वह दिन ढल रहा था, और बाग़ की हवा में ख़ुमार सा छाया हुआ था। श्लोमित अपनी छोटी सी कुटिया के द्वार पर बैठी, उंगलियों से जैतून के पेड़ की एक टहनी को सहलाते हुए, उसने आने वाले कदमों की आहट सुनी। वह आहट उसके लिए संगीत थी – धीमी, दृढ़, और जानी-पहचानी। सुलेमान आ रहा था।
उसने आंखें बंद कर लीं, और अपने मन में उस वर्णन को उभरने दिया जो उसके प्रिय ने अक्सर किया था – उसके पैरों का वर्णन। वे साधारण स्त्री के पैर नहीं थे, उसने सोचा। वे तीर्थयात्रा के पैर थे। उन्होंने गलील की पहाड़ियों की धूल चखी थी, यरदन के पास की कंकरीली ज़मीन पर चलना सीखा था। प्रत्येक उंगली, प्रत्येक निशान, एक गाथा कहता था ऐसे प्रेम की, जो केवल देह का मोह नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा थी। सुलेमान कहता था, “तेरे जूतियों में रहने वाली पुत्री की उंगलियां गोल-मटोल हैं, जैसे कोई शिल्पकार नगीने जड़ दे।” उसे याद आया, कैसे एक बार उसके पैरों में छाले पड़ गए थे, जब वह दूर दक्षिण के बाग़ों से उसकी खोज में चली आई थी। वह दर्द अब एक मधुर स्मृति थी।
“श्लोमित,” एक आवाज़ ने उसकी ध्यानमग्नता को तोड़ा। सुलेमान द्वार पर खड़ा था, उसकी आंखों में वही चमक थी जो उस समय दिखती थी जब वह कोई नया गीत रचता। “तुम यहां बैठी क्या सोच रही हो?”
“तुम्हारे शब्दों को सोच रही हूं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “तुम कहते हो मेरी जांघें कलात्मक मोतियों जैसी हैं, जैसे किसी महारथी की कृति। पर क्या तुम जानते हो, ये जांघें तब कांप उठती हैं जब तुम दूर चले जाते हो? ये शक्ति केवल तुम्हारे सामने ही है।”
सुलेमान उसके पास आ बैठा। हवा में सरसों के फूलों की हल्की सी खुशबू तैर रही थी। उसने अपनी उंगली से उसकी नाभि का घेरा सहलाया, एक गोल, सुडौल प्याला, जिसमें उसकी नज़र में लबालब शरबत भरा था। “तेरी नाभि एक गोल प्याला है, जिसमें मिश्रित शरबत की कभी कमी नहीं,” उसने फुसफुसाया। “यहां से वह सारा प्रेम उमड़ता है, वह सारा जीवन, जो तुझे संपूर्ण बनाता है। यह कोई साधारण निशान नहीं, यह तो जीवन के स्रोत का प्रतीक है।”
श्लोमित ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसका ध्यान उसके वक्षस्थल की ओर गया, जिसकी तुलना सुलेमान हमेशा गुलाबों से लदी हुई, हिरनों से भरी हुई श्रेणी से करता था। “वे हिरन,” उसने धीरे से कहा, “जो जंगल में स्वतंत्र घूमते हैं, क्या वे मेरे हृदय की धड़कन नहीं हैं? जब तुम मेरे निकट होते हो, तो वे शांत हो जाते हैं, चरागाह पा जाते हैं। जब तुम दूर होते हो, तो वे फिर बेचैन होकर भागने लगते हैं।”
दोनों कुछ देर चुप रहे। दूर कहीं एक कोयल बोली। सुलेमान ने उसकी गर्दन की ओर देखा, हाथीदांत की मीनार जैसी, जिसके बारे में वह कविताएं लिखता रहता। “तेरी गर्दन हाथीदांत की बनी मीनार सी है,” उसने कहा। “न केवल सुंदर, बल्कि दृढ़। यह वह स्थान है जहां से तेरी आवाज़ निकलती है, वह गीत जो मेरे हृदय को छू लेता है। और तेरी आंखें… हेशबोन की तालाबों जैसी, यरीहो के फाटक के पास।”
“वे तालाब साफ़ और गहरे होते हैं,” श्लोमित ने कहा, उसकी आंखों में झांकते हुए। “कभी-कभी मुझे डर लगता है कि तुम उनकी गहराई में देखोगे और मेरे भीतर का कोई भय, कोई कमजोरी पा जाओगे।”
