पवित्र बाइबल

पवित्र नदी का जीवनदायी प्रवाह

यह सब एक खामोशी में शुरू हुआ। मंदिर के पिछवाड़े की ओर जाने वाले एक छोटे से दरवाजे से यहेजकेल को बाहर लाया गया था। हवा स्थिर थी, और सूरज पत्थर के फर्श पर सफेद और कठोर पड़ रहा था। फिर, उसने देखा—पूर्व की ओर मुख वाले उस द्वार की दहलीज से, पानी टपक रहा था। बस एक धारा, पैर की एड़ी तक भी नहीं पहुँचती। यह ऐसा था मानो मंदिर का पत्थर रो रहा हो, एक सतत, शांत अश्रुधारा।

लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, कुछ बदलने लगा। वह धारा, जो शुरू में इतनी नाजुक लग रही थी, अब टखनों तक पहुँच गई थी। पानी ठंडा था, हैरान करने वाला ठंडा, जैसे पहाड़ों की गहराई से सीधा निकलकर आ रहा हो। यहेजकेल के मार्गदर्शक ने, जिसका चेहरा एक गहरी शांति से भरा था, उसे आगे चलने का संकेत दिया। वे लगभग एक हजार हाथ चले होंगे, जब पानी अचानक घुटनों तक बढ़ गया। अब यह एक सच्ची नदी जैसा लगने लगा था, एक सुनसान भूमि के बीच में बहती हुई, जिसकी धारा में एक अजीब सी मधुर आवाज थी।

फिर, एक और हजार हाथ। अब पानी कमर तक था। इसकी शक्ति स्पष्ट थी। यह अब टपकने वाला झरना नहीं रहा था; यह एक प्रवाह था जो मिट्टी को चीरता हुआ, अपने रास्ते में आने वाली हर सूखी दरार को भरता हुआ आगे बढ़ रहा था। चारों ओर की जमीन, जो पहले धूल भरी और बंजर लगती थी, अब नम होने लगी थी। मिट्टी से एक गहरी, मीठी गंध आ रही थी—वह गंध जो बारिश के पहले दिन होती है।

लेकिन आखिरी हजार हाथ ने सब कुछ बदल दिया। जब वे आगे बढ़े, तो पानी अचानक इतना गहरा हो गया कि उसमें चलना असंभव था। यह एक नदी थी, गहरी और तेज, जिसे तैरकर ही पार किया जा सकता था। यहेजकेल ने अपने आसपास देखा। वह जिस जगह खड़ा था, वहां से यह नदी चौड़ी होती जा रही थी, एक शक्तिशाली जलधारा में बदलती हुई, जो उस सूखे मैदान की ओर बह रही थी जो कभी नमक का सागर हुआ करता था।

और फिर, उसने जो देखा, वह उसके दिमाग में हमेशा के लिए अंकित हो गया। नदी के दोनों किनारों पर, हर तरफ, असंख्य पेड़ उग आए थे। सिर्फ पेड़ ही नहीं, बल्कि जीवन के हर रंग के पेड़—ऊंचे खजूर के पेड़ जिनकी पत्तियां हवा में सरसरा रही थीं, अंजीर के पेड़ जिन पर हल्के हरे फल लदे थे, और ऐसे पेड़ भी जिन्हें वह पहचान भी नहीं पा रहा था, जिनकी शाखाएं ताजे फलों से झुकी हुई थीं। उनकी पत्तियाँ मुरझाती नहीं थीं, और फल कभी खत्म नहीं होते थे। हर महीने नए फल लगते, क्योंकि यह पानी सीधे पवित्र स्थान से आता था। उनकी जड़ें उस जीवनदायी जल में डूबी हुई थीं, और उनकी छाया में एक शांति थी, एक ऐसी शांति जो शहर की हलचल में कभी नहीं मिलती।

नदी आगे बहती गई, उस निर्जन क्षेत्र में, जहाँ पानी खारा और मृतप्राय था। और जहाँ कहीं भी यह जलधारा पहुँचती, वहाँ एक चमत्कार होता। खारा पानी मीठे में बदल जाता। मछलियाँ, इतनी सारी और इतनी प्रजातियों की कि उन्हें गिना नहीं जा सकता था, उन जल में तैरने लगतीं। मछुआरे उसके किनारों पर खड़े होते, अपने जाल फेंकते, एन-गेदी से लेकर एन-एगलैम तक के विस्तार में। उनकी पकड़ इतनी भारी होती कि जाल फटने लगते। हर जगह जीवन फैल रहा था—झींगे, छोटी मछलियाँ, बड़ी मछलियाँ—सब एक ऐसे स्रोत से पोषित हो रहे थे जो कभी खत्म नहीं होता।

लेकिन दलदली और तालाब वाली जगहें… वहाँ पानी मीठा नहीं होता था। वे नमकीन बने रहते, शायद एक याद दिलाते हुए कि पुरानी बातें पूरी तरह मिटाई नहीं जातीं, कि अभी भी ऐसे स्थान हैं जहाँ अनुग्रह नहीं पहुँचा है। यह एक विचित्र विरोधाभास था—एक ओर जीवन का विस्फोट, दूसरी ओर कुछ कोनों में अभी भी बंजरपन।

यहेजकेल वहीं खड़ा रहा, उस नदी के किनारे, उसकी आवाज उसे घेरे हुए। यह केवल पानी नहीं था। यह शुद्धिकरण था। यह चंगाई थी। जो कुछ भी यह छूता, उसे जीवन दे देता। और उसने सोचा—क्या यही परमेश्वर की प्रतिज्ञा है? क्या यही वह तरीका है जिससे वह अपनी भूमि को, अपने लोगों को फिर से जीवित करेगा? एक छोटा सा स्रोत, मंदिर के द्वार से निकलता हुआ, जो बढ़ता जाता है, जब तक कि वह सब कुछ नहीं बहा ले जाता, हर सूखे स्थान को हरा-भरा नहीं कर देता, हर मरे हुए समुद्र में मछलियाँ नहीं भर देता।

वह दिन ढलने लगा था। पानी पर सूरज की किरणें सोने जैसी लग रही थीं। पेड़ों की पत्तियाँ हल्की हवा में हिल रही थीं। दूर से मछुआरों के हल्के बोलने की आवाज आ रही थी। यह एक सपना नहीं था। यह एक दर्शन था, लेकिन उससे भी अधिक, यह एक प्रतिज्ञा थी—कि जीवन का प्रवाह, एक बार शुरू होने के बाद, रुकता नहीं है। वह बढ़ता ही जाता है, तब तक, जब तक सब कुछ नया नहीं हो जाता।

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