पवित्र बाइबल

शरीर तम्बू, आत्मा अनन्त घर

यह कहानी एक गाँव की है, जहाँ एक वृद्ध बढ़ई रहता था, नाम था उसका इशायाह। वह केवल लकड़ी ही नहीं तराशता था, बल्कि उसकी आँखें हर वस्तु के पार झाँकने की आदी थीं। उसकी कार्यशाला से चीड़ की सुगंध और तारपीन की तीक्ष्ण गंध हमेशा घुली रहती थी। एक दिन, दोपहर की ढलती धूप में, जब धूल के कण हवा में नाच रहे थे, इशायाह एक पुराने तम्बू की मरम्मत कर रहा था। वह तम्बू एक यात्री का था, जो कभी-कभार गाँव से गुज़रता। कपड़े पुराने और जर्जर हो चुके थे, धागे ढीले पड़ गए थे। इशायाह की उँगलियाँ, जिन पर समय के छालों और लकड़ी के खुरदुरेपन ने एक मानचित्र सा उकेर दिया था, वे सिलाई करते हुए भी एक अलग ही धुन में थीं।

उसका मन उस तम्बू से हटकर अपने शरीर पर टिक गया। उसने महसूस किया कैसे उसकी अपनी पीठ अकड़न से भर गई है, कैसे आँखों की रोशनी धुंधली पड़ती जा रही है। यह शरीर, यह भी तो एक तम्बू ही था। एक अस्थायी डेरा, जो हवा के झोंकों से काँपता, बारिश में तरबतर होता, और धूप में सिकुड़ता रहता। वह एक पल को रुका, सुई को कपड़े में फँसा छोड़, और अपनी हथेलियों को देखने लगा। इन्हीं हाथों ने कितनी कुर्सियाँ बनाईं, कितने दरवाजे गढ़े, कितने खिलौने तराशे जो अब बिखर चुके थे। यह सब कुछ भंगुर था। एक दिन यह शरीर भी, इस तम्बू की तरह, धरती पर गिर जाएगा।

पर उस पल एक विचित्र शांति ने उसे घेर लिया। यह विचार उसे भयभीत नहीं कर रहा था, बल्कि एक गहरी प्रतीक्षा का भाव जगा रहा था। वह याद करने लगा अपने पिता की बातें, जो एक विद्वान पादरी थे। वे कहा करते थे, “पुत्र, हम इस मिट्टी के घर में रहते हैं, और इसका भार कभी-कभी बहुत भारी लगता है। पर ऐसा समय आएगा जब हमें एक नया घर मिलेगा, हाथों से नहीं बना हुआ, बल्कि अनन्तकाल तक स्वर्ग में बना हुआ।”

इशायाह ने आँखें मूंद लीं। उसने अपनी आत्मा को उस ‘घर’ की कल्पना में तैरते हुए महसूस किया। वह कोई महल नहीं था, न ही सोने-चाँदी से जड़ा हुआ कोई भवन। वह एक ऐसी निवास-स्थली थी जो पूर्णतः दिव्य थी, जहाँ कोई टूट-फूट नहीं, कोई अकड़न नहीं, कोई धुंधलापन नहीं। यह शरीर, यह तम्बू, गिरेगा ज़रूर, पर उसके भीतर जो जीवन है, वह मृत्यु में भी नहीं डूबेगा। ईश्वर ने उसकी आत्मा में एक बीज रोप दिया था, जो अंकुरित होकर एक नए रूप में प्रकट होने के लिए बेचैन था। यह सब अनुग्रह था, एक ऐसा उपहार जिसकी कोई कीमत नहीं चुका सकता था, बस विश्वास से स्वीकार कर सकता था।

शाम ढलने लगी। उसने तम्बू की मरम्मत पूरी की और उसे सावधानी से मोड़कर रख दिया। बाहर निकलकर उसने आकाश की ओर देखा। पहला तारा टिमटिमा रहा था। उसे लगा जैसे वह तारा उस भविष्य के निवास की एक झलक है, दूर, पर वास्तविक। अब वह इस सांसारिक तम्बू में रहते हुए भी, उस अनन्त घर की यात्रा कर रहा था। डर समाप्त हो गया था। मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक द्वार थी। और इस विश्वास ने उसके चेहरे पर एक मन्द मुस्कान बिखेर दी, जो शाम के सन्नाटे में एक मौन प्रार्थना की तरह घुल गई। उसने अपना औज़ार सँभाला और घर की ओर चल पड़ा, कदमों में एक नई हल्कापन था, जैसे कोई बोझ उतर गया हो। यहाँ का सब कुछ अस्थायी था, पर उस अस्थायीपन में ही अनन्तता का वादा छिपा था। और वह वादा ही अब उसकी चलती-फिरती नींव थी।

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