पवित्र बाइबल

पतमुस पर प्रभु का दर्शन

पतमुस का वह तट, जहाँ लहरें चट्टानों से टकराकर ऐसी आवाज़ करतीं मानो कोई अनन्त काल से फुसफुसा रहा हो। हवा में नमक का तीखापन और एक अजीब सी शान्ति, जो अकेलेपन से भरी हुई थी। यूहन्ना वहाँ बैठे थे, एक पुराने पत्थर पर, उनकी उम्र की सिलवटें चेहरे पर गहरी हो चुकी थीं, पर आँखों में वही ज्वाला थी जो कभी वह शिष्य जिसे प्रभु ने प्रेम किया था, उसमें भरी रहती थी। अब वह अकेला था। रोम की साम्राज्यवादी निगाह में वह एक खतरा था, इसलिए इस सुनसान द्वीप पर भेज दिया गया था। पर उसका विश्वास कहीं नहीं गया था। वह प्रार्थना कर रहा था, प्रभु के दिन में, और उसकी समस्त चेतना परमेश्वर के साथ एकात्म होने को तत्पर थी।

तभी पीछे से एक आवाज़ आई। ऐसी आवाज़ जैसे किसी विशाल झरने का गर्जन, या फिर दूर से आती तूफान की गूँज। आवाज़ इतनी प्रबल और स्पष्ट थी कि वह उसके शरीर के भीतर तक कंपन कर गई। उसने मुड़कर देखना चाहा, पर जो दृष्टि उस पर पड़ी, वह शब्दों से परे थी। सात सोने के दीवट थे, और उनके बीच मनुष्य के पुत्र के समान कोई खड़ा था। पर कैसा मनुष्य? उसके वस्त्र लम्बे और पाँव तक लटकते हुए थे, और छाती पर सोने का पटुका बँधा हुआ था। उसके सिर और बाल ऊन के समान श्वेत, और बर्फ के समान उज्ज्वल थे। आँखें… उसकी आँखें ज्वाला की भाँति प्रज्वलित थीं, मानो भीतर की हर गुप्त बात को जलाकर भस्म कर दें। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान चमक रहे थे, जिसे भट्ठी में तपाया गया हो। और उसका हाथ… उसके दाहिने हाथ में सात तारे थे।

पर सबसे भयावह और मोहक था उसका मुख। वह सूर्य के समान प्रकाशमान था, जब वह अपनी पूरी शक्ति से चमक रहा हो। यूहन्ना ने ऐसा तेज कभी नहीं देखा था। वह देखता रह गया, और फिर श्रद्धा के भाव से नहीं, बल्कि एक आदिम, गहरे भय से वह मृतक के समान भूमि पर गिर पड़ा। उसका शरीर स्तब्ध था, मन में कोई विचार नहीं उमड़ रहा था, केवल एक चेतना थी कि वह परम पवित्र के सामने है।

तभी वह आवाज़ फिर गूँजी, पर अब उसमें एक अद्भुत कोमलता थी, जैसे पिता का हाथ बच्चे के सिर पर पड़ता है। “मत डर।” यूहन्ना ने सुना। “मैं अलफा और ओमेगा हूँ, आदि और अन्त। जो कुछ तू देखता है, उसे लिख ले। वर्तमान का, और जो आने वाला है, उसका भी।”

उस कोमल आदेश में एक ऐसी सामर्थ्य थी कि यूहन्ना धीरे-धीरे उठ बैठा। उस दर्शन ने अब भय नहीं, एक अगाध विस्मय भर दिया था। प्रभु ने अपना दाहिना हाथ उस पर रखा। वह स्पर्श… ऐसा लगा जैसे जीवन स्वयं उसकी नसों में बहने लगा हो, सारी थकान, सारा बुढ़ापा, सारा अकेलापन धुल गया हो। “लिख,” वह स्वर फिर बोला। “सात तारे मेरे दाहिने हाथ में हैं, और सात दीवटें सात कलीसियाएँ हैं।”

यूहन्ना ने देखा, उन आँखों की ज्वाला में केवल न्याय नहीं, एक गहरा दु:ख भी था, एक ऐसा प्रेम जो अस्वीकार किया गया था। वह दर्शन धीरे-धीरे मलिन होने लगा, पर वह तेज, वह आवाज़, वह स्पर्श… वह सब उसके भीतर बस गया था। समुद्र की लहरों की आवाज़ फिर सुनाई देने लगी। रात का अँधेरा वापस लौट आया था। पर कुछ बदल गया था। यूहन्ना उठा, उसकी कमर अब सीधी थी। उसके पास अब एक काम था। वह जानता था कि वह अकेला नहीं है। वह सब कुछ, ठीक वैसा ही लिखेगा, जैसा उसने देखा और सुना था। आदि और अन्त उसके साथ था, और यही सच्चाई अब उसकी कलम से बहनी थी।

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