शमूएल बूढ़े हो रहे थे। उनकी आँखों की रोशनी धुंधली पड़ती जा रही थी, पर दिल की नज़र अब भी तेज़ थी। वह रामा में अपने घर में बैठे यह सोच रहे थे कि शाऊल के पतन की ख़बर सुनकर उनकी आत्मा क्यों इतनी बेचैन रहती है। एक साम्राज्य की नींव हिल गई थी, और वह जानते थे कि यहोवा ने शाऊल को छोड़ दिया है। यह जानना एक बोझ था, एक ऐसा रहस्य जिसे वह चिल्लाकर नहीं कह सकते थे।
एक दिन, जब हवा में बसन्त की हल्की सी ठंडक बची थी और ज़मीन पर नमी थी, वह आवाज़ फिर आई। शमूएल का शरीर ऐंठ गया, नहीं डर से, बल्कि एक गहरी पीड़ा से। “तू कब तक शाऊल के विलाप में रोता रहेगा?” उसने सुना। आदेश स्पष्ट था। एक बैल और एक दूसरे को लेकर बेतलेहम जाना था। यिशै के पास। क्यों? इसका उत्तर भी मिला – “क्योंकि मैंने उसके पुत्रों में से एक को अपने लिये राजा ठहराया है।”
सफ़र लम्बा और धूलभरा था। गधे की पीठ पर झूले हुए, शमूएल के मन में तरह-तरह के सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे। शाऊल अभी भी राजा था। उसकी सेना थी, उसका सिंहासन था। यह नया चुना हुआ, यह ‘राजा’… कौन होगा? और शाऊल को पता चला तो? बेतलेहम के बुज़ुर्ग घबराए हुए मिले। शमूएल का आना किसी अनिष्ट का संकेत था। “क्या तेरा आना कुशल का है?” उनकी आवाज़ में कंपकंपी थी। शमूएल ने सांस ली। “कुशल ही का है,” उन्होंने कहा, “मैं यहोवा की भेंट चढ़ाने आया हूँ। तुम अपने को पवित्र करो और मेरे साथ बलिदान में चलो।” उनकी आवाज़ में एक शांति थी जिसने शहर के डर को थोड़ा कम किया।
यिशै और उसके पुत्रों को बुलाया गया। शमूएल ने यिशै के घर के आँगन में, एक पुराने जैतून के पेड़ के नीचे अपना स्थान बनाया। जब यिशै का परिवार आया, तो शमूएल की धुंधली आँखों ने भी एलियाब की ऊँचाई और सुन्दरता देखी। लड़का सुनहरे रंग का, कंधे चौड़े, एक सैनिक की मुद्रा में खड़ा था। शमूएल का दिल एक पल को धड़का। ‘निश्चय ही यहोवा का अभिषिक्त यही है,’ उन्होंने मन ही मन सोचा। लेकिन तभी, जैसे कोई बड़ी आवाज़ उनकी आत्मा के भीतरी कानों में गूँजी: “उसके रूप या ऊंचाई को न देख; क्योंकि मैंने उसे अयोग्य ठहराया है। यहोवा मनुष्य की नहीं, बल्कि हृदय की देखता है।”
शमूएल ने एलियाब से नज़र फेर ली। फिर अबीनादाब को बुलाया। फिर शम्मा। एक के बाद एक, यिशै के सात पुत्र उनके सामने से गुज़रे। हर एक के सामने वह रुके, चुप रहे, और भीतर प्रतीक्षा की। और हर बार वही चुप्पी। कोई संकेत नहीं। कोई आवाज़ नहीं। आकाश खामोश रहा। शमूएल हैरान थे। क्या उन्होंने भ्रम सुना था? क्या उनकी समझ में कुछ गड़बड़ हो गई थी? उन्होंने यिशै की ओर मुड़कर पूछा, और उनकी आवाज़ में एक थकी हुई उलझन थी, “क्या तेरे सब लड़के यहीं हैं?”
