्ञा दी कि राजवर्षावृत्त लाया जाए, और पढ़कर सुनाया जाए।
दीपक की टिमटिमाती लौ के नीचे एक लिपिक आया, और उसने पुराने लेख खोले। चर्मपत्रों पर लिखे शब्द धीरे-धीरे हवा में तैरने लगे। कर वसूली, सैन्य अभियान, नियुक्तियाँ… और फिर एक प्रसंग आया—शुशन की राजधानी के फाटक पर बैठे दो राजकर्मचारियों, बिगताना और तेरेश, ने राजा की हत्या की साजिश रची थी। और एक यहूदी, मोर्दकै नामक, ने उसकी सूचना दे दी थी। राजा ने पूछा, “इस मोर्दकै के लिए क्या पुरस्कार या सम्मान दिया गया था?” लिपिक ने पन्ने पलटे। कुछ नहीं। राजा चुप हो गया। उस अशांति में अब एक नाम गूंज रहा था—मोर्दकै।
बाहर, भोर का पहला प्रकाश अभी आकाश को नहीं छू रहा था, जब हामान राजभवन के आँगन में आ पहुँचा। वह आज और भी जल्दी आया था। उसके मन में एक ही विचार कौंध रहा था—वह काष्ठ का खम्भा, जिस पर उसने मोर्दकै को फाँसी देने की आज्ञा माँगी थी। राजा उसे मिलने के लिए तैयार था। हामान के चेहरे पर एक संतुष्टि की झलक थी। आज वह सबसे बड़ा पुरस्कार पाने वाला था—वह मोर्दकै को स्वयं मृत्यु के घाट उतारेगा।
पर राजा का पहला प्रश्न ही उसके सारे विचारों पर पानी फेर गया। “मैं उस व्यक्ति के लिए क्या करूँ, जिसको राजा सम्मानित करना चाहे?” हामान ने मन में सोचा—’राजा मुझसे बढ़कर और किसे सम्मानित करेगा?’ उसका अहंकार एक क्षण में फूल गया। उसने जो कुछ सोचा, वही कह डाला—राजा के वस्त्र पहनाए जाएँ, राजा का घोड़ा दिया जाए, और राज्य के सबसे महान सरदारों में से एक उसे सड़कों पर घुमाए, यह घोषणा करते हुए कि “जिसे राजा सम्मानित करना चाहे, उसके लिए ऐसा ही किया जाए।”
राजा ने कहा, “शीघ्रता करो। वस्त्र और घोड़ा लेकर, वैसा ही करो यहूदी मोर्दकै के लिए, जो राजभवन के फाटक पर बैठा है। तुम्हारे मुँह से जो निकला है, उसमें से एक बात भी छोड़ना मत।”
हामान का सारा शरीर सुन्न हो गया। मोर्दकै? वही यहूदी, जिसके लिए वह फाँसी का खम्भा तैयार कर रहा था? उसकी साँसें रुक सी गईं। पर राजा की आज्ञा अटल थी। उसे सब कुछ करना पड़ा। उसने अपने हाथों से मोर्दकै को राजपरिधान पहनाया। उसे राजा के घोड़े पर बैठाया। और स्वयं, हामान, सरदारों में प्रमुख, उसके आगे-आगे चलते हुए यह घोषणा करता रहा—”जिसे राजा सम्मानित करना चाहे, उसके लिए ऐसा ही किया जाए।”
शहर की गलियों में लोग इकट्ठा हो गए। कुछ हैरान, कुछ खुश, कुछ सिर्फ देखते रहे। मोर्दकै चुपचाप घोड़े पर बैठा रहा, उसके चेहरे पर न तो अहंकार था, न ही विजय का भाव। केवल एक गहरी शांति। जैसे वह जानता था कि यह सब किसके हाथों से हो रहा है।
घोषणा पूरी होने पर, मोर्दकै फिर से राजभवन के फाटक पर लौट आया, अपने साधारण वस्त्रों में। पर हामान अपने घर की ओर भागा, सिर ढके हुए, शर्म और ग्लानि से दबा हुआ। उसने अपनी पत्नी और मित्रों को सब कुछ सुनाया। और तब उनके मुँह से निकला वह वाक्य, जो हामान के भाग्य पर मुहर लगाने वाला था—”यदि मोर्दकै यहूदी है, तो तुम उसके सामने नहीं टिक पाओगे। तुम निश्चय ही उसके सामने गिरते जाओगे।”
इसी बीच, राजा के दूत आ पहुँचे, और हामान को शीघ्रता से उस भोज में ले चले, जो रानी एस्तेर ने तैयार किया था। भोजन की मेज पर सब कुछ सुसज्जित था, पर हवा में एक तनाव था। राजा ने फिर पूछा, “रानी एस्तेर, तेरी प्रार्थना क्या है?” और एस्तेर ने वही उत्तर दिया—”कल मैं बताऊँगी।” कल। एक और रात का इंतज़ार। पर उस रात, हामान के लिए, नींद मृत्यु से भी भयानक होगी। और मोर्दकै के लिए, फाटक पर बैठे, यह विश्वास कि ईश्वर की योजना, मनुष्यों की सोच से कहीं बड़ी, धीरे-धीरे अपने शब्दों में सच हो रही है।




