शहर के बाहरी इरादे में, जहाँ मिट्टी के रास्ते खेतों में मिल जाते थे, शमौन नाम का एक बढ़ई रहता था। उसके हाथों पर गोंद और लकड़ी की बारीक रेखाएँ थीं, और आँखों में एक ऐसी थकान थी जो नींद से नहीं, बल्कि लंबे समय तक चली आ रही उम्मीदों के मुरझाने से आती है। उन दिनों हवा में धूल के सिवा कुछ नहीं उड़ता था। नदी का पानी सिमटकर एक पतली, मटमैली धारा रह गया था, और लोग बातचीत में भी आवाज़ को धीमा रखते, मानो कोई सुन लेगा तो और संकट आ जाएगा।
शमौन का दिल बेचैन था। वह सुबह-सुबह उठकर उस सूखे नदी किनारे बैठ जाता, जहाँ पुराने अंजीर के पेड़ की जड़ें पत्थरों को चीर निकली थीं। वहाँ बैठे-बैठे वह पुरानी बातें याद करता—कैसे उसके बाबा बताया करते थे कि एक वक्त था जब यहाँ से होकर परमेश्वर के लोग गुजरे थे, और उनके गीतों से घाटी गूँज उठी थी। अब तो गीत भी बिसर गए थे। न्याय नाम की चीज बाजार में सस्ते सिक्कों की तरह घिस गई थी। जो दबे-कुचले थे, वे और दबते जा रहे थे। जो टूटे हुए थे, उनकी चिंगारी भी बुझती दिख रही थी।
एक दिन, जब दोपहर की ऊँची धूप में हवा थम-सी गई थी, शमौन को कुछ अजीब-सा अनुभव हुआ। वह अंजीर के पेड़ के नीचे ऊँघ रहा था कि अचानक उसे ऐसा लगा जैसे कोई साथ बैठा है। कोई आहट नहीं थी, कोई छाया नहीं थी, पर एक उपस्थिति का एहसास था, ठीक वैसे ही जैसे दीये की लौ से पहले उसकी गर्मी का पता चलता है। और फिर, उसके भीतर, शब्द नहीं, बल्कि एक विचार का प्रवाह उमड़ आया, मानो कोई बात उसकी अपनी नहीं, बल्कि बाहर से डाली जा रही हो।
वह विचार कह रहा था—देख, मेरा सेवक, जिसे मैंने थाम रखा है। वह मेरा चुना हुआ है, उससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैंने अपनी आत्मा उस पर उतार दी है। वह अन्यजातियों के लिए न्याय प्रकट करेगा।
शमौन की आँखें खुल गईं। चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। पर उसका मन अब वैसा नहीं था। उसने देखा—नहीं, देखा नहीं, महसूस किया—एक व्यक्ति का चेहरा, धुंधला-सा, पर उसकी आँखों में एक अदम्य कोमलता थी। वह चिल्लाएगा नहीं, सड़क पर अपनी आवाज नहीं उठाएगा। टूटी हुई नरसल को न तोड़ेगा, और धूम्रपान होती बत्ती को न बुझाएगा। वह सच्चाई से न्याय स्थापित करेगा। वह हतोत्साहित नहीं होगा, न निराश, जब तक वह पृथ्वी पर न्याय को स्थिर न कर दे।
यह दृश्य शमौन के सामने एक साकार स्वप्न की तरह टिका रहा। उसने महसूस किया कि यह सेवक अकेला नहीं चलेगा। उसका हाथ थामकर चलाने वाला, उसकी रक्षा करने वाला, उसे लोगों के साथ वाचा बनाने और अन्धकार से बाहर निकालने के लिए तैयार करने वाला कोई है। वही परमेश्वर, जिसने आकाश को रचा और पृथ्वी को फैलाया, जो मनुष्यों में सांस फेंकता है, वही अब एक नए काम का आरम्भ कर रहा था। पुराने अद्भुत काम—मिस्र से छुड़ाना, समुद्र को चीरना—उनकी याद दिलाकर वह कह रहा था कि देखो, मैं फिर कुछ नया करने जा रहा हूँ, अभी यह अंकुरित हो रहा है, क्या तुम इसे देख नहीं सकते?
उस दिन के बाद शमौन बदल गया। वह अब नदी किनारे निराश बैठने नहीं जाता था। उसकी कार्यशाला में काम फिर से शुरू हुआ। हथौड़े की चोट में एक नया ताल आ गया। लोग आते और पूछते, “शमौन, तुम्हारे चेहरे पर यह प्रकाश कहाँ से आया?” वह बस मुस्कुरा देता, और कहता, “क्या तुमने कभी उस टूटी चरनी के बारे में सोचा है, जिसमें से कोई नया जीवन निकल आए? या उस दबी हुई चिंगारी के बारे में, जो हवा पाते ही फिर से भड़क उठे?”
लोग उसकी बात समझ नहीं पाते थे। पर शमौन जानता था। वह जानता था कि जो न्याय और उद्धार का वादा है, वह एक जोरदार घोषणा की तरह नहीं, बल्कि एक धीमे, स्थिर बीज के अंकुरण की तरह आएगा। वह सेवक, जिसका उसने सपना देखा था, वह अपनी लौ को बुझने नहीं देगा। वह धीरे से, दृढ़ता से, अन्धकार को चीरता हुआ आगे बढ़ेगा, और उसके पदचिह्नों पर नई सड़कें बनेंगी, नदियाँ रेगिस्तान में बह निकलेंगी, और जो अंधे हैं, वे एक नई रोशनी देखेंगे।
और शमौन, अपनी साधारण कार्यशाला में, लकड़ी को छीलते हुए, उस दिन का इंतज़ार करने लगा। नहीं, इंतज़ार नहीं, वह तो अब उस वादे के साथ जीने लगा था। हवा में अब भी धूल उड़ती थी, पर उस धूल में अब एक संभावना की महक थी। सब कुछ वैसा ही था, पर सब कुछ बदल चुका था।




