येरूशलेम की उन गर्मियों में हवा भी जैसे सीसा लिए घूमती थी। एक ऐसी गर्मी, जो केवल त्वचा को ही नहीं, आत्मा को भी झुलसा देती थी। नगर के पूर्वी किनारे पर, किद्रोन घाटी के किनारे बने एक छोटे से खेत में, अविय्याह अपनी पुरानी दाढ़ी पर जमे धूल के कणों को बेमन से साफ कर रहा था। उसकी आँखें उस अंगूर के बगीचे पर टिकी थीं, जो अब बगीचा कहलाने लायक नहीं रहा था। बस, जले हुए, टेढ़े-मेढ़े डंठलों का एक झुरमुट था, जिन पर पिछले दो अकालों ने जैसे रीढ़ तोड़ दी थी।
उसका पोता, नूरिय्याह, एक सूखी लता का टुकड़ा उठाए खड़ा था। “दादा, यह देखो। इसे तोड़ने में भी कोई मजा नहीं आया। यह तो बीच से ही टूट गई।”
अविय्याह ने उस ठूंठ की ओर देखा। वह अंगूर की लकड़ी थी, पर उसमें न तो लचक थी, न ही कोई सार। उसने वह टुकड़ा लिया, अपनी उँगलियों से दबाया। वह भुरभुरा सा लगा, अन्दर से खोखला। “इससे तो दरवाज़े की कुंडी भी नहीं बन सकती, बेटा,” उसने आह भरी। “न यह मजबूत है कि इससे कोई बल्ला बने, न ही इतना सीधा कि कोई खूँटा तैयार हो। जब यह हरी थी, तब भी इसका क्या उपयोग था? सिर्फ़ एक काम – बेल बनकर फल देना। और अब… अब तो बस आग का ईंधन है।”
वह उठा और उन सभी सूखे, बेकार ठूंठों को इकट्ठा करने लगा। नूरिय्याह भी उसकी मदद करने लगा। जब एक ढेर लग गया, तो अविय्याह ने चकमक पत्थर निकाला। पहली चिंगारी ने सूखी पत्ती को छुआ, और फिर लपटें एक क्षण में सारे ढेर को अपनी ज़बानों में लपेट लिया। आग की चटचटाहट में एक अजीब सी सन्नाटी थी। वह लकड़ी जल रही थी, पर उसमें से चीख़ने वाली आवाज़ नहीं, बस एक खाली, खोखली फुफकार थी, जैसे वह स्वयं अपनी निरर्थकता पर शर्मिंदा हो।
अविय्याह आग के सामने बैठ गया। लपटों की लय उसके मन में एक पुरानी, दर्द भरी स्मृति जगा रही थी। वह उन दिनों को याद करने लगा जब यहोवा का वचन यहेजकेल के मुँह से निकला था। वह स्वयं एक जवान लड़का था, बन्धुवाई की आहट सुनकर भी अनसुनी कर देने वाला। पर भविष्यद्वक्ता के शब्द… वे शब्द तो अंगारों की तरह थे। *”मनुष्य के सन्तान, बेल की लकड़ी, दाखलतों की लकड़ी से और किसी वृक्ष की लकड़ी से क्या बढ़कर है? क्या उस में से कोई काम की वस्तु लटकाई जाती है?”*
आग तेज हो गई। अंगूर की लकड़ी के टुकड़े, जो कभी हरे-भरे पत्तों और मीठे फलों से लदे थे, अब काले कोयले में बदल रहे थे। अविय्याह की आँखों के आगे येरूशलेम का दृश्य तैरने लगा – उसके महल, मन्दिर की ऊँची दीवारें, बाज़ारों की चहल-पहल। वह सब कुछ जो दृढ़ और स्थायी लगता था। पर क्या वह सचमुच दृढ़ था? यहोवा ने पूछा था – यदि बेल बेकार है तो उसे आग में डाल दिया जाता है। और यदि वह आग में झुलसकर और भी बेकार हो जाए, तो फिर?
“दादा, तुम रो क्यों रहे हो?” नूरिय्याह ने पूछा, उसकी आवाज़ में चिंता थी।
अविय्याह ने अपनी आँखें पोंछीं, पर आँसू आग की गर्मी से सूख चुके थे। “मैं उस शहर के लिए रो रहा हूँ, बेटा। हमारे लिए रो रहा हूँ। हम अंगूर की लकड़ी जैसे हैं। हमारा एकमात्र उद्देश्य था उसकी महिमा के लिए फल लाना। जब हमने वह किया, तो हम में कुछ सार था। पर जब हमने अपने आपको, अपनी चालाकी, अपनी मूर्तियों, अपने अन्याय से भर लिया… तो हम इस सूखी लता से भी गए-बीते हो गए। अब हमारी क्या औकात है? हम न तो सहारा दे सकते हैं, न सँभाल सकते हैं। हमारी नियति इसी आग में लिखी है।”
शाम ढलने लगी थी। आग की लपटें धीमी पड़ रही थीं, और अब केवल राख और कुछ जलते हुए अंगारे ही बचे थे। एक गहरा, कड़वा धुआँ हवा में मँडरा रहा था। अविय्याह ने अपने पोते के कंधे पर हाथ रखा। “यहोवा की आग सफाई के लिए होती है, बेटा। यह नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उस बेकार को जलाने के लिए होती है, जो फल नहीं दे सकता। शायद इस राख से… कुछ नया उगे। पर उसके लिए, पहले इस आग से गुजरना ही होगा।”
वे दोनों मौन होकर उस ठंडी पड़ती राख को देखते रहे। दूर, येरूशलेम की अँधेरी होती सिल्हूट में, अविय्याह को लगा जैसे वह शहर स्वयं एक विशाल, सूखा ठूंठ है, जो समय की हवाओं में चरमरा रहा है। और उसकी आत्मा के भीतर, भविष्यद्वक्ता का वह प्रश्न एक दुख भरे मन्त्र की तरह गूँज रहा था – “फिर उसकी क्या दशा होगी, जब आग उसे भस्म कर चुकी होगी?” उत्तर वह जानता था, पर उसे ज़ुबाँ पर लाने का साहस नहीं था। वह सिर्फ़ देखता रहा, जब तक कि अँधेरे ने आग की आखिरी चमक को भी निगल नहीं लिया।




