पवित्र बाइबल

बंधन से मुक्ति: यिर्मयाह की पसंद

(यह कहानी यिर्मयाह 40 के आधार पर मूल रचना है।)

उस सुबह की हवा में जलने की गंध समाई हुई थी। यिर्मयाह अपनी जंजीरों की झनकार से जगा, पर आज वह आवाज़ नहीं थी। कुंडी खुलने की खड़खड़ाहट हुई, और प्रकाश ने अंधेरे को चीर दिया। नबूजरदान, बाबुल की सेना का अधिपति, द्वार पर खड़ा था। उसके चेहरे पर थकान थी, पर कोई क्रूरता नहीं।

“उठो,” उसकी आवाज़ सपाट थी। सिपाहियों ने यिर्मयाह को बाहर निकाला। मिज्पा की ऊँचाई से धुएं के गुबार उठते दिख रहे थे। यरूशलेम का धुआं। वह शहर जिसके लिए उसने इतनी चेतावनियाँ दीं, अब चिता की लपटों में सिसक रहा था। यिर्मयाह का गला सूना-सूना रहा। भविष्यद्वाणियाँ सच हुईं, पर इस सत्य में कोई मीठास नहीं थी, बस राख का स्वाद था।

नबूजरदान ने उसकी जंजीरें खोलीं। लोहे के छल्ले गिरे और धूल उड़ी। “तेरे परमेश्वर यहोवा ने इस स्थान पर यह विपत्ति लानी ठानी थी,” उसने कहा, जैसे कोई तथ्य बता रहा हो। “अब देख, मैं आज तुझे छोड़ देता हूँ। यदि तू मेरे साथ बाबुल चलना चाहे, तो आ, मैं तेरी सुधि लूँगा। नहीं तो यहीं रह। पूरा देश तेरे सामने है; जहाँ जाना ठीक समझे, वहाँ जा।”

विकल्प। इतने वर्षों बाद विकल्प। यिर्मयाह ने उन टूटे हुए लोगों की ओर देखा जो दूर, जैतून के पेड़ों के नीचे झुंड बनाए खड़े थे। गिनती के लोग। बचे-खुचे अंगूर की बेल की तरह, जिसे काटने वाला भी छोड़ देता है। उसका हृदय, जो राजाओं के सामने दृढ़ रहा, अब एक अजीब कोमलता से भर गया। ये लोग ही तो बचे थे। यही विरासत थी।

“मैं यहीं रहूँगा,” उसने कहा, आवाज़ में कोई भव्यता नहीं, बस एक निर्णय था। “मिज्पा में। गिदाल्याह के पास।”

गिदाल्याह। अहीकाम का पुत्र। बाबुल ने उसे ही शासक ठहराया था। वह शहर के खंडहरों के बीच एक झोपड़ी में रहता था, न कि राजमहल में। जब यिर्मयाह वहाँ पहुँचा, तो गिदाल्याह सूखी अंजीर बाँट रहा था। उसने नबी को देखा, और दौड़कर उसके पैर छुए। “आप आ गए,” उसकी आँखें नम थीं। “हम सब तितर-बितर हैं। आप ही अब हमारा केंद्र हैं।”

दिन बीतने लगे। मिज्पा एक अजीब शांति से भर गया। लोग दूर-दूर से आने लगे—सैनिक जो पहाड़ियों में छिपे थे, किसान जिनकी फसलें जल गई थीं, औरतें जिनके घर उजड़ गए थे। गिदाल्याह ने सबको बुलाया। “भूमि पर काम करो,” वह कहता। “अंगूर के बाग लगाओ, जैतून के पेड़ बचाओ। बाबुल हमसे कर नहीं, वफादारी चाहता है। हम शांति से रह सकते हैं।”

पर शांति एक नाजुक चीज होती है। एक दिन योहानान बेन करेह आया, उसके कपड़ों पर धूल और चिंता की लकीरें थीं। वह गिदाल्याह के कमरे में घुसा, हाँफता हुआ। “सुनो,” उसने कहा। “अम्मोन का राजा, बादलीश, यिश्माएल को भेज रहा है। तुम्हारी हत्या करने के लिए। यह सच है। हमें कुछ करना चाहिए। हम चुपके से जाकर यिश्माएल को मार दें।”

कमरे में हवा जम गई। गिदाल्याह ने मेज पर रखे अंगूरों को देखा, फिर योहानान की तरफ। “नहीं,” उसने आवाज़ नरम रखी। “तुम झूठ बोल रहे हो। यिश्माएल हमारा साथी है।”

यिर्मयाह को वह पल याद आया जब उसने सिदकिय्याह से कहा था कि बाबुल के सामने झुक जाओ। राजा ने नहीं माना। अब गिदाल्याह की आँखों में वही भोलापन था—शायद विश्वास, शायद अंधापन। योहानान निराश होकर चला गया। उसकी पीठ में एक डर था, जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता था।

सातवें महीने की एक संध्या को यिश्माएल आया। दस आदमी उसके साथ थे। गिदाल्याह ने उनके लिए भोज दिया। दावत में नमकीन पनीर और सत्तू की रोटियाँ थीं। यिर्मयाह दूर बैठा एक पुराने जैतून के पेड़ के नीचे प्रार्थना कर रहा था जब चीखों की आवाज़ आई। वह दौड़ा। कमरे के फर्श पर गिदाल्याह का शरीर पड़ा था। यिश्माएल और उसके लोग भाग चुके थे। हवा में फिर जलने की गंध थी, पर इस बार उम्मीद के धुएं की।

लोग इकट्ठा हुए। योहानान ने नेतृत्व संभाला। उसने यिर्मयाह की ओर देखा। “अब क्या?” उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।

यिर्मयाह ने उत्तर दिया। उसकी आवाज़ में वही पुराना दर्द था, पर कोई हड़बड़ी नहीं। “प्रतीक्षा करो। इसी स्थान पर रुको। भागो मत। परमेश्वर तुम्हें बचाएगा।”

पर लोगों की आँखों में भय का अंधेरा छाया था। वे बाबुल के प्रतिशोध से डरे हुए थे। उन्होंने योहानान की बात मानी—मिस्र की ओर पलायन करने का निर्णय। और यिर्मयाह? वह फिर से उस मोड़ पर खड़ा था, जहाँ लोग चेतावनी सुनते हैं, पर सबक नहीं लेते। उसने अपना थैला उठाया। धूल उड़ी। मिज्पा के खंडहर पीछे रह गए। और आकाश में एक बाज़ चक्कर काट रहा था, शांत, निर्लिप्त, जैसे इतिहास का साक्षी।

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