पवित्र बाइबल

सुलैमान की दिव्य बुद्धि

येरूशलेम की गर्मी थोड़ी कम हुई थी, सांझ का सुस्त साया पहाड़ियों पर फैल रहा था। महल में अभी भी दिन का कामचलाप था, पर राजा सुलैमान का मन एक अजीब सी शांति में डूबा हुआ था। बाप दाऊद का सिंहासन संभाले अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे, और इस भारी जिम्मेदारी का एहसास उनके युवा कंधों पर हर पल एक नया बोझ डालता रहता। आज वे गिबोन जाने वाले थे, वहां का उच्च स्थान उन दिनों यहोवा की आराधना का एक बड़ा केंद्र था। उनके मन में एक हलचल थी—नए राज्य की चुनौतियां, फैलते हुए सीमा प्रांत, न्याय की उलझनें, और उन लोगों का भरोसा जो उनकी ओर देखते थे।

गिबोन की पहाड़ी पर पहुंचते-पहुंचते रात होने लगी थी। वहां का बलिवेदर बड़ा था, और सुलैमान ने उस पर एक हजार होमबलि चढ़ाई। यह कोई दिखावा नहीं था, बल्कि उस भक्ति का विस्तार था जो उनके पिता ने उनमें बोई थी। आग की लपटें आकाश को छू रही थीं, धुंए की सुगंध हवा में तैर रही थी, और याजकों के मंत्रोच्चार के बीच एक गहन विश्वास का वातावरण बन गया था। थकान के मारे, एक पत्थर के बिस्तर पर सिर रखकर सुलैमान सो गए।

और फिर वह स्वप्न आया। इतना स्पष्ट, इतना जीवंत कि यह महज एक ख्वाब नहीं लग रहा था। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे आकाश खुल गया हो, और यहोवा स्वयं उनके सामने प्रकट हुए। कोई डरावना दृश्य नहीं, बल्कि एक स्नेहिल, पिता तुल्य उपस्थिति। आवाज में अनंत करुणा थी। “मांग, जो तुझे दिया जाए।”

यह प्रस्ताव, इसका विशालपन, सुलैमान को अचंभित कर गया। उनकी सांस थम सी गई। उनके सामने तो सारे विकल्प खुले थे—दुश्मनों पर भारी विजय, अथाह धन-संपदा, लंबी आयु… पर उनके मन में जो बात उठी, वह इन सबसे अलग थी। उन्होंने अपने आप को देखा—एक ‘बालक’, अनुभवहीन, इस विशाल जनसमुद्धि के बीच खोया हुआ। दाऊद का पुत्र होने का गौरव भी इस जिम्मेदारी के आगे फीका पड़ता लगा।

उनकी आवाज, उस स्वप्नीय दुनिया में, विनम्र पर दृढ़ थी। “हे मेरे परमेश्वर, तू ने मेरे पिता दाऊद के साथ बड़ी करुणा दिखाई, और अब मुझे उसका स्थान दिया है। मैं तो एक छोटा बालक हूं, न मैं निकलना जानता हूं, न प्रवेश करना। और यह तेरी प्रजा, जो इतनी बड़ी है, इसके बीच में मैं खड़ा हूं। इसलिए मुझे समझदार मन देना, ताकि मैं तेरी इस प्रजा का न्याय कर सकूं, और अच्छे बुरे में भेद कर सकूं। नहीं तो कोई भी इतनी बड़ी प्रजा का न्याय कैसे कर सकता है?”

