अग्निहोत्र की वेदी के अभिषेक के दिन, जब उस पर पहली बार घी और लहू की सुगंध उठी थी, तब मूसा ने महाकुटुम्ब के सरदारों को बुलाया। वे बारहों गोत्रों के प्रमुख, चेहरों पर एक गहरी, श्रद्धापूर्ण चिंता लिए हुए खड़े थे। तम्बू के द्वार पर, जो अब ईश्वर की स्थिर उपस्थिति से पवित्र था, एक विचित्र प्रश्न हवा में तैर रहा था: अब आगे क्या?
यहूदा के गोत्र का सरदार, नहशोन, अम्मीनादाब का पुत्र, पहले दिन सवेरे ही आया। उसके पीछे लेवीय नहीं, बल्कि यहूदा के परिवार के चुने हुए लोग थे, जो एक भारी, ढके हुए बैलगाड़ी को धीरे से खींच रहे थे। पहियों की चरचराहट मरुस्थल की मौन सुबह में एक प्रार्थना सी लग रही थी। मूसा और हारून ने द्वार पर उनका स्वागत किया। कोई भाषण नहीं हुआ, कोई औपचारिक घोषणा नहीं। नहशोन ने बस मूसा की आँखों में देखा, और फिर अपने लोगों को इशारा किया।
गाड़ी का कपड़ा हटाया गया। उस पर रखी वस्तुएँ धूप में चमक उठीं: चाँदी की एक थाली, जिसका वजन एक सौ तीस शेकेल था, और चाँदी का एक कटोरा, सत्तर शेकेल का। दोनों ही भरपूर घी में सनी हुई सबसे उत्तम किस्म का महीन आटा लिए हुए थे। एक सोने का कटोरा था, हल्का सा, दस शेकेल का, जो सुगंधित धूप से भरा हुआ था। फिर बलि के पशु आए: एक जवान साँड़, एक मेढ़ा, एक साल का एक मेम्ना। और अंत में, पापबलि के लिए एक बकरा, और मेल-मिलाप की भेंट के लिए दो साँड़, पाँच मेढ़े, पाँच बकरे, और पाँच साल के मेमने।
हर वस्तु, हर पशु, सावधानी से चुना गया था। चाँदी पर धूप की रेखाएँ थीं, सोने के कटोरे में धूप का गहरा सुनहरा रंग झलक रहा था। साँड़ की आँखों में एक शांत प्रतिबद्धता थी, मानो वह भी अपनी भूमिका समझता हो। नहशोन ने कुछ नहीं कहा। उसने बस एक-एक वस्तु, एक-एक पशु, याजकों के हवाले कर दिया। उसकी भेंट पूरी हुई। वह थोड़ी देर खड़ा रहा, तम्बू के सुनसान द्वार की ओर देखता रहा, फिर धीरे से मुड़ा और अपने डेरे की ओर चला गया। उसकी पीठ में एक तरह की हल्की-सी झुकन थी, जैसे बोझ उतर गया हो।
दूसरे दिन, इस्साकार के गोत्र का सरदार, नतनेल, सूअर का पुत्र, आया। प्रक्रिया वही थी। वही चाँदी की थाली और कटोरा, वही सोने का कटोरा, वही पशु। पर उसकी आँखों में एक अलग ही कहानी थी। जहाँ नहशोन का चेहरा गंभीर था, वहीं नतनेल के चेहरे पर एक आश्चर्यजनक प्रसन्नता थी। ऐसा लगता था मानो वह किसी बड़े सम्मान में हिस्सा पा रहा हो, और उसकी खुशी छिपी नहीं थी। उसने अपनी भेंट रखी, और जाते समय मूसा से बस इतना कहा, “यह बहुत कुछ है।” मूसा ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
और इस तरह यह सिलसिला चल पड़ा। बारह दिन। बारह सरदार। बारह एक-सी भेंटें, पर बारह भिन्न मन। ज़बूलून के एलियाब के हाथ काँप रहे थे जब उसने सोने का कटोरा सौंपा। रूबेन के एलीसूर के चेहरे पर एक गहन एकाग्रता थी, जैसे हर विवरण परख रहा हो। शिमोन के शलुमीएल ने इतनी लंबी साँस भरी जब सब कुछ पूरा हुआ, जैसे वर्षों का इंतज़ार खत्म हुआ हो।
दिन बीतते गए। तम्बू के सामने भेंटों का ढेर लगता गया। चाँदी के बरतनों की चमक आँखें चौंधिया देती थी। पशुओं की मदहोश कर देने वाली गंध हवा में रच-बस गई थी। लेवीय याजक नित्यकर्म में लगे रहते, पर उनकी आँखों में भी अचरज था। इतनी एकरूपता, इतनी नियमितता, पर हर दिन एक नया व्यक्तित्व।
आखिरी दिन, नप्ताली के गोत्र का सरदार, अहीरा, एनान का पुत्र, आया। उसके बाद कोई और नहीं बचा था। उसकी भेंट भी वैसी ही थी। पर जब उसने अपना सोने का कटोरा धूप से भरा हुआ सौंपा, तो एक अजीब सी शांति छा गई। सब कुछ पूरा हो गया था। बारहों गोत्रों ने, बिना किसी तुलना या प्रतिस्पर्धा के, एक सामूहिक स्वर में अपनी श्रद्धा प्रकट कर दी थी।
मूसा उन दिनों तम्बू में जाता रहा, परमेश्वर से बात करने। एक दिन, जब सारी भेंटें चढ़ चुकी थीं, और उसने साक्षी के तम्बू में प्रवेश किया, तो वह आवाज़ फिर सुनाई दी। वह आवाज़ जो जलती झाड़ी से आई थी, जो सीनै पर गर्जना थी। पर आज वह आवाज़ एक फुसफुसाहट की तरह थी, मृदु और स्पष्ट।
“मूसा,” आवाज़ ने कहा, “जब कोई याजक अभिषेक के बाद मिलापवाले तम्बू में सेवा करने के लिए प्रवेश करे, तो उसे इन बारह सरदारों की भेंट स्मरण रखनी चाहिए। यह थाली और कटोरे मेरी वेदी के सामने रखे जाएँ। यह चाँदी और सोना केवल धातु नहीं है। यह यहूदा का गंभीर संकल्प है, इस्साकार की प्रसन्नता है, ज़बूलून का भय है, रूबेन की एकाग्रता है। यह बारहों गोत्रों की एकस्वर प्रार्थना है। मेरे सामने खड़े होने का, मेरे साथ चलने का यही तो उनका ढंग है। एक साथ, अलग-अलग, पर एक हृदय होकर।”
मूसा तम्बू से बाहर आया। सूरज ढल रहा था, और चाँदी के बरतनों पर लालिमा पड़ रही थी। उसने देखा, दूर, अपने-अपने डेरों में, वे बारहों सरदार शायद अपने-अपने ढंग से प्रार्थना कर रहे थे। और उसे लगा, मरुस्थल की यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक की यात्रा नहीं थी। यह हृदयों को एक साथ पिघलाकर, भिन्नताओं में भी एकता गढ़ने की यात्रा थी। और आज, चाँदी के उन बरतनों के माध्यम से, वह प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। एक थाली, एक कटोरा, एक साँड़, एक मेम्ना… हर भेंट एक वचन था, एक प्रतिज्ञा: “देखो, हम तैयार हैं।” और आकाशवाणी ने उत्तर दिया था: “मैं जानता हूँ।”




