पवित्र बाइबल

आँसुओं से बोना हँसी से काटना

वह सुबह ठंडी थी। यरूशलेम की पहाड़ियों पर हवा में अभी भी रात की सिहरन लिपटी हुई थी। एलियाव की आँखें, समय से पहले ही झुर्रियों से भर गई थीं, पूर्व दिशा में उस धुंधली पट्टी को ताक रही थीं जो सूरज के आने का इशारा करती थी। उसके हाथ में जौ के बीजों का एक छोटा सा बोरा था। बीजों को छूते हुए उसकी उँगलियाँ एक अजीब सी याद से काँप उठीं – बेबीलोन की धरती पर बोए गए वे बीज नहीं, जो विदेशी मिट्टी में गुम हो गए थे। ये बीज यहीं के थे। उसकी अपनी पहाड़ी की ढलान के लिए।

वापसी को अभी छह महीने ही हुए थे, पर लगता था जैसे एक सपना टूट कर बिखर गया हो। जब किरान नदी पार करके वे इस धरती पर लौटे थे, तो सबकी आँखों में एक पागलपन सा था। चेहरे पर हँसी, गले लगना, चीखते-गाते परदेश के गीत। वे सपने देखने वाले जैसे लग रहे थे। एलियाव भी चिल्ला रहा था, “यहोवा ने हमारे लिये बड़े-बड़े काम किए!” उसकी आवाज़ दूसरों की आवाज़ में घुल मिल गई थी। पर अब? अब तो बस ये खंडहर बचे थे। मंदिर के ढह चुके पत्थर, जले हुए घरों की दीवारें, और जंगली झाड़ियों से घिरी हुई वह ज़मीन जो कभी उसके बाप-दादों की थी।

उसने बोरा खोला। एक बीज उसकी हथेली पर रखा। छोटा, सख्त, भूरा। इतना नगण्य। इसे बोने का क्या अर्थ? इस उजड़ी हुई धरती में, जहाँ पानी की किल्लत थी, जहाँ हर मौसम अनिश्चितता लेकर आता था। क्या यह बीज भी उन आँसुओं की तरह बेकार जाएगा जो वह रात-रात भर बेबीलोन के तट पर बहाता रहा? “हमने बैलों की नाँद के समीप बैठकर, अपनी सारणी गाई थी,” वह सोचने लगा। वह गीत अब भी उसके गले में कसक पैदा करता था।

फिर भी, उसने हल उठाया। लकड़ी का फटा हुआ हल, जिसे उसने पुराने जलते हुए खंभे से बनाया था। बैल नहीं थे, सो खुद ही रस्सा कंधे पर डाल लिया। पहली फाल जमीन में घुसी तो एक सूखी, कठोर आवाज़ आई। मिट्टी नमी के अभाव में पत्थर जैसी हो गई थी। हर कदम पर संघर्ष। धूप तेज होने लगी थी। पसीना उसकी पीठ पर नमक की लकीरें छोड़ रहा था। बीजों को बोते समय उसकी आँखें छलछला आईं। ये आँसू थकान के थे, निराशा के थे, उन सब चेहरों की याद के थे जो बेबीलोन में ही रह गए थे। हर बीज जो मिट्टी में गिरता, उसके साथ एक आह, एक प्रार्थना, एक डर भी गिरता। “क्या यह उगेगा? क्या मैं इसकी फसल देख पाऊँगा?”

ऐसे ही दिन गुजरते रहे। सुबह से शाम तक मेहनत। खेत की मेड़ों को दुरुस्त करना, कंकड़-पत्थर बीनना, रात में आकाश की ओर देखकर बारिश के लिए मन ही मिन्नतें करना। पड़ोसी, जो उसके साथ ही लौटा था, कभी-कभी आ जाता। उसकी आँखों में भी वही प्रश्न होता। “क्यों झेल रहे हो, एलियाव? यह सब किस लिए? बेबीलोन में तो हमारे पास छत थी, नियमित काम था। यहाँ तो बस यादें हैं और खंडहर।”

एलियाव जवाब में कुछ नहीं बोलता। बस अपना काम करता रहता। उसकी चुप्पी में एक जिद थी, एक ऐसा विश्वास जो शब्दों से बड़ा था। वह उस वादे को याद करता जो उन्हें इस मुश्किल यात्रा पर लाया था। वह सिय्योन के गीतों को याद करता। वे सिर्फ शब्द नहीं थे, वे एक धुन थे जो उसकी हड्डियों में बस गई थी।

