शुरुआत उस समय की है जब यहूदा के राजा अबीजा ने शासन संभाला। वह रहबोआम का पुत्र और सुलैमान का पोता था। राज्य अभी बंटा हुआ था—यहूदा और बिन्यामीन के गोत्र उसके साथ थे, जबकि दस गोत्र यरोबाम के नेतृत्व में इस्राएल के राज्य में चले गए थे। यरोबाम ने बेतेल और दान में सोने के बछड़े स्थापित कर दिए थे, और याजकों को भी लेवीय गोत्र से हटाकर आम लोगों में से नियुक्त कर दिया था। यह सब अबीजा के हृदय में एक कसक की तरह था।
यह उन दिनों की बात है, जब अबीजा के राज्य के अठारहवें वर्ष में, उसने अपनी सेना इकट्ठी की। चार लाख चुने हुए योद्धा—यह संख्या हवा में गूंजती रही, एक आश्वासन भी और एक भारी जिम्मेदारी भी। वे यरूशलेम से निकले, और उनके कदमों की धूल ने हवा में एक लंबा सफर बुनना शुरू किया। मार्च करते हुए, पहाड़ियों के पार, वे एप्रैम के पहाड़ी इलाके में पहुँचे, जहाँ ज़ेमरैम नामक पहाड़ी थी। दूसरी ओर, यरोबाम भी तैयार था। उसने आठ लाख योद्धाओं की एक विशाल सेना खड़ी कर ली थी—संख्या में दुगुनी, अनुभव में पका हुआ। वह पहाड़ी की दूसरी तरफ डेरा डाले हुए था।
दोनों सेनाएँ अब आमने-सामने थीं। हवा में तनाव था, जैसे बरसात से पहले का सन्नाटा। तभी अबीजा ने फैसला किया। वह सेना के सामने एक ऊँची चट्टान पर चढ़ा। उसकी आवाज़ हवा में फैलनी थी, दो लाख दुश्मन सैनिकों तक पहुँचनी थी। उसने अपना हाथ उठाया, और चारों ओर सन्नाटा छा गया।
“सुनो, यरोबाम और सारे इस्राएल!” उसकी आवाज़ दृढ़ थी, पर उसमें एक अजीब-सा दर्द भी समाया हुआ था। “क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा ने दाऊद और उसके वंश को इस्राएल पर राज करने की एक नमक की वाचा दी है? एक ऐसा अनुबंध जो टूट नहीं सकता। फिर भी यरोबाम, दाऊद के सेवक नबात के पुत्र ने, अपने स्वामी के विरुद्ध विद्रोह किया।”
उसने रुककर सामने की विशाल सेना पर नज़र दौड़ाई। “और अब तुम, हल्के-फुल्के लोग, जो दुष्ट यरोबाम के साथ खड़े हो। क्या तुम सच में सोचते हो कि यहोवा की उपस्थिति से, उन सोने के बछड़ों के सामने, जिन्हें तुमने अपने लिए बनवाया है, तुम्हारा पक्ष रहेगा? तुमने यहोवा के याजकों, हारून के पुत्रों और लेवियों को दरकिनार कर दिया, और अपने लिए ऐसे याजक बना लिए जो किसी भी साधारण व्यक्ति की तरह हैं—जो एक बछड़ा और सात मेढ़े चढ़ा दे, वही याजक बन जाता है!”
अबीजा की आवाज़ में तीखापन आ गया, पर उसमें एक प्रकार की दया भी झलक रही थी। “पर हमारी कहानी भिन्न है। हम यहोवा का अनुसरण करते हैं। हमारे याजक लेवी के पुत्र हैं, जो यहोवा की आज्ञा के अनुसार सेवा करते हैं। हम प्रतिदिन सुबह और सांझ होमबलि चढ़ाते हैं, सुगंधित धूप जलाते हैं, और भेंट की रोटी को शुद्ध मेज पर रखते हैं। हम सुनहरी मेनोरा को जलाए रखते हैं, क्योंकि हम अपने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं। लेकिन तुमने उसे त्याग दिया है। इसलिए सुन लो, हे इस्राएल: यहोवा हमारे साथ है, वही हमारा सेनापति है। उसके याजक तुम्हारे विरुद्ध युद्ध की तुरहियाँ बजाएँगे। हे इस्राएल के पुत्रो, यहोवा से लड़ाई मत करो, क्योंकि तुम सफल नहीं होगे।”
पर यरोबाम की सेना ने उसकी एक न सुनी। उन्होंने एक योजना बनाई—एक हिस्सा सामने से आक्रमण करेगा, जबकि दूसरा हिस्सा पीछे से घेर लेगा। उन्होंने चुपके से अपनी सेना को आगे बढ़ाया। जब यहूदा की सेना ने देखा कि वे आगे और पीछे से घिर गए हैं, तो उनमें हलचल मच गई। डर की एक लहर सी दौड़ गई। उस पल, अबीजा और उसके लोगों ने यहोवा की दोहाई दी। याजकों ने तुरहियाँ बजाईं, और सामूहिक चीत्कार आकाश की ओर उठी—एक ऐसी प्रार्थना जो हृदय के गहरे कोनों से निकली थी।
तब कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। यहोवा ने हस्तक्षेप किया। अबीजा और यहूदा के लोगों ने देखा कि यरोबाम और सारे इस्राएल उनके सामने घबराकर भागने लगे। परमेश्वर ने उन्हें यहूदा के हाथों में कर दिया था। एक भयंकर संहार हुआ। इस्राएल की सेना में बड़ी हानि हुई—पाँच लाख चुने हुए योद्धा मारे गए। यह संख्या इतनी भयावह थी कि उस दिन के बाद इस्राएल की शक्ति कुचल दी गई। यहूदा की सेना ने जीत हासिल की, क्योंकि उन्होंने अपने पूर्वजों के परमेश्वर, यहोवा पर भरोसा किया था।
अबीजा ने यरोबाम का पीछा किया और उससे कई नगर छीन लिए—बेतेल और उसके आसपास के गाँव, यशाना और उसके आसपास के गाँव, और एप्रोन भी। यरोबाम का बल उसके जीवनकाल में फिर कभी नहीं उभरा। और यहोवा ने उसे मार डाला; वह बीमार पड़ा और अंततः मर गया।
पर अबीजा बलवान होता गया। उसने चौदह पत्नियाँ ब्याही और उसके बाईस पुत्र एवं सोलह पुत्रियाँ हुईं। उसके बाकी के काम, उसके चलने और उसके कार्य, यह सब इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। उसकी मृत्यु के बाद, उसे दाऊद के नगर में दफनाया गया, और उसका पुत्र आसा उसके स्थान पर राजा बना।
यह कहानी सिर्फ एक युद्ध की नहीं है। यह उस विश्वास की गूँज है, जो संख्याओं से ऊपर है, और उस चुनाव की याद दिलाती है, जो हमेशा हर पीढ़ी के सामने खड़ा रहता है। पहाड़ी पर उस दिन, तुरहियों की आवाज़ के साथ, एक सबक दर्ज हुआ था—विजय उनकी नहीं होती, जो केवल तलवार उठाते हैं, बल्कि उनकी होती है, जो अपनी आवाज़ को स्वर्ग की ओर उठाने का साहस रखते हैं।




