(यह कहानी अय्यूब 39 के आधार पर रची गई है)
अय्यूब चीथड़े बने अपने वस्त्रों में बैठा था। उसका शरीर विशाल फोड़ों से आच्छादित था, मन वेदना और प्रश्नों से। तभी आँधी का स्वर उठा। वह स्वर हवा से भी तीव्र, तूफान से भी गहरा था – एक ऐसी उपस्थिति का स्वर जो सब कुछ हिला दे। और तब परमेश्वर का वचन उस आँधी के बीच से निकला।
“अय्यूब, जो ज्ञानी होने का दावा करता है, उसके लिए मैं प्रश्न लेकर आया हूँ। मेरे साथ खड़ा हो, यदि तुझमें सामर्थ्य है। उस जंगली बकरे को देख, जो पहाड़ों की दुर्गम चोटियों पर रहता है। क्या तूने उसे बाँधा था? क्या तू उसके बच्चों की गिनती करता है? वह तो अपने आप घाटियों में फिरता है, हरा चारा ढूँढ़ता है। उसकी मादा बच्चे को जनती है, उसे सँभालती है, और जब वह मज़बूत हो जाता है, तो वह उसे छोड़ देती है। वह जाता है और लौटकर कभी नहीं आता। यह सब मेरी ही व्यवस्था से होता है। क्या तूने इसे रचा?”
अय्यूब चुप था। उसकी आँखें दूर पर्वतमालाओं पर टिक गईं, मानो वहाँ उन जंगली बकरों को ढूँढ़ रहा हो।
“अब उस जंगली गधे पर ध्यान दे,” परमेश्वर की वाणी गर्जती रही। “जिसे मैंने मरुस्थल की मुक्ति दी है। वह नगरों के शोर को तुच्छ जानता है। वह खुले मैदानों में रहता है, हरियाली के लिए भटकता रहता है। क्या तू उसकी रस्सी बाँधेगा? क्या वह तेरे खेत में हल चलाएगा? क्या तू उस पर भरोसा करेगा, क्योंकि उसकी शक्ति बहुत है? क्या तू उसे अपने खलिहान का काम सौंपेगा? नहीं। वह तो पहाड़ों की हरियाली का शिकार करता है, हर ताज़ी घास की खोज में रहता है।”
फिर वाणी का स्वर बदला, एक विचित्र, लगभग व्यंग्यपूर्ण लहजे में। “क्या तू शुतुरमुर्ग को पंख देगा? उसके पर और पंख, जो दयालु नहीं हैं। वह तो अंडे ज़मीन पर छोड़ देती है, रेत में सेंक देती है, यह भूलकर कि कोई पैर उन्हें कुचल सकता है, कोई जंगली जानवर उन्हें तोड़ सकता है। वह अपने बच्चों के प्रति कठोर है, मानो वे उसके न हों। परन्तु जब वह दौड़ती है, तो घोड़े और सवार दोनों को हँसाती है। उसके पैरों में अद्भुत शक्ति है। यह बुद्धिहीन प्राणी, फिर भी मैंने ही उसे यह सब दिया है।”
अय्यूब ने अपने मन में उस विशाल पक्षी की कल्पना की – मूर्ख, लापरवाह, परन्तु दौड़ते समय जिसकी गति में अनोखा सौंदर्य था।
“और अब घोड़े का प्रश्न सुन। क्या तूने उसे टिड्डी की तरह उछाल दिया? उसकी अयाल की हिनहिनाहट भयानक है। वह तराई में हिनहिनाता है, शस्त्रों की झनकार और युद्धनाद से मग्न होकर। वह दूर से युद्ध सूँघ लेता है, सेनापतियों के हुंकार और नगाड़ों की गड़गड़ाहट से उत्तेजित हो जाता है। क्या तू उसे रोक सकता है? क्या तू उसकी गर्दन पर बल्लम की छाया डाल सकता है? वह युद्ध के मैदान में हँसता है, भय से अज्ञात। वह तलवार की झनझनाहट से नहीं डरता। उस पर कंपकंपाते भाले और चमकती ढाल की गर्जना होती रहती है, पर वह भूमि को खुरों से खोदता हुआ आगे बढ़ता है, नगाड़े की आवाज़ सुनकर रुकता भी नहीं। वह नगाड़े की एक-एक आवाज़ पर हिनहिनाता है, दूर से ही लड़ाई का पता लगा लेता है, सेनापतियों की गरज सुन लेता है।”
अय्यूब के सामने एक जीवन्त चित्र उभर आया – एक शक्तिशाली युद्धाश्व, जिसके नथुनों से भाप निकल रही है, जो अस्त्र-शस्त्रों के शोर में नाच रहा है, बिना किसी डर के। उसकी अपनी पीड़ा क्षण भर के लिए धुँधली पड़ गई।
“क्या बाज़ तेरे ज्ञान से ऊँचा उड़ता है?” वाणी ने पूछा। “क्या तूने उसे आज्ञा दी कि वह दक्षिण की ओर उड़े? क्या गिद्ध तेरे वचन पर चढ़ता है, और अपना घोंसला ऊँचे स्थान पर बनाता है? वह चट्टान पर रहता है, वहाँ जहाँ कोई पहुँच नहीं सकता। वहाँ से वह शिकार को देखता है, उसकी आँखें दूर-दूर तक देखती हैं। उसके बच्चे खून चूसते हैं, और जहाँ मारे हुए पड़े हैं, वहीं वह रहता है।”
एक-एक प्राणी का वर्णन, एक-एक प्रश्न, अय्यूब के हृदय पर हथौड़े की चोट की तरह पड़ रहा था। यह युद्ध नहीं था, यह एक प्रकटीकरण था – एक ऐसे संसार का, जो उसकी समझ और उसके दुख के घेरे से बहुत बड़ा था। यह संसार मनुष्य के नियंत्रण से परे था, मनुष्य के नैतिक गणनाओं से अलग था। यह जंगली, निर्मम, सुन्दर और रहस्यमय था, और यह सब एक ही हाथ से चल रहा था।
अय्यूब ने अपना सिर झुका लिया। उसके प्रश्न, उसकी व्यथा, उसकी निर्दोषिता की दलील – सब उन पहाड़ी बकरों के सामने, उस मूर्ख शुतुरमुर्ग के सामने, उस अदम्य युद्धघोड़े के सामने कितने छोटे लग रहे थे। उसने कुछ नहीं बनाया था। वह किसी का रास्ता नहीं बाँध सकता था। वह किसी को उसकी स्वतंत्रता नहीं दे सकता था।
वह धूल में बैठा रहा, और उसने अपना मुँह ढँक लिया। उसके होंठों पर अब कोई प्रश्न नहीं था, केवल एक गहरा, विस्मयपूर्ण मौन था। आँधी का स्वर धीरे-धीरे शान्त हो गया, परन्तु उस मौन में अब एक अनुगूँज थी – उन सब प्राणियों के पैरों की ध्वनि, पंखों का फड़फड़ाव, और दूर पहाड़ों से आती हुई जंगली बकरे की मुक्त चित्कार की गूँज।



