पवित्र बाइबल

कूश की शांति और यहोवा की दराँती

नील नदी के किनारे-किनारे फैले उस देश में, जहाँ साँझ की हवा तट पर उगे पपीरस के पेड़ों को सरसराती थी, एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। कूश देश के लोग, जो लम्बे और चिकने बदन वाले थे, आजकल चेहरे पर एक अजीब सी उदासी लिए फिरते। नदी के पानी का रंग बदलता था – कभी मटमैला, कभी स्याह, मानो आने वाले दिनों का संकेत दे रहा हो।

एक दिन, दूर से आते हुए दूतों की खबर फैली। वे नावों में सवार थे, पर उनकी नावें साधारण नहीं थीं। उनके पाल मजबूत कपड़े के नहीं, बल्कि ऐसे थे जैसे किसी विशाल पक्षी के पंखों को फैलाकर टांग दिया गया हो। नावें पानी को चीरती हुई आ रही थीं, ऐसी तेज़ कि नील की लहरें भी उनके आगे फटी-फटी सी लगतीं। ये दूत दुनिया के कोने-कोने से आए थे, उन देशों से जो ताकतवर थे और डरावने भी। उनके चेहरे पर एक अद्भुत आत्मविश्वास था, मानो पृथ्वी की हर चीज़ उनके वश में हो।

वे कूश के बुजुर्गों से मिले। उनकी भाषा में एक अजीब सी ध्वनि थी, कर्कश पर आदेश देती हुई। “सुनो,” उन्होंने कहा, “दूर-दूर तक, जहाँ तक नदी की धारा जाती है और जहाँ तक हवा के झोंके पहुँचते हैं, हमारा राज है। हम एक ऐसी जाति हैं जो पहाड़ों को काट सकती है और नदियों की दिशा बदल सकती है। तुम्हारे इस देश को, जो ऊँचे-ऊँचे लोगों का देश कहलाता है, अब हमारे सामने झुकना होगा।”

कूश के लोग सुनते रहे। उनके दिल धड़क रहे थे, पर वे चुप थे। बुजुर्गों ने एक दूसरे की ओर देखा। उनकी आँखों में सवाल था, पर कोई जवाब नहीं। दूतों ने यह चुप्पी अपनी जीत समझी। वे अपनी अजीबो-गरीब पंखों वाली नावों पर वापस सवार हो गए और नील नदी की धारा के साथ-साथ आगे बढ़ गए, और दूसरे देशों को डराने।

पर कूश की धरती पर अब वैसी शांति नहीं रही। लोगों के मन में एक डर बैठ गया था। उनकी फसलें खेतों में लहलहा रही थीं, पर उनकी आँखों में चमक नहीं थी। अंगूर के बागों में फल पक रहे थे, मधुर गंध हवा में तैर रही थी, पर लोगों के होंठों पर मुस्कान नहीं थी। ऐसा लगता था जैसे पूरी सृष्टि एक साँस रोके खड़ी है, किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रही है।

और तभी, एक दिन, बिना किसी सूचना के, जैसे किसी ने अदृश्य हाथ से आकाश का पर्दा खींच दिया हो, एक परिवर्तन आने लगा। वह ताकत, जो दूर-दूर तक फैली हुई थी, जिसके डर से पहाड़ भी काँपते थे, सिकुड़ने लगी। ऐसा नहीं था कि कोई युद्ध हुआ, या कोई महामारी आई। बल्कि, उसका अहंकार ही, धीरे-धीरे, एक विशाल पर्वत की तरह, अपने ही भार से दबकर ढहने लगा।

फिर वह समय आया जब नील नदी के किनारे फिर से वही पुरानी शांति लौट आई। पर अब यह शांति डर की नहीं, बल्कि एक गहरी समझ की शांति थी। कूश के बुजुर्ग अक्सर नदी किनारे बैठकर युवाओं को समझाते। “देखो,” वे कहते, “जब फसल पूरी तरह पक जाती है, और अंगूर का रस मीठा होने लगता है, तो किसान दराँती लेकर आता है। पर वह दराँती फसल को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसे एकत्र करती है। उसी तरह, समय आने पर, एक महान किसान इस पृथ्वी की फसल काटने आएगा। और तब, सारी ताकतें, सारे गौरव, सारे अहंकार, उसके सामने अनाज के दानों की तरह बिखर जाएँगे।”

समय बीतता गया। और एक दिन, सुदूर पश्चिम से, जहाँ यहोवा का पर्वत था, एक और खबर आई। अब खबर लाने वाले डरावने दूत नहीं थे, बल्कि यात्रा करने वाले व्यापारी थे। उन्होंने बताया कि सिय्योन की पहाड़ी पर, अब एक ऐसा स्थान है जहाँ सब देश, सब जातियाँ, एक साथ इकट्ठा होती हैं। और कूश के लोग भी, जो कभी डरे हुए थे, अब उस यात्रा पर निकल पड़े। वे अपने साथ उपहार लेकर चले – नील नदी के किनारे उगी हुई सुगंधित लकड़ी, और उनकी मिट्टी के बने हुए बर्तन, जिन पर उनकी संस्कृति की कहानियाँ खुदी थीं।

जब वे उस पवित्र पर्वत पर पहुँचे, तो देखा कि वहाँ दुनिया के कोने-कोने से लोग आए हुए हैं। और सबके हाथों में उपहार हैं। और उन सब उपहारों को, सबकी भक्ति को, वहाँ एक स्थान पर रख दिया गया – यहोवा के भवन में। कूश के लोगों ने देखा कि उनके डर का कारण, वह ताकतवर जाति, आज उन्हीं के बीच खड़ी है, पर अब उसके हाथों में तलवार नहीं, बल्कि शांति के उपहार हैं। उस दिन उन्हें समझ आया कि जो प्रभु सारी पृथ्वी का मालिक है, वही दराँती लेकर आता है, और वही शांति का मार्ग भी दिखाता है। और नील नदी के किनारे बैठे बुजुर्ग की आवाज़ फिर गूँज उठी, मानो हवा के झोंके में सनसनाहट हो – “देखो, परमेश्वर की दराँती तेज़ है, पर उसकी करुणा उससे भी बड़ी है।”

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