वह दोपहर ठंडी थी, हालाँकि धूप खिली हुई थी। गाँव की वह पुरानी चाय की दुकान, जिसके बाहर नीम का पेड़ अपनी शाखाएँ फैलाए खड़ा था, आज भी उसी तरह सुस्ताहट से भरी हुई लग रही थी। रामस्वरूप, जो गाँव के सबसे बुज़ुर्ग और शांत व्यक्ति माने जाते थे, अपनी खटिया पर पड़े हुए थे। उनकी उम्र के निशान चेहरे पर गहरी लकीरों की तरह थे, पर आँखों में एक अजीब सी तरोताज़गी बनी रहती थी।
दुकान के एक कोने में, एक पुराना, मोटा बाइबिल रखा हुआ था। उसके पन्नों के किनारे पीले पड़ चुके थे, और कहीं-कहीं स्याही के धब्बे थे। गाँव के युवक गफूर, जिसे किताबों से एक अटूट प्रेम था, अक्सर उसे उलट-पलट कर देखा करता। आज उसने वह पवित्र ग्रन्थ उठाया और बेतरतीब से पन्ने पलटने लगा। उसकी उँगलियाँ इब्रानियों के नाम वाले पत्र के पन्नों पर ठहर गईं—चौथा अध्याय।
“सुनो, रामस्वरूप काका,” गफूर ने आवाज़ दी, “यहाँ तो बार-बार ‘विश्राम’ की बात की गई है। पर ऐसा लगता है जैसे यह कोई साधारण आराम नहीं है।”
रामस्वरूप ने आँखें खोलीं। उनकी आवाज़ में गहराई थी, जैसे दूर बहती नदी की ध्वनि। “विश्राम… हाँ। तू समझता है, गफूर, जब हम थक कर चूर हो जाते हैं, तो किसी छाँव में बैठ जाना, पानी पी लेना—वह तो शरीर का विश्राम है। पर इस किताब में जिस विश्राम की चर्चा है, वह आत्मा का है। वह एक ऐसी शांति है जो हमारे भीतर बस जाती है, चाहे बाहर तूफान ही क्यों न चल रहा हो।”
गफूर ने आगे पढ़ा। पत्र लिखने वाला प्राचीन इतिहास में झाँक रहा था—मिस्र से छुड़ाए गए लोग, जो यरीहो की ओर बढ़ रहे थे, पर अपने अविश्वास के कारण जंगल में भटक गए। परमेश्वर ने उन्हें एक वादा दिया था—विश्राम का देश। पर वे उसमें प्रवेश न कर सके। क्यों? क्योंकि उनके कानों ने आवाज़ सुनी, पर दिलों ने उस पर विश्वास नहीं किया।
“देख,” रामस्वरूप ने धीरे से कहा, उनकी नज़र दूर क्षितिज पर टिकी हुई थी, जहाँ खेतों का स्याह सीमांत आकाश से मिल रहा था, “परमेश्वर का विश्राम सातवें दिन से शुरू हुआ, जब उसने सृष्टि का काम पूरा किया। वह विश्राम अभी भी जारी है… एक खुला द्वार है। पर प्रवेश तो हमें करना है। वे लोग जंगल में मर गए क्योंकि उन्होंने उसकी बात को अपने हृदय में उतरने नहीं दिया। उनके कदम आगे बढ़े, पर विश्वास पीछे रह गया।”
गफूर को एक बात समझ में आई। यह विश्राम कोई भविष्य की चीज़ नहीं थी, न ही सिर्फ़ बीते ज़माने की कहानी। पत्र लिखने वाले ने दाऊद का ज़िक्र किया, सैकड़ों साल बाद, जब उसने भी इसी विश्राम के बारे में बात की। तो वह संभावना अभी भी मौजूद थी—”आज!” जैसे कि पल भर का विलम्ब भी घातक हो।
“तो फिर यह विश्राम पाने का रास्ता?” गफूर का सवाल हवा में लटक गया।
रामस्वरूप ने एक लंबी सांस ली। “विश्वास। सच्चा, जीवित विश्वास। देख, जिस तरह एक बढ़ई लकड़ी पर काम करते हुए हर कोण, हर माप पर ध्यान देता है, उसी तरह परमेश्वर का वचन हमारे भीतर के हर विचार, हर इरादे को जांचता है। कुछ भी छिपा नहीं है। और जब हम इस सत्य को स्वीकार करते हैं, अपनी कमजोरी, अपनी थकान, अपना बोझ उसके सामने रख देते हैं… तब वह विश्राम शुरू होता है। यीशु मसीह, जो स्वर्ग से होकर गया है, वह हमारा महायाजक बनकर हमारी पुकार सुनता है। वह हमारी कमजोरियों में सहानुभूति रखता है। उसके पास हमारे लिए दया और अनुग्रह है, ठीक वक़्त पर सहायता के लिए।”
दुकान के सामने से एक बैलगाड़ी धीरे-धीरे गुज़री, उसके पहियों की चरचराहट और बैलों के गले में बंधी घंटियों की खनखनाहट सुनाई दे रही थी। गफूर ने बाइबिल को बंद किया, पर वह शब्द—”विश्राम”—उसके मन में गूँज रहा था। उसे अपना जीवन याद आया, हमेशा की दौड़, पाने की चाह, डर, अनिश्चितता… एक अधूरे घर की तरह, जहाँ खिड़कियाँ हैं पर शीशे नहीं, दरवाज़े हैं पर चौखट नहीं।
रामस्वरूप ने उसके चेहरे के भाव पढ़ लिए। “इसे किसी दार्शनिक सिद्धांत की तरह मत लो, गफूर,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। “यह तो उस खेत जैसा है, जो बारिश के पानी को सोख लेता है और फसल उगाता है। विश्वास वह मिट्टी है। और परमेश्वर का वचन वह बारिश। दोनों मिलें, तभी हरियाली आएगी। और वही हरियाली… वही तृप्ति… वही विश्राम है।”
शाम ढलने लगी। नीम के पेड़ पर चिड़ियों का कलरव बढ़ गया। गफूर ने बाइबिल को वापस उसी जगह रख दिया, पर उसके मन में कुछ टूटा था, और कुछ जुड़ा था। वह विश्राम कोई दूर का सपना नहीं था। वह “आज” का वादा था। एक ऐसा सच, जो उसकी अपनी सांसों के साथ धड़क सकता था, बशर्ते वह अपने हृदय के द्वार उसके लिए खोल दे।
उसने चाय का आखिरी घूँट पिया, जो अब ठंडी हो चुकी थी, पर उसे उसकी सादगी में एक अद्भुत मिठास लगी। रामस्वरूप फिर से अपनी खटिया पर आँखें मूंदकर लेट गए थे, उनके चेहरे पर एक अवर्णनीय शांति थी। शायद, गफूर ने सोचा, यही वह विश्राम है—न कुछ पाने की जल्दी, न खोने का डर। बस उसकी उपस्थिति में होने का निश्चय। “आज,” उसने अपने मन में दोहराया, “अगर तुम उसकी आवाज़ सुनो, तो अपने हृदय को कठोर न करो।”
और उस पल, चाय की दुकान की साधारण सी दुनिया में, एक असाधारण शांति ने अपने पंख फैला दिए।




