पवित्र बाइबल

सूखे में उगा विश्वास का बीज

उस गाँव में जहाँ धूप धरती को तपाती थी और बारिश की हर बूंद मोती की तरह गिनी जाती थी, प्रकाश नाम का एक किसान रहता था। उसकी उम्र अभी ज्यादा नहीं थी, पर चेहरे की झुर्रियाँ सूखे के सालों की कहानी कह जाती थीं। इस बार तो मानो आसमान ने ही जैसे पानी का मुँह बंद कर लिया था। खेतों में धरती फट गई थी, चौड़ी-चौड़ी दरारें जैसे भूख के मुँह थे। प्रकाश का सारा खेत, जिसमें उसने अपनी जवानी की सारी मेहनत झोंक दी थी, मिट्टी का एक पीला, बंजर टुकड़ा बनकर रह गया था।

एक शाम, वह अपनी झोंपड़ी के सामने बैठा आसमान की ओर देख रहा था। मन में एक उथल-पुथल सी चल रही थी। गुस्सा था, निराशा थी, एक डर था कि अगले महीने बच्चों का पेट कैसे भरेगा। तभी उसे याद आया उस बूढ़े गुरुजी की बात, जो गाँव के छोटे से चर्च में बाइबल की बातें सुनाया करते थे। गुरुजी कहा करते थे, “भाइयो, जब तुम हज़ार तरह की परीक्षाओं में घिर जाओ, तो इसे पूरे आनंद की बात समझो।”

“आनंद?” प्रकाश ने अपने मन में ही एक कड़वी हँसी हँसी। “इस तबाही में, इस डर में आनंद कहाँ?” लेकिन गुरुजी की आवाज़ फिर गूँजी, “क्योंकि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज पैदा होता है।” धीरज। यह शब्द उसके मन में अटक गया। उसने हमेशा धीरज को हार मान लेने जैसा समझा था। पर शायद यह हार नहीं, बल्कि डटे रहने की एक जिद थी।

उसने फैसला किया। हर सुबह, वह अपने सूखे खेत के बीचोबीच एक पत्थर पर बैठकर, ईश्वर से बात करता। यह प्रार्थना नहीं थी माँगने की, बल्कि एक विश्वासी के सरल बोल थे। “प्रभु,” वह कहता, “मैं तो डगमगाता हूँ। मेरा विश्वास कमज़ोर है। मुझे बुद्धि दो, ताकि मैं इस घड़ी को समझ सकूँ।” वह उस वचन पर अडिग रहा कि जो ईश्वर से माँगता है, उसे बिना डाँटे उदारता से दिया जाता है। पर वह माँगता रहा बुद्धि, धैर्य, नहीं कि अचानक बारिश हो जाए।

धीरे-धीरे, एक अजब सी शांति उसके अंदर जगी। उसने देखा कि गाँव के कुछ लोग, जो पहले भी ऐसे संकट देख चुके थे, छोटे-छोटे काम कर रहे थे। किसी ने बाँस की टोकरियाँ बनाना शुरू किया, तो किसी ने शहर जाकर मजदूरी करनी। प्रकाश के पास बढ़ई का हुनर था। उसने अपना वह पुराना औजारों का बक्सा निकाला। शुरू में तो हाथ ठीक से चले नहीं, लेकिन वह लगा रहा।

एक दिन, जब वह लकड़ी के एक टुकड़े को रेत रहा था, तो उसके पड़ोसी मोहन आया, जिसके चेहरे पर हमेशा शिकायतों के बादल छाए रहते थे। “क्या कर रहा है भाई?” मोहन ने कहा, “ईश्वर पर इतना भरोसा है, तो वही तुझे रोटी दे देता। यह सब क्यों कर रहा है?”

प्रकाश ने काम करना जारी रखा। फिर बोला, “मोहन, क्या तू उस आदमी की तरह नहीं हो गया, जो शीशे में अपना चेहरा देखकर भूल जाता है कि वह कैसा है? मैं यहाँ बैठकर सिर्फ प्रार्थना करता रहूँ, और घर में बैठे रहूँ, तो मेरा विश्वास कहाँ रह जाएगा? विश्वास अगर जीवित है, तो कर्म से ही दिखेगा न?”

उसकी बात सुनकर मोहन चुप रहा, फिर धीरे से बोला, “मेरे पास थोड़ी लकड़ी पड़ी है। क्या तू उससे एक छोटी पाटी बना देगा बच्चों के लिए?”

समय बीतता गया। प्रकाश की छोटी सी बढ़ई की दुकान चल निकली। उसने कभी धनवान नहीं बनना चाहा, बस परिवार का पेट भरना चाहता था। एक बार, उसका एक पुराना मितर, जो गाँव से दूर रहता था, मुसीबत में फँसा हुआ आया। उस पर कर्ज का बोझ था। प्रकाश के पास ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन उसने अपने एक सप्ताह की कमाई, बिना किसी शोर-शराबे के, उसे दे दी। उसकी पत्नी ने पूछा, “हमारे लिए तो कम पड़ेगा अब?” प्रकाश ने मुस्कुराते हुए कहा, “ईश्वर ने जो कान दिए हैं, सिर्फ अपनी ही बात सुनने के लिए नहीं दिए। दूसरे के दर्द को सुनने के लिए भी दिए हैं। और जो दान दिया जाए, वह बिना किसी भेदभाव के, बिना उपकार जताए।”

जिस साल सूखा पड़ा था, वह भी गुजर गया। फिर एक वर्ष अच्छी बारिश हुई। प्रकाश का खेत फिर से हरा-भरा हो उठा। लेकिन अब वह वही पुराना प्रकाश नहीं रहा था। परीक्षा ने उसे तोड़ा नहीं, बल्कि गढ़ दिया था। उसे अब समझ आ गया था कि हर अच्छा और हर सही उपहार ऊपर से ही मिलता है, एक छाया की तरह बदलता नहीं। उसकी प्रार्थना अब सिर्फ माँग नहीं रह गई थी, बल्कित एक धन्यवाद बन गई थी—उस धीरज के लिए, उस बुद्धि के लिए, और उस कर्म की शक्ति के लिए, जिसने उसके विश्वास को सच्चाई से जीवित रखा।

और गाँव में जब भी कोई मुसीबत की बात करता, तो लोग कहने लगे, “प्रकाश से जाकर बात करो। उसने सूखा देखा है। वह जानता है कि विश्वास की जड़ें, पानी न होने पर भी, कैसे गहरी होती चली जाती हैं।”

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