येरुशलेम की दीवारों पर सूरज की पहली किरणें पड़ रही थीं। हवा में ठंडक थी, और शहर अभी पूरी तरह नहीं जागा था। मत्तन्याह, जो लेवीयों में से था, अपने छोटे से घर के द्वार पर बैठा हुआ था। उसकी उम्र पचास से ऊपर थी, पर कंधे अभी भी सीधे थे। वह उन दरवाजों के पहरेदारों में से एक था जो परमेश्वर के भवन, उस तम्बू की ओर जाते थे, जो अभी भी शिलोह में था। उसके सामने एक पुरानी चमड़े की पुस्तक पड़ी थी, जिसमें नामों की सूची थी। नाम… बस नाम। पर हर नाम के पीछे एक कहानी थी, एक जिम्मेदारी थी, एक वाचा थी।
उसका पोता, एलियाब, उसके पास आ बैठा। “दादा, ये सब नाम क्यों याद रखने हैं? यहोवा के भवन में सेवा करने के लिए इतना काफी नहीं कि हम लेवी हैं?”
मत्तन्याह ने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखें दूर, उत्तर की ओर मुड़ गईं, जहाँ से उनके पूर्वज वापस लौटे थे। “ये सिर्फ नाम नहीं हैं, बेटे। ये वो पत्थर हैं जिन पर हमारा भविष्य टिका है। देख।” उसने अपनी उँगली सूची के ऊपर से घुमाई। “यहूदा, बिन्यामीन, एप्रैम, मनश्शे… ये सब जब बाबेल की बंधुआई से लौटे, तो येरुशलेम में बस गए। वो किसान थे, व्यापारी थे। लेकिन हम… हम लेवीय, हमारा काम अलग है।”
उसने एक नाम की ओर इशारा किया – यहोयारीब। “वो याजक थे। उनका काम बलिदान चढ़ाना, यहोवा के सामने खड़े होना था।” फिर दूसरा नाम – अदाया। “वो और उसके बेटे, बड़े सामर्थी पुरुष, भवन के कामों के ऊपर थे। उनकी निगाह में हर लकड़ी का तख्ता, हर पर्दा, हर रस्सी पवित्र थी।”
एलियाब की आँखों में एक जिज्ञासा जगी। “और ये? कोरेह के वंशज?”
“हाँ।” मत्तन्याह का चेहरा गंभीर हो गया। “वो द्वारपाल हैं। हमारी तरह। तेरे पिता, शल्लूम, भी उन्हीं में से हैं। देख, हर पूर्व दिशा का द्वार कोरेहियों और मरारी के वंशजों के हाथ में है। ये कोई छोटा काम नहीं है। ये भवन का मुख है। हर आने-जाने वाले पर नजर रखना, यह सुनिश्चित करना कि कोई अशुद्ध, कोई अनहोनी अंदर न घुस जाए… ये यहोवा के डेरे की रक्षा की पहली कतार है।”
वह चुप हो गया, और एक पंछी का स्वर हवा में गूंजा। “पर ये सब… ये सिर्फ कर्म नहीं हैं। ये स्मरण है। जब हम बाबेल में थे, तो हम बिखर गए थे। हमारी पहचान धूमिल हो रही थी। परमेश्वर ने हमें वापस लाया। और इन नामों के द्वारा, इन सेवाओं के द्वारा, उसने हमें याद दिलाया कि हम कौन हैं। हम एक लोग हैं, एक वाचा के नीचे। तू गाता है न, भजन?”
एलियाब ने हाँ में सिर हिलाया।
“वो गायक – हेमान, आसाप, एतान के वंशज – उनका काम यही स्मरण दिलाना है। उनके स्वरों में हमारा इतिहास बसा है, हमारी विजयें, हमारी पराजयें, हमारी आशा। जब तू सुबह-सुबह उनकी आवाज सुनता है, तो वो सिर्फ संगीत नहीं होता। वो एक जीवित वाचा होती है।”
एक स्त्री, मत्तन्याह की पत्नी, अंदर से आई और उनके सामने कुछ अंजीर और पनीर रख दिया। उसने अपने पोते के सिर पर हाथ फेरा। “इसलिए तुझे ये सब सीखना है। तेरे पिता अभी द्वार पर हैं। कल तू भी उनके साथ जाएगा। तुझे देखना है कि मीकयाह, यहोनाथान, मत्तन्याह – हाँ, मेरे ही नाम का एक और – कैसे हर चेहरा पहचानते हैं, कैसे हर आने वाले का हिसाब रखते हैं। ये भंडार, जहाँ पवित्र बर्तन, चढ़ावा, और गेहूँ रखे जाते हैं… उनकी जिम्मेदारी है। एक दाना भी गलत नहीं होना चाहिए।”
दिन चढ़ने लगा था। शहर से आवाजें आने लगीं – एक बढ़ई की हथौड़ी की आवाज, कहीं मसालों की खुशबू, बच्चों की हँसी। येरुशलेम जीवित हो उठा था। मत्तन्याह ने अपनी पुस्तक बंद की।
“सब कुछ का एक स्थान है, एलियाब। यहूदा के वंशज शहर की दीवारों की रखवाली करते हैं। बिन्यामीन के लोग उनके बगल में बसे हैं। और हम… हम इस भवन के चारों ओर हैं। हम यहाँ के रक्षक हैं, सेवक हैं, स्मरण रखने वाले हैं। क्योंकि इस भवन के बिना, ये सब नगर, ये सब लोग… बस एक और जनसमूह होते। पर इस भवन के साथ, हम यहोवा का लोग हैं।”
वह उठ खड़ा हुआ, उसके जोड़ चरचराए। “चल, आज मैं तुझे उस दक्षिणी द्वार पर ले चलता हूँ, जहाँ तेरे चाचा पहरा दे रहे हैं। तुझे दिखाता हूँ कि कैसे हम रात के लिए दीपक जलाते हैं, और सुबह उसे संभालते हैं। वो दीपक, वो कभी नहीं बुझना चाहिए। जैसे हमारा विश्वास, हमारी याददाश्त… कभी नहीं बुझनी चाहिए।”
और जब वे पत्थर की संकरी गलियों से होते हुए निकले, तो मत्तन्याह का मन उन नामों में खो गया जो उसने पढ़े थे। हर नाम एक ज्योति थी। हर सेवा एक प्रार्थना। और येरुशलेम, टूटा-बिखरा हुआ, फिर से बसा हुआ शहर, उन सब ज्योतियों से जगमगा रहा था – एक ऐसा दीपक जिसकी लौ कभी नहीं बुझनी थी।




