पवित्र बाइबल

रात्रि में दाऊद का आकाशीय चिंतन

रात ठंडी थी, और आकाश में बादलों की एक पतली चादर के पार तारे टिमटिमा रहे थे। दावूद अपनी भेड़ों के बीच एक ऊँची पहाड़ी पर बैठा था। उसकी मशाल की लौ अब धुंधली पड़ चुकी थी, लेकिन चाँद की रोशनी इतनी तेज़ थी कि पहाड़ की ढलान पर हर पत्थर साफ दिख रहा था। हवा में सन्नाटा था, बस दूर कहीं एक उल्लू की आवाज़ और भेड़ों के हिलने-डुलने की मद्धिम सी खड़खड़ाहट।

उसने सिर उठाया और ऊपर देखा। आकाश अथाह लग रहा था, अनंत का एक काला पटल, जिस पर चाँद और तारे ऐसे टँके थे मानो किसी ने बिखेर दिए हों। एक अजीब सी गुदगुदी उसके मन में उठी। यह सब किसने बनाया? यह चाँद, यह सप्तर्षि, वह ध्रुवतारा जो हमेशा टिका रहता है? उसके मुँह से अनायास ही शब्द फूट पड़े, “हे प्रभु, हे हमारे प्रभु, तेरा नाम सारी पृथ्वी पर कैसा महान है!”

वाक्य उसके हृदय की गहराई से निकला था। उसे लगा जैसे यह विस्तार, यह नीरवता, यह सारी रचना उस एक नाम की गवाही दे रही है। फिर एक विचार ने उसे झकझोरा। इतनी विशाल कृतित्व, इतनी सूक्ष्म योजना… और फिर मनुष्य? इस अथाह ब्रह्मांड के सामने तो मनुष्य एक क्षणभंगुर प्राणी मात्र है। वह बुदबुदाया, “जब मैं तेरे आकाश को, जो तेरी उँगलियों का काम है, देखता हूँ, तो मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि ले? या मनुष्य-सन्तान क्या है कि तू उसकी चिन्ता करे?”

उसकी नज़र नीचे, घाटी में बसे छोटे-से गाँव पर पड़ी, जहाँ कुछ दीपक अब भी जल रहे थे। वहाँ लोग सो रहे थे, कल सुबह फिर अपने-अपने कामों में लग जाएँगे। कितने छोटे, कितने सीमित। फिर भी… फिर भी उसे यहोवा का वह वच� याद आया, उस आदि आदेश की – “पृथ्वी को अपने वश में करो।” एक अद्भुत विरोधाभास था यहाँ। इस विशाल सृष्टि के मालिक ने मनुष्य को, इस धूल-कण को, इतना महत्व दिया था?

वह सोचने लगा। उसने देखा था कैसे भेड़ें उसकी आवाज़ पहचानती हैं, कैसे उसके हाथ से चारा खाती हैं। क्या वह स्वयं, दावूद, उस महान रचनाकार के लिए कुछ वैसा ही था? उसने महसूस किया, हाँ, शायद ठीक वैसा ही। परमात्मा ने मनुष्य को “स्वर्गदूतों से थोड़ा ही न्यून” बनाया था। उसे गरिमा दी थी, उसे प्रतिष्ठा का मुकुट पहनाया था। उसके हाथ में सृष्टि का काम सौंपा था – भेड़-बकरी, गाय-बैल, आकाश के पक्षी, समुद्र की मछलियाँ, जो समुद्र के मार्गों से गुज़रती हैं।

रात की हवा और ठंडी हो गई। दावूद ने अपना चोगा कसकर लपेटा। उसका मन अब आश्चर्य से भर उठा था। यह कैसी करुणा थी? यह कैसा प्रेम था? इस असीम आकाश के स्वामी ने न केवल मनुष्य की सुध ली, बल्कि उसे अपनी सृष्टि का प्रबन्धक नियुक्त किया। उसे अपनी छवि में ढाला। उसके मन में वही प्रश्न फिर उमड़ा, लेकिन अब विस्मय के एक नए स्वर के साथ, “हे प्रभु, हे हमारे प्रभु, तेरा नाम सारी पृथ्वी पर कैसा महान है!”

उसने अपना सिर घुमाया और भेड़ों को देखा। वे शान्त थीं, सुरक्षित। उसे लगा जैसे वह स्वयं उस महान चरवाहे की भेड़ है, जो उसकी रखवाली करता है। रात अब भी गहरी थी, तारे अब भी टिमटिमा रहे थे, लेकिन दावूद के हृदय में एक गहरी शान्ति और एक अदम्य आनन्द भर गया था। उसने अपना मुँह फिर आकाश की ओर किया, और एक धीमी, किन्तु दृढ़ स्वर में वही पद फिर दोहराया, जो उसके आत्मा से निकलकर, उस रात के सन्नाटे में, उस पहाड़ी से होता हुआ, शायद स्वर्ग तक पहुँच गया।

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