और फिर एक रात, बारिश हुई। हल्की फुहार नहीं, बल्कि झमाझम बारिश। बूंदों की आवाज़ उसकी झोंपड़ी की छप्पर पर ऐसी लगी जैसे स्वर्ग के तार बज रहे हों। एलियाव दरवाजे पर बैठ गया। उसकी आँखें बंद थीं। वह सुन रहा था। यही तो वह ध्वनि थी जिसकी उसे तलाश थी। यही तो जीवन का स्वर था। अगली सुबह जब वह अपने खेत में गया, तो धरती नरम थी, गीली थी, और एक अजीब सी सुगंध हवा में तैर रही थी। मिट्टी जीवित लग रही थी।

फिर हफ्तों बाद, जब वह रोज की तरह निगाह दौड़ा रहा था, उसे कुछ हरा-हरा दिखाई दिया। धुंधली, नन्ही पत्तियाँ, जमीन को चीरते हुए बाहर आ रही थीं। वह दौड़ कर वहाँ गया। घुटने टेक कर उसने उन कोमल अंकुरों को देखा। उसकी साँस रुक गई। एक क्षण के लिए सब कुछ थम सा गया। फिर, उसके होंठों से एक आवाज़ निकली। पहले तो धीमी, फिर गहरी, और अंत में एक जोरदार हँसी में बदल गई। वह हँस रहा था, बिना रुके, आँसू उसकी झुर्रियों से होकर बह रहे थे। पर ये आँसू अब बोझ नहीं थे। ये आनंद के आँसू थे। वही आनंद जिसकी चर्चा उन गीतों में थी। “जो फ़सल लेकर हँसता हुआ लौटता है।”

वह दिन आया जब जौ के खेत सुनहरी लहरों में डोलने लगे। कटाई का समय था। एलियाव और उसके पड़ोसी, और दूसरे लौटे हुए लोग, सब खेत में थे। हँसी थी, गाने थे। हाथों में दराँती थी, और हृदय में एक ऐसी भरपूरी जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल था। एलियाव ने एक पुल्ला जौ अपने हाथ में लिया। बालियाँ भरी हुई थीं। उसने देखा, फिर उसने आँखें बंद कर लीं। उसे वे सारी रातें याद आईं, वो आँसू, वो संदेह, वो कठिन परिश्रम। और अब यह। यह सुनहरा चमत्कार।

शाम को, जब अनाज खलिहान में जमा किया जा रहा था, लोग इकट्ठा हुए। कोई बीतिया बजा रहा था। एलियाव खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ थकी हुई थी, पर उसमें एक नया स्वर था। उसने कहा, “हमने बहुत रोया। हमारे बीज आँसुओं से भीगे हुए थे। पर देखो… हमारी फसल हँसी लेकर आई है। यहोवा ने हमारी बंधुआई की दशा फिरी है। हम सपने देखने वाले हैं। अब हमारे सपने सच हो रहे हैं, धान के दानों की तरह, एक-एक कर।”

लोग चिल्लाए, “हाँ! यहोवा ने हमारे लिये बड़े-बड़े काम किए हैं!” यह वही वाक्य था, पर आज इसका अर्थ वह नहीं था जो वापसी के पहले दिन था। आज यह केवल भावना नहीं, एक अनुभव था। एक ऐसा सत्य जो मिट्टी में बोया गया, आँसुओं से सींचा गया, और अब हँसती हुई फसल के रूप में खड़ा था।

एलियाव ने बाहर निकल कर अपनी पहाड़ी से यरूशलेम के खंडहरों की ओर देखा। सूरज डूब रहा था, और सुनहरी रोशनी में वे पत्थर भी अब उदास नहीं लग रहे थे। वे एक नई शुरुआत के गवाह लग रहे थे। उसने मन ही मन कहा, ‘हम जो बोएँगे, उसकी कटाई जरूर होगी। शायद हमारी आँखों से नहीं, पर होगी जरूर। क्योंकि जो आँसुओं से बोता है, वह हँसी से काटेगा।’ और इस बार, इस विश्वास में कोई कसक नहीं थी, बस एक गहरी, शांत खुशी थी।

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