स्वप्न में परमेश्वर के चेहरे पर, अगर ऐसा कहा जा सकता है, एक प्रसन्नता की झलक दिखी। सुलैमान की यह मांग उसे बहुत भाई। उसने स्वार्थ के बजाय सेवा को चुना था, व्यक्तिगत वैभव के बजाय प्रजा की भलाई को। “क्योंकि तू ने यह बात मांगी है, न तो दीर्घायु मांगी, न धन, न शत्रुओं का विनाश… देख, मैं तेरे वचन के अनुसार करता हूं। सुन, मैं ने तुझे ऐसा बुद्धिमान और समझदार मन दिया है कि तेरे पहले तेरे समान कोई न हुआ, और तेरे बाद तेरे समान कोई न उठेगा। और जिसकी तू ने मांग नहीं की, वह भी मैं तुझे देता हूं—धन और महिमा भी, इतनी कि तेरे जीवन भर तेरे समान कोई राजा न होगा।”

सुबह जब सुलैमान की आंख खुली, तो वह पसीने से तरबतर थे। वह स्वप्न उनकी चेतना पर एक अमिट छाप छोड़ गया था। यरूशलेम लौटकर उन्होंने परमेश्वर के सामने फिर से होमबलि और मेलबलि चढ़ाई, और अपने सभी दासों के साथ एक भोज भी रखा। पर अब उनके भीतर एक नया दृढ़ विश्वास था।

और फिर वह मौका आया जब इस बुद्धि की परीक्षा हुई। कुछ ही दिनों बाद, राजमहल के आंगन में चिल्लाहट सुनाई दी। दो स्त्रियां, दोनों वेश्या, एक जीवित शिशु को लेकर बेतहाशा झगड़ रही थीं। एक रो-रोकर कह रही थी, “हे मेरे प्रभु, यह मेरा जीवित बेटा है, और यह मेरा मरा हुआ बेटा है।” दूसरी गुस्से से चीखती, “नहीं! जीवित बेटा तो मेरा है, मरा हुआ तेरा है!” दोनों के चेहरे पर असली मां का दर्द जैसा दिख रहा था, पर सच्चाई किसके पक्ष में है, कोई सबूत नहीं था।

सुलैमान ने ध्यान से उनकी बात सुनी। उनकी आंखों में एक गहरी चिंतनशीलता थी। फिर उन्होंने एक सैनिक से कहा, “तलवार लाओ।”

एक पल में सन्नाटा छा गया। सुलैमान ने शांत, पर दृढ़ स्वर में आदेश दिया, “इस जीवित बालक को दो टुकड़े कर डालो। आधा-आधा इन दोनों को दे दो।”

पहली स्त्री का चेहरा विरूप हो गया। उसकी सांसें तेज हो गईं, आंखों में एक जंगली, असह्य पीड़ा उभर आई। वह चीखी, “नहीं, हे मेरे प्रभु! उसे जीवित ही इस औरत को दे दो, बस मारो मत!” उसका शरीर सिहर रहा था, जैसे वह खुद तलवार की धार पर हो।

दूसरी स्त्री के चेहरे पर एक क्षणिक, ठंडी संतुष्टि दिखी। उसने कहा, “न तो तेरा रहे, न मेरा। बांट दो।”

वहीं सब कुछ स्पष्ट हो गया। सुलैमान ने हाथ उठाकर सैनिक को रोका। उनकी आवाज में अब करुणा का स्वर था। “बालक को न मारो। पहली वाली को दे दो, वही इसकी मां है।”

वह स्त्री बच्चे को छाती से लगाकर रोने लगी, और पूरा दरबार हैरान रह गया। यह न्याय सुनकर सारे इस्राएलियों के मन में यह बात बस गई कि परमेश्वर की ओर से सुलैमान को सचमुच असाधारण बुद्धि मिली है, न्याय करने की वह दिव्य क्षमता मिली है। और सुलैमान खुद, उस पल, गिबोन की रात और उस स्वप्न को याद कर रहे थे। यह उसी वरदान का पहला फल था—न सिर्फ चतुराई, बल्कि मानव हृदय की गहराइयों तक देख पाने की वह समझ, जो सच्चे न्याय की नींव होती है। उनके राज्य की नींव, उस दिन, एक नए विश्वास पर पड़ी।

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