सामरिया की गलियाँ उदास थीं। हवा में गंदगी और हार की बू आती थी। राजा यहोआहाज के सत्ताईस वर्षों ने इस्राएल को एक ऐसी गहरी खाई में धकेल दिया था, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता था। दमिश्क के राजा हजाएल की सेना, एक लोहे के हल की तरह, उत्तर के इलाकों को बार-बार जोतती रहती थी। फसलें जल जाती थीं, नगरों के द्वार टूटे पड़े रहते थे, और युवकों की एक पूरी पीढ़ी युद्ध के मैदान में मिट्टी हो चुकी थी।
यहोआहाज महल की एक ऊँची खिड़की से बाहर देखता रहता। उसकी आँखों में वह चिनगारी नहीं थी जो उसके पिता यहू के पास थी। वह जानता था कि यह सब क्यों हो रहा है। बाल देवताओं के उन ऊँचे स्थानों की याद, जहाँ उसने स्वयं धूप जलाई थी, अब उसे कचोटती थी। परंतु एक दिन, जब दमिश्क की सेना ने यत्रेह नगर को फिर घेर लिया और वहाँ से चीखों की आवाज़ हवा में तैरकर महल तक आई, तो उसने सिंहासन के सामने घुटने टेक दिए। वह रोया। उसकी प्रार्थना टूटी-फूटी थी, एक दबे हुए राजा की गिड़गिड़ाहट, पर उसमें एक क्षण के लिए वह पुरानी याद जाग उठी—अब्राहम, इसहाक और याकूब के परमेश्वर की।
और कुछ ऐसा हुआ कि परमेश्वर ने उसकी पुकार सुन ली। वह इस्राएल की दुर्दशा देखकर द्रवित हुआ। उसने एक उद्धारकर्ता भेजा, और दमिश्क का दबाव कुछ कम हुआ। सेना वापस हटी। पर यहोआहाज में कोई सच्चा मन परिवर्तन नहीं हुआ था। वह पुराने पापों से चिपका रहा, और नबात के पुत्र यारोबाम के पापों की मूर्तियाँ अभी भी देश में खड़ी थीं। परमेश्वर की दया ने इस्राएल को पूरी तरह नष्ट नहीं होने दिया, पर वह चंगा भी नहीं हुआ। यह एक अधूरी, टालमटोल वाली कृपा थी, जैसे कोई बच्चे को सज़ा देते हुए भी अपना हाथ रोक ले।
यहोआहाज के बाद उसका पुत्र यहोआश राजा बना। वह भी उसी राह पर चला। पर उसके शासनकाल में एक घटना घटी जिसने सबकी आँखें खोल दीं। भविष्यद्वक्ता एलीशा बीमार पड़ गया था। वह बूढ़ा हो चुका था, वही एलीशा जिसने यरदन के पानी को चादर मारकर पार किया था, जिसने एक विधवा के तेल के बर्तन भरे थे, जिसने नामान को कुष्ठरोग से मुक्त किया था। अब वह मृत्युशैया पर पड़ा था।
राजा यहोआश उससे मिलने गया। वह रोया और उसके ऊपर झुककर बोला, “हे मेरे पिता, हे मेरे पिता! इस्राएल के रथ और उसके सवार!” ये वही शब्द थे जो एलीशा ने एलिय्याह के स्वर्गारोहण के समय कहे थे। राजा के मन में शायद एक धुंधली समझ थी कि यह भविष्यद्वक्ता ही इस राष्ट्र की वास्तविक शक्ति था।
एलीशा ने कमज़ोर आवाज़ में कहा, “एक धनुष और कुछ तीर ले आओ।” राजा ने लाकर दिए। फिर एलीशा ने उससे कहा, “अपना हाथ धनुष पर रख।” राजा यहोआश ने हाथ रखा। तब एलीशा ने अपना हाथ राजा के हाथों के ऊपर रख दिया। उस बूढ़े, झुर्रियों भरे हाथ का स्पर्श ठंडा था, पर उसमें एक अंतिम दैवीय शक्ति का संचार था।