“और जब पाता हूं,” सुलेमान ने उसका हाथ थाम लिया, “तो वे और भी प्रिय हो जाती हैं। क्योंकि प्रेम केवल सुंदरता से नहीं, सच्चाई से बनता है।”
धीरे-धीरे शाम उतर रही थी। सुलेमान ने उसके सिर, कर्मल के पर्वत की ओर देखा, और उसके बालों का रंग, जो बैंगनी था, एक राजा के बंधन में बंधा हुआ। “तेरा सिर कर्मल के समान है,” उसने कहा, उसके घने, लहराते बालों में उंगलियां फेरते हुए। “और तेरे बालों का रंग बैंगनी है। एक राजा स्वयं इन धागों में बंध गया है।” यह एक ऐसा बिंब था जिसने श्लोमित को हमेशा विस्मित किया – वह, एक साधारण सी देहाती स्त्री, और उसके साधारण से बाल, एक महान राजा को बंदी बनाए हुए।
“मैं तो केवल श्लोमित हूं,” उसने कहा, आंखें झुकाकर।
“और मैं केवल सुलेमान,” उसने प्रत्युत्तर दिया। “पर जब हम इस प्रेम में एक होते हैं, तो हम वह सब कुछ बन जाते हैं जिसकी रचना परमपिता ने की है – राजा और रानी, प्रेमी और प्रेमिका, आत्मा और आत्मा।”
उसने उसे अपनी ओर खींचा, और उसके होंठों का स्पर्श अनार के मीठे दानों जैसा था, जैसा उसने कहा था। यह केवल एक चुंबन नहीं था; यह एक प्रार्थना थी, एक स्वीकारोक्ति, एक दावा। “तेरे तालू उत्तम दाखमधु के समान है,” उसने उसके कान में फुसफुसाया। “मेरे लिए सीधा बहता हुआ, मेरे प्रिय के होंठों और दांतों से होकर गुज़रता हुआ।”
वह हंस पड़ी, एक मुक्त, संगीतमय हंसी। “तो क्या मैं अब दाखमधु हूं, जिसे राजा पीता है?”
“तू मेरे लिए वह सब कुछ है,” उसने कहा, गंभीर होकर। “तू उस दाखलता की तरह है जिसकी शाखाएं दूर-दूर तक फैली हों, और जिसकी सुगंध सारे बाग़ में छाई हुई है। तेरे वक्षस्थल दाखलताओं के गुच्छों के समान हैं, तेरी सांस सेबों के समान मीठी है।”
अब अंधेरा पूरी तरह छा गया था। आकाश में तारे टिमटिमाने लगे थे। श्लोमित ने सिर उठाकर सुलेमान की ओर देखा। “मेरा प्रिय, आओ, हम गांव को छोड़कर, दाख की बारियों में चलें। वहां हम देखेंगे कि क्या दाखलता फल गई है, क्या अंगूर मंजर में आए हैं, क्या अनार खिले हैं। वहीं मैं तुम्हें अपना प्रेम दूंगी।”
यह निमंत्रण केवल शारीरिक नहीं था। यह आत्माओं का मिलन था, एक ऐसी यात्रा जहां वे परमप्रेम के रहस्यों को, उस दैवीय प्रेम के प्रतिरूप को और गहराई से तलाश सकते थे, जिसका वर्णन इस गीत में छिपा था। सुलेमान ने उठकर उसका हाथ थाम लिया।
“तुम्हारे प्रेम की सुगंध सबसे उत्तम दाखमधु से भी बढ़कर है,” उसने कहा। “और तेरे होंठों का स्वाद, हां, वह दूध और मधु का है, और तेरे वस्त्रों की सुगंध लबानोन की सुगंध के समान है।”
वे कुटिया से बाहर निकले, और बाग़ की ओर चल पड़े, जहां दाखलताएं उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। श्लोमित ने पीछे मुड़कर देखा – वह साधारण द्वार, वह साधारण बैठक, जहां एक असाधारण प्रेम का गीत एक बार फिर गूंज उठा था। वह जानती थी कि यह गीत केवल उन दोनों का नहीं था। यह हर उस आत्मा का गीत था जो अपने सृष्टिकर्ता की खोज में निकलती है, और उसे पाकर यह कहने का साहस जुटा पाती है – “मैं अपने प्रिय की हूं, और उसकी इच्छा मेरी ओर है।”
और इस तरह, दो छायाएं बाग़ की ओर डूबती शाम में विलीन हो गईं, एक दूसरे के प्रेम में, और उस महान प्रेम में जिसका यह केवल एक मधुर, मानवीय प्रतिबिंब था। रात की हवा में दाखलताओं के पत्तों की सरसराहट उस अनंत गीत के बोल गुनगुना रही थी, जो आदि से है, और अनंत तक रहेगा।




