शिलोह के खंडहरों पर शाम ढल रही थी। हवा में धूल और उदासी का स्वाद था। एलियाकीम, जो अब अपने नाम के अर्थ ‘परमेश्वर उठाएगा’ पर कोई विश्वास नहीं रखता था, एक टूटी हुई दीवार के सहारे बैठा, आँखें बंद किए हुए। उसके कानों में अभी भी सुबह की सभा के शब्द गूँज रहे थे। यिर्मयाह, वह पागल नबी, चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था, “वे क्यों कहते हैं कि हम बुद्धिमान हैं, और हमारे पास यहोवा की व्यवस्था है? देखो, झूठे लेखकों के लेखन ने उसे झूठ में बदल दिया है!”
भीड़ हँसी थी। एक युवक ने तो यिर्मयाह पर सड़ी हुई अंजीर फेंकी थी। एलियाकीम भी मुस्कुराया था। बुद्धिमान? हाँ, वे बुद्धिमान थे। उन्होंने बेबीलोन के सितारों का अध्ययन किया था, व्यापार के गणित में निपुण थे, और मिस्र से आए नए देवताओं के पंथों को अपनाने में चतुराई दिखाई थी। यहोवा की व्यवस्था? वह तो पुराने दिनों की बात थी, जब दादा-परदादा रेगिस्तान में भटकते थे। अब यरूशलेम एक समृद्ध नगर था, और समृद्धि के लिए लचीलापन ज़रूरी था।
पर अब, इस एकांत में, उसकी मुस्कान विलीन हो गई। यिर्मयाह के शब्द, जैसे किसी नुकीले हथियार की तरह, उसकी आत्मा में घुस कर वहीं अटक गए थे। “क्या वे लज्जित हुए क्योंकि उन्होंने घृणित काम किया? वे तनिक भी लज्जित नहीं हुए, उन्हें शर्म आनी भी नहीं आती। इस कारण वे गिरनेवालों के संग गिरेंगे…”
ऊपर आकाश में, टिड्डियों का एक झुंड चला जा रहा था, सूरज की अंतिम किरणों में चमकीले काले धब्बों की तरह। एलियाकीम ने सोचा, वे कहाँ जा रहे हैं? एक निश्चित समय पर, एक निश्चित दिशा में। प्रकृति का नियम। और हम? हमने कहा था, ‘शांति है, शांति है,’ जहाँ कोई शांति नहीं थी। उसने अपनी युवावस्था याद की, जब उसके पिता उसे सिलोह लाया करते थे, जहाँ वाचा का सन्दूक रखा था। वह स्थान अब उजाड़ पड़ा था। परमेश्वर की महिमा कब और कैसे चली गई? कोई नहीं जानता था। एक दिन बस इतना हुआ कि लोगों ने महसूस किया कि वह स्थान खोखला है, और उन्होंने दूसरे स्थानों की ओर देखना शुरू कर दिया।
वह उठा और धीरे-धीरे नगर की ओर चल पड़ा। रास्ते में जैतून के पेड़ों की कतार थी, जिनकी पत्तियाँ हल्की हवा में सरसरा रही थीं। यिर्मयाह की आवाज़ फिर उसके मन में आई, “हम क्यों बैठे रहते हैं? इकट्ठे हो जाओ, और हम दृढ़ नगरों में चले जाएँ, और वहाँ मर जाएँ…” यह एक भयानक, निराशाजनक आह्वान था। मर जाएँ? क्यों? बेबीलोन की सेना दूर थी। राजा और उसके सलाहकार सब ठीक कर देंगे। संधियाँ होंगी, समझौते होंगे।
नगर में प्रवेश करते ही, उसे बाज़ार के पास जमावड़ा दिखाई दिया। लोग एक भविष्यवक्ता के इर्द-गिर्द जमा थे, जो बलिदान की वेदी के सामने खड़ा था। वह मीठी आवाज़ में बोल रहा था, “यहोवा कहता है, मैं तुम्हें इस भूमि में शांति दूँगा। बेबीलोन के राजा से मत डरो, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ।” लोगों के चेहरे तनावमुक्त हो गए। एक स्त्री ने राहत की सांस ली। एक व्यापारी मुस्कुराया। यही वह सन्देश था जिसे वे सुनना चाहते थे। एलियाकीम भी ठहर गया। शायद यही सत्य था। शायद यिर्मयाह वास्तव में पागल था, एक कटु सत्य का झोंका जिसे सहन करने की आवश्यकता नहीं थी।