“पूर्व की ओर खिड़की खोलो,” एलीशा ने कहा। खिड़की खोली गई। सामरिया के मैदानों पर सूरज की रोशनी पड़ रही थी, वही मैदान जो अराम की सेना के लिए सदैव युद्ध का मैदान बने रहते थे। “तीर चलाओ,” एलीशा की आवाज़ फुसफुसाहट में आई। राजा ने तीर चलाया। और एलीशा ने घोषणा की, “यहोवा का तीर, अर्थात अराम पर विजय का तीर। तू अफ़ेक में अरामियों को पूरी तरह परास्त करेगा।”
फिर एलीशा ने उससे कहा, “अब बाकी तीर लो।” राजा ने लिए। “उन्हें ज़मीन पर मारो।” राजा यहोआश ने तीन बार ज़मीन पर तीर मारे, और फिर रुक गया। भविष्यद्वक्ता का चेहरा क्रोध से भर गया। वह कमज़ोर था, पर उसकी आँखों में आग थी। “तूने पाँच या छः बार मारना था! तब तू अराम को पूर्णतः नष्ट कर देता। अब तू उसे केवल तीन बार ही परास्त करेगा।”
यह एक दृश्य था जो इस्राएल की आत्मा की दशा को दर्शाता था। परमेश्वर पूर्ण विजय देना चाहता था, पर राजा का विश्वास अधूरा, आधे-अधूरे मन का था। उसने केवल तीन बार प्रहार किया। और इस्राएल का भविष्य उसी अधूरेपन में सिमट कर रह गया।
थोड़े दिन बाद एलीशा मर गया और उसे दफ़ना दिया गया। वर्षा का मौसम आया। एक दिन, कुछ लोग एक मुर्दे को दफ़नाने ले जा रहे थे, तभी अचानक लुटेरों का एक दल दिखाई दिया। उन्होंने जल्दी से वह मुर्दा एलीशा की कब्र में डाल दिया। जैसे ही मुर्दे की हड्डियाँ एलीशा की हड्डियों को छू गईं, वह मुर्दा जीवित हो उठा और अपने पैरों पर खड़ा हो गया। मृत्यु में भी, एलीशा की नबुआत का असर मिटा नहीं था। परमेश्वर की शक्ति अपने भविष्यद्वक्ता के साथ बनी रही, यहाँ तक कि उसकी हड्डियों तक में।
राजा यहोआश ने, एलीशा की भविष्यवाणी के अनुसार, तीन बार अराम के राजा बेन्हदद के पुत्र हजाएल को हराया। उसने अपने पिता के समय में खोए हुए नगर वापस ले लिए। पर वह पूर्ण विजय नहीं पा सका। वह अराम के दबाव से मुक्त नहीं हो सका। क्योंकि उसका हृदय अधूरा था। उसने परमेश्वर की आज्ञा को पूरे मन से नहीं पकड़ा था, वह तीर ज़मीन पर केवल तीन बार ही मार सका था।
कहानी का अंत वहीं होता है जहाँ से शुरुआत हुई थी—अधूरापन। परमेश्वर की दया बनी रही, उसने इस्राएल को नष्ट नहीं होने दिया, अपनी वाचा के कारण, अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा के कारण। पर उसकी कृपा को पूरी तरह से पाने के लिए जो पूर्ण समर्पण चाहिए था, वह इस्राएल के राजाओं के पास नहीं था। और इसलिए, जैसे एक घाव अच्छे से नहीं भरता, वैसे ही राज्य बचा तो रहा, पर कभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ। वह प्रतीक्षा करता रहा—एक ऐसे राजा की, जो अपना सारा हृदय, अपनी सारी शक्ति, अपने सारे तीर, परमेश्वर के हाथों में रख दे।