यिशै ने कंधे उचकाए, जैसे कोई छोटी सी बात भूल गया हो। “अभी तो सबसे छोटा बचा है,” उसने कहा, “वह भेड़-बकरियाँ चराता है।” उसके स्वर में उस छोटे लड़के के प्रति एक सहज, स्नेहिल बेपरवाही थी, जो राजा बनने के सपनों से कोसों दूर था। शमूएल ने आदेश दिया: “उसे बुलवा लाओ। हम तब तक नहीं बैठेंगे जब तक वह यहाँ नहीं आ जाता।”
दाऊद भेड़ों को एक सुरक्षित गुफा के पास छोड़कर दौड़ता हुआ आया। दूर पहाड़ियों पर दिन भर धूप खाने के कारण उसका चेहरा कुछ काला पड़ा था, पर आँखें बड़ी-बड़ी और चमकदार थीं। उसके बाल उलझे हुए थे, कपड़ों पर घास और धूल के चिन्ह थे। उसकी सांस फूली हुई थी। वह अपने भाइयों की गम्भीर, ऊँची मुद्रा और उस बूढ़े भविष्यद्वक्ता की उपस्थिति से थोड़ा सहमा हुआ था, जिसकी आँखें उसकी ओर इस तरह गड़ी हुई थीं जैसे कुछ ढूंढ रही हों।
और तभी वह हुआ।
जैसे ही दाऊद आँगन में खड़ा हुआ, शमूएल को लगा जैसे उनकी छाती के भीतर किसी ने एक मशाल जला दी हो। वह आवाज़ फिर गूँजी, स्पष्ट और निर्विवाद: “इसे अभिषेक कर। यही है।” यह कोई दर्शन नहीं था, कोई चमत्कारिक दृश्य नहीं था। बस एक गहरी, अटल निश्चितता, जो हड्डियों तक को भेद गई।
शमूएल ने उठकर तेल का घड़ा उठाया। घर के सब लोग, यिशै, उसके सातों बेटे, सब देखते रहे। हवा रुक सी गई थी। शमूएल ने घड़े से तेल निकाला और दाऊद के सिर पर उड़ेल दिया। गाढ़ा, सुनहरा तेल उसके घुंघराले बालों से होता हुआ माथे पर बहा, गालों पर चमकीली धारियाँ बनाता हुआ गर्दन तक आया। कोई बिजली नहीं कड़की। कोई आकाशवाणी नहीं हुई। बस तेल की चिकनाहट, और उसकी मीठी-तिक्त गंध हवा में फैल गई।
पर शमूएल जानते थे। और दाऊद भी, उस पल, कुछ जान गया। उसकी आँखों में एक नया प्रकाश आ गया, जैसे भीतर की कोई बाती जल उठी हो। यह राज्य का ताज नहीं था जो उसे मिला था, बल्कि एक वाचा थी, एक भविष्य का वादा। यहोवा का आत्मा उसी क्षण से दाऊद पर प्रबल रूप से ठहर गया। और शमूएल ने देखा कि उसी क्षण से, शाऊल से वह आत्मा हट गई, और एक बुरी आत्मा यहोवा की ओर से उसे डराने लगी।
दाऊद भेड़ों के पास लौट गया। उसकी लाठी पर अब भी पुराने निशान थे, जो उसने भेड़िया और सिंह से उनकी रक्षा करते हुए बनाए थे। पर उसके हाथ की हथेली पर अब तेल की एक चमक बस गई थी, जो धूप में झिलमिलाती थी। पहाड़ियों की हवा में अब एक नया गीत था, एक ऐसा संगीत जो उसके हृदय के तारों से निकलता था, भविष्य के राजा का वह गुप्त राग, जिसे अभी सिर्फ़ भेड़ें और आकाश सुन रहे थे। और दूर, गिवा में, राजा शाऊल अपने महल के एक अंधेरे कमरे में बैठा था, और उसकी आत्मा में एक ऐसा खालीपन और कोलाहल भर गया था, जिसे कोई बीन का स्वर भी शांत नहीं कर पाता था। दो नियति अब अपने-अपने रास्ते चल पड़ी थीं। एक का सूरज अस्त हो रहा था, दूसरे का अभी-अभी उदय हुआ था, बिना किसी शोर के, एक चरवाहे के आँगन की धूल में।




