पवित्र बाइबल

बाबुल का पतन और वापसी का मार्ग

फरात नदी के किनारे खड़ा वह बूढ़ा व्यक्ति केवल एक निर्वासित यहूदी नहीं था; उसकी आँखों में सदियों का बोझ था। हवा में तैरती धूल और दूर से आती नगर के शोर की आवाज़ के बीच, वह अपने खोए हुए यरूशलेम को याद कर रहा था। बाबुल की ईंटों से बनी विशाल दीवारें सूर्यास्त में सुनहरी दिख रही थीं, मानो अग्नि में तपी हुई हों। पर उसे ये भव्यता खोखली लगती थी। उसके मन में यहोवा के वचन गूँज रहे थे, वे वचन जो उसने बचपन में अपने पिता से सुने थे – भविष्यवक्ता यिर्मयाह की पुकार।

एक शाम, जब आकाश में बादल ताँबे के रंग के थे और हवा में अजीब सी सन्नाटा छाया हुआ था, वह फरात के किनारे बैठा था। नदी का पानी, जो आमतौर पर शांत बहता था, आज उग्र लहरों के साथ बह रहा था, मानो कोई अदृश्य हाथ उसे खींच रहा हो। तभी उसके कानों में एक स्वर गूँजा, कोई आवाज़ नहीं, बल्कि एक विचार की तरह, स्पष्ट और दृढ़: “बाबुल के विरुद्ध यहोवा का वचन सुनो। देख, एक जाति उत्तर देश से आ रही है।”

वह चौंककर उठ बैठा। चारों ओर कोई नहीं था, केवल नदी का कोलाहल और दूर से आते ऊँटों की घंटियों की आवाज़। पर उसका हृदय जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने आँखें बंद कीं और एक दर्शन उभरा – हाँ, उत्तर से, बर्फीले पहाड़ों और विस्तृत मैदानों से, एक ऐसी सेना चली आ रही थी जिसके घोड़ों की टापों से धरती काँप रही थी। वे लोग बिना किसी दया के, बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ रहे थे। उनके चेहरे कठोर थे, उनके हथियार चमक रहे थे। और वे सीधे बाबुल की ओर देख रहे थे।

अगले कई दिनों तक, वह बूढ़ा व्यक्ति शहर की गलियों में घूमता रहा, पर अब उसकी दृष्टि बदल गई थी। जहाँ दूसरों को समृद्धि और बल दिखाई देता था, वहाँ उसे दरारें दिखतीं। व्यापारियों का कोलाहल उसे एक अंतिम गतिविधि की भाँति लगता। महलों में होने वाले दावतों की हँसी उसके कानों में खोखली और बनावटी सुनाई देती। वह मूरतों के मंदिरों के सामने से गुज़रता, जहाँ सोने-चाँदी के बुत चमक रहे थे, और उसके मन में वह वाक्य उमड़ता: “उनके मूरत सब के सब निरा भय और लज्जा का कारण होंगे।”

एक रात, जब चंद्रमा एक पतले अर्धचंद्र की तरह आकाश में लटका हुआ था, वह बाबुल के प्राचीन जिगुरात के पास गया। वहाँ, उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। ऐसा लगा मानो समय की परतें खिसक गई हों। उसने देखा कि कैसे बाबुल, “सारे जगत का सुनहला कटोरा”, अचानक खाली और उजाड़ हो गया। उसकी दीवारें गिर गईं, उसके फाटक जल गए। और उस स्थान पर, जहाँ कभी मानवीय अहंकार आकाश को छूता था, केवल काँटेदार झाड़ियाँ और जंगली जानवर रह गए। बिल्लुओं की चीख़ हवा में गूँज रही थी, और गीदड़ उन खंडहरों में विचरण कर रहे थे जो कभी महल हुआ करते थे।

पर इस दृश्य के बीच, एक और छवि उभरी। दूर, पश्चिम की ओर, उसने अपने लोगों को देखा – यहूदा के पुत्र और यरूशलेम की बेटियाँ – एक कतार में चलते हुए। उनके चेहरे पर शर्म नहीं, बल्कि एक अद्भुत प्रकाश था। वे रो रहे थे, हाँ, पर वे रोते हुए भी चल रहे थे, और उनके आँसू ऐसे लग रहे थे मानो फरात और यर्दन के बीच के रेगिस्तान को सींच रहे हों। वे सिय्योन की ओर लौट रहे थे। उनके साथ एक चरवाहा था, एक ऐसा चरवाहा जिसका हृदय उनकी भेड़-बकरियों के लिए धड़कता था, और वह उन्हें हरी-हरी चराइयों और शांत जल की ओर ले जा रहा था।

सुबह होने तक, वह बूढ़ा व्यक्ति जागता रहा। उसकी आँखों में नींद नहीं, बल्कि एक नया दृढ़ संकल्प था। उसने महसूस किया कि यहोवा का न्याय एक शून्यता नहीं, बल्कि एक नई रचना का प्रारंभ है। बाबुल का अहंकार, जो मानव हृदय को परमेश्वर से दूर ले जाता है, टूटेगा ज़रूर। पर उस टूटन के पार, एक मार्ग बनेगा – एक सीधा राजमार्ग – जिस पर चलकर खोया हुआ मनुष्य फिर से अपने घर, अपने सच्चे स्थान की ओर लौट सकेगा।

उसने मुड़कर बाबुल की ओर देखा, जो अभी भी अपनी नींद में सोया हुआ था। फिर उसने पश्चिम की ओर देखा, जहाँ सूर्योदय की पहली किरणें क्षितिज को छू रही थीं। उसने अपना सामान उठाया, एक छोटा सा बंडल, और फरात नदी से दूर, उस मार्ग की ओर कदम बढ़ाया जो अभी तक अदृश्य था, पर उसके विश्वास में पूरी तरह स्पष्ट था। यह यात्रा अभी ख़त्म नहीं हुई थी। वास्तव में, अब यह शुरू हो रही थी।

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