वह अपने घर की ओर मुड़ने ही वाला था कि उसकी नज़र नगर के द्वार पर लगे एक सूली पर पड़ी। उस पर तीन डाकू लटके हुए थे, कौवे उनकी आँखें नोच रहे थे। एकाएक, यिर्मयाह का कथन साकार हो उठा, “फिर मैंने क्या देखा? इस देश की कुमारियाँ और युवक गिरकर मर रहे हैं।” मृत्यु यहाँ थी, अभी, उनकी दहलीज पर। और वे ‘शांति, शांति’ का नारा लगा रहे थे।
रात को, वह सो नहीं पाया। छत पर लेटे-लेटे वह तारों को देखता रहा। भविष्यवक्ता का वह प्रश्न उसे सताने लगा, “क्या गिलाद में कोई बाम नहीं है? क्या कोई वैद्य नहीं है? फिर मेरी प्रजा के घाव क्यों नहीं भरते?” गिलाद का बाम, चिकित्सा की प्रसिद्ध दवा। और वैद्य? याजक, भविष्यवक्ता, राजा… सब थे। फिर भी घाव भरने का नाम नहीं ले रहे थे। बल्कि, वे और गहरे होते जा रहे थे। उसने अपने हृदय पर हाथ रखा। वहाँ एक सूनापन था, एक ऐसा घाव जिसे उसने कभी स्वीकार ही नहीं किया था।
भोर होने से पहले, वह फिर शिलोह के खंडहरों की ओर चल पड़ा। इस बार, एक अजीब आकर्षण से खींचा चला जा रहा था। पहली किरण निकलते ही, उसने देखा कि एक व्यक्ति वहाँ घुटनों के बल बैठा है, कंधे हिल-हिल कर रो रहा है। वह यिर्मयाह था। उसका रुदन कोई नाटक नहीं था। यह गहरे, टूटे हुए हृदय की वह पीड़ा थी जिसे एलियाकीम ने अपने जीवन में कभी महसूस नहीं किया था। नबी की आँखें लाल थीं, और उसके होंठ फड़क रहे थे, बार-बार एक ही वाक्य दोहरा रहे थे, “मेरी प्रजा के ऊपर क्यों नहीं टूटता? मेरी आँखों से आँसू की धारा क्यों नहीं बहती?”
एलियाकीम वहीं खड़ा रहा, उसकी सारी बुद्धिमत्ता, सारी चतुराई, उस रोते हुए आदमी के सामने धूल की तरह उड़ गई। यहाँ कोई सिद्धांत नहीं था, कोई राजनीति नहीं थी। यहाँ था तो बस एक हृदय, जो परमेश्वर के हृदय की पीड़ा में सहभागी हो रहा था। वह समझ गया। घाव भरने के लिए पहले उसे स्वीकार करना होगा। पश्चाताप की कोई गंध नहीं थी उनके बीच, यिर्मयाह ने ठीक ही कहा था। वे सब गिरनेवालों के संग गिरेंगे।
सूरज पूरी तरह निकल आया था। दूर से, नगर से याजकों के शिंगों की आवाज़ आई, सुबह के बलिदान का आह्वान। एलियाकीम ने एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि वह नगर लौटेगा, वही जीवन जिएगा, शायद उस झूठे भविष्यवक्ता का सन्देश भी सुनेगा जो शांति का वादा करता है। पर अब कुछ बदल गया था। उसकी आत्मा में यिर्मयाह के आँसू समा गए थे, और उन आँसुओं ने एक सच्चाई को जन्म दे दिया था जिसे नकारा नहीं जा सकता था। वह सच्चाई थी एक टूटे हुए परमेश्वर का शोक, और एक ऐसी प्रजा का भयानक भविष्य जो अपने घावों को ठीक करने से इनकार कर देती है। और चारों ओर, खेतों में फसल पककर तैयार थी, परन्तु उसे काटने वाला कोई नहीं था।




