(यशायाह 52 के भाव पर आधारित एक कल्पना)
हवा में धूल के कण तैर रहे थे, सूरज की तिरछी किरणें उन्हें सुनहरा बना रही थीं। यरूशलेम की टूटी हुई शहरपनाह की एक चट्टान पर बैठा जकर्याह, अपनी धोती के कोने से माथे का पसीना पोंछ रहा था। शहर में एक उदास खामोशी थी, वह खामोशी जो लंबे दासत्व के वर्षों से आती है। हवा में सिर्फ दूर कहीं एक बच्चे के रोने की आवाज, और किसी घर में चक्की पीसने की एकलापन भरी रट थी। उसने नीचे झील की ओर देखा, जहाँ विदेशी सैनिकों के डेरे से धुआँ उठ रहा था। उनकी हँसी की कर्कश आवाजें कभी-कभार इस खामोशी को चीर देती थीं।
उसकी याददाश्त में वो दिन धुंधला पड़ गया था जब यह शहर स्वतंत्र हुआ करता था। अब तो बस पुराने लोगों की आँखों में, कभी-कभार बैठकों में सुनाई जाने वाली कहानियों में ही वह यरूशलेम जिंदा था। परमेश्वर का नाम लेना भी अब एक फुसफुसाहट बनकर रह गया था। क्या सचमुच वह सिय्योन की दुर्दशा देख रहा है? क्या उसकी पवित्र नगरी हमेशा के लिए अपनी महिमा खो बैठेगी?
तभी, पूर्व दिशा से, एक साया उभरा। पहाड़ियों के रास्ते एक आदमी दौड़ता हुआ आ रहा था। उसके पाँव नंगे थे, कपड़े धूल से सने। पर उसके चेहरे पर थकान नहीं, एक अजीब सी तेजस्विता थी। वह सीधा शहर के बचे-खुचे फाटक की ओर बढ़ा। जकर्याह नीचे उतरा, कुछ और लोग भी, उत्सुकता और डर के मिले-जुले भाव लिए, इकट्ठा होने लगे।
दूत सीधा खड़ा रहा। उसकी साँसें भारी थीं, पर आवाज स्पष्ट और ऊँची, जैसे तुरही की आवाज हो।
“सुनो!” उसका स्वर हवा में काँपा। “शांति का सुसमाचार सुनो! भलाई का समाचार!”
लोग स्तब्ध थे। इतने वर्षों में पहली बार कोई ‘शांति’ और ‘भलाई’ जैसे शब्द इस तरह गूंजते हुए सुन रहा था।
“तुम्हारा परमेश्वर राज्य करता है!” दूत ने अपनी बाँहें आकाश की ओर उठाईं। “वह कहता है, ‘जाग, हे सिय्योन, जाग! उस शक्ति को धारण कर जो तुझे दी गई है। हे यरूशलेम, पवित्र नगरी, उन्हें उतार फेंक जिन्होंने तुझे स्पर्श किया है। तू अब दासत्व के बन्धनों में नहीं रहेगी। बिना मूल्य दिए ही तू बेची गई, और बिना पैसे के ही तुझे छुड़ाया जाएगा।'”
जकर्याह की आँखों में आँसू आ गए। ये शब्द… ये वचन… ये उसने अपने बचपन में, अपने पिता से सुने थे, जब वे शास्त्र पढ़ा करते थे। परमेश्वर अब भी बोलता था। वह चुप नहीं था।
दूत ने आगे कहा, “मेरे लोगों को पहले क्या हुआ? अस्सूर ने उन्हें दबाया, बिना किसी कारण। और अब? अब क्या होता है? देखो, परमेश्वर कहता है, ‘मेरा नाम निरंतर निन्दित क्यों होता है? इसलिए मेरी प्रजा मेरे नाम को जानेगी। हाँ, वह दिन आएगा जब वे कहेंगे, देखो, तुम्हारा परमेश्वार यहाँ है!'”
लोगों में एक सनसनी दौड़ गई। कोई रोने लगा, कोई प्रार्थना में मुँह छुपा लिया। यह निन्दा का अंत और प्रकटीकरण का प्रारम्भ था।
फिर दूत ने पहाड़ियों की ओर इशारा किया। “देखो उन पहाड़ियों पर! शांति का सुसमाचार सुनाने वाले के पाँव कितने सुहावने हैं! वह खबर ला रहा है, अच्छी खबर, उद्धार की खबर। वह सिय्योन से पुकार रहा है, ‘तुम्हारा परमेश्वार राज्य करता है!'”
एक अद्भुत परिवर्तन होने लगा। लोगों की आँखों में जो निराशा की चादर थी, वह सिकुड़ने लगी। कंधे सीधे होने लगे। यह सिर्फ खबर नहीं थी; यह एक वादा था, एक नई सृष्टि का संकेत था। उनकी दासता स्थायी नहीं थी। परमेश्वर स्वयं हस्तक्षेप करेगा।
दूत ने अपनी अंतिम घोषणा की, मानो सबसे गहरा रहस्य बता रहा हो। “यरूशलेम के पहरेदारों की आवाज सुनो! वे एक साथ जयजयकार करते हैं। वे आँखों से आँखें मिलाकर देखते हैं, जब यहोवा सिय्योन के लिए फिर लौट आएगा। इस नगर के सभी खंडहर, एक स्वर में गाओ! क्योंकि यहोवा ने अपनी प्रजा को शान्ति दी है, यरूशलेम को छुड़ाया है।”
और फिर, जैसे उसे अपना काम पूरा कर लिया हो, दूत ने शहर की ओर एक लम्बी नज़र डाली, और उसी रास्ते से लौटने लगा, जहाँ से आया था।
पर उसके जाने के बाद भी, उसके शब्द हवा में लटके रहे। जकर्याह ने अपने चारों ओर देखा। लोग अब भीड़ नहीं रहे थे; वे एक समुदाय बन गए थे। चेहरों पर अविश्वास नहीं, बल्कि एक गहरी समझ थी। एक बूढ़ी औरत ने धीरे से गाना शुरू किया, एक प्राचीन गीत जो सालों से दबा पड़ा था। दूसरों ने स्वर मिलाया।
शाम ढल रही थी। पहाड़ियों पर सुनहरी रोशनी फैल रही थी। जकर्याह को लगा, मानो ये पहाड़ियाँ स्वयं गा रही हों। मानो टूटी हुई दीवारों की हर ईंट में से एक धुन निकल रही हो। परमेश्वर का छुटकारा कोई भविष्य की घटना नहीं थी; वह अभी से शुरू हो चुका था, उनके हृदयों में, उनकी आशा में। वह दिन दूर नहीं जब सारी पृथ्वी उनके परमेश्वर के उद्धार को देखेगी।
उसने अपना सिर ऊँचा किया। अब धूल सिर्फ धूल नहीं थी; वह पवित्र भूमि की धूल थी, जो फिर से महिमामय होने वाली थी। और रात के अँधेरे में, यरूशलेम के खंडहरों के बीच, एक नई सुबह की किरण का इंतज़ार शुरू हो गया था।




