एक था किसान, नाम था उसका श्रीधर। वह गाँव के बाहर, एक टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी के अंत में बसे अपने खेत के छोटे से घर में रहता था। उसके दो पुत्र थे। बड़ा, ध्रुव, शांत और विचारशील था। छोटा, तेजस, उत्साह से भरा, पर जल्दी ही क्रोध में आग बबूला हो जाता था। उनका गाँव, जो कभी शांत और व्यवस्थित था, अब एक नए पटवारी, रामलाल के आने के बाद से बदल रहा था। रामलाल घूस खाता था, गरीबों को दबाता था, और झूठे गवाह खड़े करके निर्दोषों को सताता था।
एक दिन, श्रीधर ने अपने दोनों बेटों को बुलाया। खेत की मेड़ पर बैठे, सामने सूरज डूब रहा था, और आकाश सिंदूरी हो रहा था। उसने कहा, “बेटा, जब न्याय करने वाले लोग ही टेढ़े हो जाएँ, तो प्रजा सिसकियाँ भरती है। यह आयत सच होती दिख रही है। पर याद रखो, जो मनुष्य बार-बार डाँट सहता है भी, पर अपनी हठ नहीं छोड़ता, वह अचानक टूट जाएगा और उसका उद्धार नहीं होगा।”
ध्रुव ने सिर झुका कर सुना। उसकी आँखों में गाँव के दुख की समझ थी। पर तेजस का चेहरा क्रोध से तमतमा गया। “पिताजी,” उसने कहा, “हमें कुछ करना चाहिए! इस रामलाल को सबक सिखाना चाहिए। उसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए।”
श्रीधर ने धीरे से कहा, “आवाज़ उठाना और हिंसक होना, दोनों में फर्क है, बेटे। क्रोधी मनुष्य झगड़ा उत्पन्न करता है, और जल्दी क्रोध करने वाला अधर्म कर बैठता है।”
दिन बीते। रामलाल का अत्याचार बढ़ता गया। एक दिन, उसने श्रीधर के पड़ोसी, एक विधवा बुढ़िया की जमीन हड़पने की कोशिश की। तेजस ने यह सुना तो उसका खून खौल उठा। बिना सोचे-समझे, वह सीधा रामलाल के दफ्तर पहुँच गया और उसके सामने जोरदार विरोध करने लगा। उसकी भाषा कटु थी, आरोप असंयत। रामलाल, एक चालाक और गिद्ध-सा व्यक्ति, शांत मुस्कान के साथ सुनता रहा। अगले ही दिन, उसने झूठे कागजात तैयार करवाए और तेजस पर ही जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप लगा दिया। तेजस फँस गया। उसका जल्दी किया गया क्रोध, उसके लिए जाल बन गया।
वहीं, ध्रुव ने एक अलग रास्ता चुना। वह चुपचाप गाँव के बुजुर्गों, शिक्षक और ईमानदार दुकानदारों के पास गया। उसने तथ्य एकत्र किए, दस्तावेजों की प्रतियाँ बनवाईं। वह जानता था कि मन की गुप्त बातें प्रकट करना यहोवा की महिमा है। उसने सच्चाई को, शांत और दृढ़ता से, प्रकाश में लाने का निश्चय किया। उसकी बातों में क्रोध नहीं, सत्य का आग्रह था।
एक शाम, जब रामलाल गाँव के मुखिया के घर एक दावत में था और शराब के नशे में डींगें हाँक रहा था, ध्रुव वहाँ पहुँचा। उसने न तो शोर मचाया, न अभद्र भाषा का प्रयोग किया। उसने सिर्फ वो दस्तावेज मेज पर रख दिए, और कहा, “हुजूर, जब दुष्ट बढ़ते हैं, पाप बढ़ता है। पर धर्मी उनके पतन को देखेंगे।”
मुखिया, जो पहले से ही रामलाल के घमंड से तंग आ चुके थे, उन दस्तावेजों को देखा। रामलाल के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी झूठी दुनिया, सच के एक टिमटिमाते दीए के सामने, धुँधली पड़ने लगी। जांच शुरू हुई। रामलाल के सभी छल-कपट, एक-एक करके, सबके सामने आने लगे। गाँव की जनता, जो अब तक डर के मारे चुप थी, उठ खड़ी हुई। अंततः, रामलाल का स्थानांतरण कर दिया गया।
तेजस जेल से बाहर आया, पर उसका अहंकार टूट चुका था। एक दिन, वह भाई के पास गया। “तुमने जो किया, वह मैं नहीं कर पाया,” उसने कहा, आवाज़ भारी थी।
ध्रुव ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “तेजस, अंधकार में सत्य की एक मशाल, गुस्से की सैकड़ों मशालों से ज्यादा ताकतवर होती है। पिताजी ने कहा था ना, घमण्डी मनुष्य का अपमान होता है, पर नम्रता सम्मान पाती है। सच बोलने वाला निर्भय होकर बोलता है। मैं निर्भय नहीं था, पर सच के सहारे खड़ा था।”
उस रात, श्रीधर ने फिर दोनों बेटों को अपने पास बिठाया। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, और दूर से झींगुरों की आवाज़ आ रही थी। “देखो,” उसने कहा, “मनुष्य के लिए यही अच्छा है कि वह यहोवा का भय माने। उसकी आज्ञाओं पर दृढ़ रहे। वही उसे स्थिर रखती हैं। क्योंकि इंसान के सभी रास्ते उसकी अपनी आँखों में सीधे लगते हैं, पर यहोवा ही मनों को जाँचता है। हमें अपने गुस्से पर, अपने अहंकार पर नहीं, बल्कि उसकी सीधी राह पर चलने वाली बुद्धि पर भरोसा करना है।”
तेजस की आँखें नम थीं। यह पाठ, उसे कोर्ट-कचहरी के चक्करों से कहीं ज्यादा गहरा लगा। और ध्रुव जानता था कि यह कोई जीत नहीं, बस एक सफर का पड़ाव था। क्योंकि धर्म का मार्ग हमेशा सीधा नहीं होता, उसमें खेत की मेड़ों-सी टेढ़ भी होती है, पर जो दृढ़ रहता है, वह अंततः उजाले की तरफ ही निकलता है। गाँव में फिर से शांति छा गई, न कि डर से, बल्कि एक खामोश, स्थिर विश्वास से कि सत्य, चुपचाप ही सही, अपनी जगह बना ही लेता है।




