पवित्र बाइबल

विदेशी विवाह और एज्रा का विलाप

जेरुशलम की दोपहरी धूल भरी और सूनी थी। एज्रा, शास्त्रियों का शास्त्री, अपने कमरे की खिड़की पर खड़ा हुआ सोच रहा था। बाहर, शहर की दीवारें अभी भी पुराने जख्मों की तरह दिख रही थीं, चिनाई के नए पत्थर पुराने काले पत्थरों से मिल रहे थे। वह सत्तर साल की बंधुआई से लौटा था, पर उसे लगता था कि कुछ जंजीरें अब भी दिखाई नहीं देतीं, और वे सबसे मजबूत थीं।

कुछ प्रमुख पुरुष, चेहरों पर गंभीरता लिए, उसके पास आए। उनकी आवाज में आतंक का एक सा स्वर था। “एज्रा,” एक ने कहा, “यहां के लोग, यहूदा और बिन्यामीन के लोग, पवित्र नहीं रह गए हैं। वे कनानियों, हित्तियों, परिज्जियों, यबूसियों, अम्मोनियों, मोआबियों, मिस्रियों और एमोरियों की संतानों के साथ घुलमिल गए हैं। उन्होंने अपनी बेटियां उन्हें दी हैं और उनकी बेटियां अपने बेटों के लिए ली हैं। और यह पवित्र वंश दूषित हो गया है। नेताओं और अधिकारियों ने ही इस विश्वासघात में अगुआई की है।”

एज्रा ने कुछ नहीं कहा। वह वहीं बैठ गया, जहां खड़ा था। उसने अपने वस्त्र फाड़ डाले, अपने सिर के बाल और दाढ़ी नोच डाले। वह एक पत्थर की मूर्ति की तरह बैठा रहा, जब तक कि शाम की बलिदान की भेंट का समय नहीं आ गया। शहर में धीरे-धीरे अंधेरा छा रहा था, और ठंडी हवा में धूल के कण नाच रहे थे।

फिर वह उठा। उसने अपने घुटनों के बल गिरकर, अपने हाथ फैलाए। शब्द उसके गले से एक कराह की तरह निकले। “हे मेरे परमेश्वर, मैं लजाता हूं, मुझे अपने चेहरे को तेरी ओर उठाने में शर्म आती है। हमारे अधर्म हमारे सिर पर बढ़ गए हैं, और हमारा अपराध आकाश तक पहुंच गया है।”

उसकी आवाज टूट रही थी, एक पिता की आवाज जिसके बच्चों ने उसी घर में, उसकी आंखों के सामने, सब कुछ भंग कर डाला हो। उसने पुराने दिनों को याद किया – मूसा की आज्ञाएं, भविष्यद्वक्ताओं की चेतावनियां। “दूसरी जातियों की घृणित चीजों से अपने आप को अलग रखना।” यह आदेश स्पष्ट था, सीमाएं खींची गई थीं, एक रेखा थी जिसे पार नहीं करना था। और उन्होंने न केवल पार किया, बल्कि उस रेखा को मिटा दिया था।

“हमारे परमेश्वर,” वह फुसफुसाया, आंखें बंद करके, “तेरी ओर से क्या कहें? हमने तेरी आज्ञाओं को फिर तोड़ दिया है, जिन्हें तूने अपने दास भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा दिया था। तूने हमें इसलिए सौंप दिया क्योंकि हमने अपराध किए, फिर भी तूने हमें एक नई जीवित राख की तरह बचा लिया। और देख, हम फिर से तेरे वचन के सामने विद्रोह करने के लिए खड़े हैं।”

उसकी प्रार्थना में दोषारोपण नहीं थी, केवल एक गहरा, कसैला दुख था। वह अपने लोगों के पाप को अपने ऊपर ले रहा था, जैसे कोई भारी चादर ओढ़ ली हो। बाहर, यरूशलेम के लोग इकट्ठा होने लगे थे – पुरुष, स्त्रियां, बच्चे। एज्रा का दुख, उसका विलाप, एक चिंगारी की तरह फैल गया। एक बड़ी भीड़, जो देखने आई थी, वह भी रोने लगी। स्त्रियों के रोने की आवाज हवा में मिल गई। एक युवक ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। बूढ़े लोग सिर हिलाते रहे, उनकी आंखों में एक पुरानी, परिचित निराशा थी – क्या यह फिर से शुरू होगा? क्या वे फिर से उसी गड्ढे में गिरेंगे?

तब शेकन्याह का बेटा यहीएल, एज्रा के सामने आकर खड़ा हो गया। उसके गाल भी गीले थे, पर अब उसकी आवाज में दृढ़ता थी। “हमने अपने परमेश्वर के विरुद्ध अपराध किया है,” उसने कहा, “हमने विदेशी स्त्रियों को अपने घरों में बसा लिया है। फिर भी इस्राएल के लिए अभी भी आशा है। आओ, हम अपने परमेश्वर के सामने एक वाचा बान्धें, कि हम इन सब स्त्रियों और उनसे उत्पन्न बच्चों को भेज देंगे। तू ही आगे बढ़, क्योंकि यह काम तेरा है, और हम तेरे साथ हैं। हिम्मत कर, और इसे पूरा कर।”

एज्रा ने अपना सिर उठाया। भीड़ की आंखें उस पर टिकी थीं – डरी हुई, पश्चाताप से भरी, एक निर्णय की प्रतीक्षा में। उसने अपना हाथ उठाया, उसने उन सब से, यहूदा और बिन्यामीन के सब लोगों से, शपथ खाने को कहा कि वे ऐसा ही करेंगे। और फिर वह मंदिर के एक कक्ष में चला गया, उपवास करने, और उन लोगों के लिए शोक मनाने के लिए जिन्होंने इस देश के निवासियों के साथ विवाह करके विश्वासघात किया था।

शहर में एक अजीब सी शांति छा गई। यह आनंद की शांति नहीं थी, बल्कि एक गहरी सांस लेने जैसी थी, जैसे कोई बीमार व्यक्ति अंततः अपनी बीमारी का नाम जान ले। सुबह का प्रकाश धीरे-धीरे फैला, और एज्रा अभी भी वहीं था, एक टूटे हुए और दृढ़ विश्वास के बीच झूलता हुआ, यह जानते हुए कि चंगाई दुख के बिना नहीं आती, और पवित्रता की राह अक्सर एकान्त और कठिन होती है।

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